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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-29, अक्टूबर, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

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।। लघुकथा ।।

 

 

प्रेमी


सनत जैन

 

ये चाकलेट और यह पत्र दे देना

कुछ कहना है क्या

नहीं जो कहना हैं वही तो लिखा है

ठीक है पहूचा देती हू

 

 

उसका और उसका जो संबंध चल रहा है ( जो अब तक शुर नहीं हुआ है ) उसकी शुरूवात का ही प्रबंध चाहिए।

 

एक छत के उस कोने में, दूसरा दूसरी छत के दूसरे कोने में पर पड़ोसी जैसे रहते हैं वो एक दूसरे का इंतज़ार कर रहे हैं ल्दी ही पास-पास आ गये।

 

बात करेंगी आप

क्यों नहीं

तो अब तक क्या हुआ था?

आपको जो हुआ

़ैर भूल जाओ

मुह मीठा किया, मीठी चीज खाने के बाद मीठी बातें होगी सोचता हूँ।

अभी मुह मीठा नहीं हुआ, मतलब कड़वी बाते होगी

खनखनाहट, यही वो आवाज है जिसके लिए उसने सबकुछ छोड़ा प्रत्युत्तर में उसकी नजरें उसे निहारने लगी।

कुछ क्षण की चुप्पी भी काट रही है....

अच्छा ला चाकलेट खाते हैं फिर बातें होगी मीठी-मीठी

अच्छा तो ये बात है '

हाँ यही बात है ।

'’पर एक ही चाकलेट दो लोग खाएगें कैसे ?

प्यार में एक ही चाकलेट तो खाई जाती है।

क्या होता है एक ही खा लेते हैं आधी-आधी वो मुस्काया, वो भी मुस्काई।

 

वो चाकलेट रैपर सहित दो टुकड़ो में तोड़ा और एक टुकड़ा ख़ुद रखकर दूसरा उसे पकड़ा दिया।

'’लो तुम बड़ा खाओ । उसने उस प्यार को प्यार से कहा, शायद उसे इसी पल का इंतज़ार था।

    सनत जैन

सन्मति इलेक्ट्रानिक्स, समीप दुर्गा चौक,

जगदलपुर, बस्तर - 494001

◙◙◙

 

लघुकथाकार

संजीव सलिल

-  जंगल में जनतंत्र

- स्वजन तंत्र

सनतजैन

- प्रेमी

 

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