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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-3, अंक-29, अक्टूबर, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। आस्ट्रेलिया से।।

 

 

बरसो रे बादल !


हरिहर झा

 

हुत ढोल पीटा गया कि इस बार की  द्वैमासिक साहित्य -संध्या  व्हीलर्स हील में  होकर क्यू लाइब्रेरी के  हॉल में होने जा रही है इसका कारण  है  पिछ्ले आठ वर्षों से अगर साहित्य-संध्या एक ही जगह होती हो तो लोग बस आँख बन्द कर वहीँ पहुंच जायेंगे ! फिर वहाँ इतनी दूर  पहुँच कर लोग ताला देखें तो गुस्से में आकर या तो दरवाजा तोड़ डालें या कि दीवार भी गीरा दें तो उनका क्या दोष ! पर साहित्य-प्रेमियों के भाग्य अच्छे थे ऐसी कोई शिकायत नहीं आई।

6 सितम्बर की वह रात ! डा नरेन्द्र अग्रवाल की अध्यक्षता में कार्यक्रम  प्रारंभ हो रहा है   सौभाग्यवश डा स्वामी विजयानन्द जो सेवा निवृत्त होने से पहले  प्रोफेसर रह चुके हैं वे भी पधारे हैं जिन्हे आज का विशिष्ट अतिथि चुना गया है वे  संक्षेप में सनातन-धर्म के इतिहास पर टिप्पणी कर रहे हैं  अपने एक रोटीअभियान के बारे में  बता रहें हैं कि किस तरह से प्रतिदिन एक रोटी का दान आन्दोलन का रूप ले रहा है फिर वे रोटी को प्रतीक रूप में  लेकर पेट के अलावा मस्तिष्क आत्मा की भूख  मिटाने की आवश्यकता पर बल देते हैं

 

उस देश में होगा मन मेराइन पंक्तियों से डा. नलिन शारदा प्रवासियों की भावनाओं को भावुक अभिव्यक्ति देते हैं। रस बदलने के लिये  मृदुलाजी  बेचारा पति कविता से सब को हँसा हँसा कर लोटपोट कर रही हैं

 

इसके बाद सुभाष जी मधुर कण्ठ से अपनी कविता हिन्दी हमारी मातृभाषा हिन्दी मेरी  पहचान है का गान करते  हैं। तत्पश्चात  अपनी हास्य कविताओं से सब का मनोरंजन करते हुये स्टेज मुझे थमाते हैं एक कवि के लिये माइक से ज्यादा प्यारी चीज़ और क्या हो सकती है! मैं आनन्द-मग्न होते हुये  भीग गया मन अपनी कविता  सुनाता  हूँ और इसके बाद सृजनगाथा की चर्चा करते हुये आस्ट्रेलिया आने के नुस्खे  का पाठ करता हूँ।

 

इसके  बाद डा नरेन्द्र अग्रवाल पहले तो किसी स्त्री  के मन की बात कहते हुये प्रतीत होते हैं मैं तेरे दिल के आंगन में धड़कन बन कर लौटूंगी पर आधी पढ़ लेने के बाद स्थीति स्पष्ट हो जाती है कि वे मातृभाषा हिन्दी की ही बात कर रहे हैं।

 

मध्यांतर के पश्चातअपने लोग अपनी बातेंकार्यक्रम में समीर जी काका हाथरसी को याद करते हैं जो एक गोरी महिला को समझाते हैं कि जलेबी बना कर उसमें चाशनी का इंजेक्शन दिया जाता है उपेन्द्र जी गोपाल दास नीरजके बारे में जानकारी देते हुये उनके आव्हान को याद करते हैं आँधियों से कह दो वे औकात में रहें इसके बाद कविताजी अपनी कविता में सरल सहज शब्दों  से जीवन की ऊँचाइयों की ओर इंगित करती हैं यह जीवन तो कुछ नहीं इससे भी उच्च कुछ और है कार्यक्रम अपने अंत की ओर बढ़ रहा है पर अनुराग अभी भी  टीवी चैनल-३१ की सहायता में तल्लीन हैं।  चन्द्राजी मीरा के एक भजन से कार्यक्रम का समापन करती हैं।

 

मध्यान्तर में पिछले सम्मेलनों का संदर्भ आया था अभी कुछ समय पहले  की बात है 5 जुलाई को केनबेरा के थियो-नोटरस मल्टीकल्चरल सेंटर में केनबेरा हिन्दी समाज के तत्वावधान में कवि सम्मेलन आयोजित किया गया संतोश गुप्ता किशोर नागरानी ने बड़े उत्साह से आयोजन किया   नरेन्द्र त्रिपाठी ने अपनी ही मधुशाला सुनाई रेखा राजवंशी सुभाष शर्मा ने हास्य-ब्यंग्य से लोगों का मनोरंजन किया मैंने भी कुछ  श्रृंगार  कुछ हास्य रस की कवितायें सुनाई। अब्बास रजा अलवी ने पतंग के माध्यम से जो उड़ान भरी वह देखने लायक थी डा शैलजा चन्द्रा मोहम्म्द अली का नाम कैस भुलाया जा सकता है

 

इसके बाद 30 अगस्त को सिडनी में हुये कवि-सम्मेलन की जो चर्चा चली तो हमें श्रोताओं को टाइम-मशीन में बैठा कर इंडिया-क्लब में ले जाना पड़ा  इस आयोजन के लिये क्लब की अध्यक्षा शुभा कुमार चेयरमेन अक्षय कुमार धन्यवाद के पात्र हैं यहा पर तो  उपर लिखे कवियों के अलावा काफ़ी  नये चेहरे भी मौजूद हैं जैसे कि काफी पुराना प्रसिद्ध अनुभवी चेहरा ओम कृष्ण राहत इनकी वजह से महफिल में जान है इनकी कविताओं में कटु यथार्थ उभर कर आता है तो साथ ही आशा और निराशा का संगम देखने योग्य है

 

हँसता हूँ मगर उल्लास नहीं रोने पे मुझे विश्वास नहीं

इस मूरख मन को जाने क्यों ये जी बहलावे रास नहीं

 

पर्थ के प्रेम माथुर ने श्रोताओं को करुण रस में  कुछ इस तरह से भिगोना शुरू किया मैं अश्क बहाता नहीं उनको पिया करता हूँ

 

सुभाष जी धरा के पार मैंने एक छोटा घर बनाया हैके द्वारा एक तरफ भारत की यादों को ताजा करते हैं वहाँ  फ्यूल वॉच कर रहे थे फ्यूल लीक हो गयाइन पंक्तियों में आस्ट्रेलिया की राजनैतिक  गतिविधियों पर व्यंग्य कर रहे हैं। रेखाजी  फोकटराम को माध्यम बना कर सब को हँसा रही हैं। आश्चर्य है आयोजन की दौड़धूप के बाद भी उन्होने हँसी की फुलझडियां संजो कर रखी  थी श्रोताओं में बांटने के लिये  अब्बास रजा अलवी  फिर किसी आवाज ने इस बार पुकारा मुझको के द्वारा आज के  गम पुरानी मीठी यादों से भूलने की कौशिश कर रहे हैं मैं मिलन- श्रृंगार के बाद विरह श्रृंगार की कविता पढ़ता हूँ  दुख से बोझिल मन हुआ है देह जर्जर प्रेम बिन  

 

यास्मिन जईदी वो तबियत की तुनक चलना कुछ पाँव पटक तुमको पाने की सनक लौटा दो से बहुत ही शायराना  माहौल तैयार कर रहे हैं।  ऐसे में दो छात्र-कवियों  राहिल आकाश की शिशों ने बरबस सबका ध्यान आकृष्ट किया  सृजनगाथा के संपादकीय में पढ़ा कि साहित्य बादल हो सकता है पर उसका बरसना भी ज़रूरी है, इसकी बुनियाद में  बादल के बनने और बरसने का चक्र  चालु रहना  भी आवश्यक है;  प्रवासियों को यह मूलभूत चिन्ता इसलिये सताती है कि यहां का माहौल हर कदम पर भारत का रहन-सहन व संस्कृति को निगलने तैयार बैठा है बल से नहीं, वातावरण के छल से। इस संदर्भ में युवा कवि और युवा श्रोता ही हमारी संस्कृति के संवाहक हैं  और इसे जिन्दा रखने में  हमारी आशा की किरण हैं

   हरिहर झा

2, बिल्बी स्ट्रीट, मोराबिन,

मेल्बर्न, आस्ट्रेलिया - 3189

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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