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अख़बार
न निकालने वाले
वीरेन्द्र जैन
पूर्व
काल में अख़बार नहीं छपते थे। इसीलिए श्लोकों के माध्यम से
नीति वाक्यों का डोज पिलाने वाले पंडितों ने इस बारे में कुछ
नहीं कहा है और सारा जोर विद्या पर डालते रहे हैं या
विद्योतमाओं के खिलाफ़ षड़यंत्र रचते रहे हैं।
'विद्या
ददाति विनयं''
या
'येशां
न विद्याम् न तपो दानं''
आदि-आदि तो कहा है,
पर
''अख़बार
क्या देता है,
या जो अख़बार नहीं पडता वह इस धरती पर भार बनकर मनुष्य के रूप
में पशु की तरह विचरण करता है''
जैसी कोई बात देखने को नहीं मिलती। यही कारण है कि हमें
पुरातत्व काल की लगाम से मुक्त होकर आधुनिक काल के उपदेशों,
निर्देशों आदि से दिशा ग्रहण करना पड़ती है।
यद्यपि आज के इस दौर में जब हम भूत के पाँवों की तरह
उल्टे-उल्टे भाग रहे हैं,
इतिहास बदल रहे हैं,
विश्वविद्यालयों में ज्योतिष शास्त्र पढा रहे हैं,
अस्पतालों में मंत्र चिकित्सा विभाग खुलवा रहे हैं और झाड़-फूँक
के लिए रास्ता बना रहे हैं तब आधुनिक काल से दिशा ग्रहण करने
में ख़तरे ही ख़तरे हैं। पर क्या करें। हमारे पास कोई चारा ही
नहीं है बिहार वालों के पास हो तो हो और बेचारे होकर हमें
आधुनिक काल से ही दिशा ग्रहण करना पड़ेगी।
जब भी अख़बार निकालने की बात चलती है तो अकबर इलाहाबादी जी का
शे’र
''गर
तोप मुकाबिल हो तो अख़बार निकालो''
सबसे पहले निकल जाता है,
भले ही तोप तो क्या तमंचा भी मुकाबिले में न हो। आजकल हर कस्बे
हर नगर में हजारों पत्रकार बिना लिखे और बिना अख़बार निकाले ही
बड़ी बड़ी तोपों को डराते फिर रहे हैं ।
तोपें पूछती हैं- और
शुक्ला
जी
अख़बार
कैसा चल रहा है?'कैसा
क्या, चल ही नहीं रहा है बंद पड़ा है''
तम्बाखू की पीक को बाहर बह जाने से रोकने की खातिर मुँह को उपर
की ओर उठा कर शुक्ला जी बताते हैं। ।
''क्यों
?''
''अरे
आप लोग चलने ही कहाँ देते है। पीड़ब्ल्यूड़ी वाले अरोरा साहब के
विभाग की एक स्टोरी छापी थी कि दूसरे ही दिन बेचारे घर पर आकर
मिठाई के डिब्बे में बीस हजार रूपये दे गये और कह गये कि
''शुक्ला
जी काहै को कष्ट करते हो अख़बार निकालने का । अख़बार लिखोगे,
छपवाओगे,
बाँटोगे,
विज्ञापन बटोरोगे,
कमीशन दोगे,
पैसा वसूलोगे तब कहीं जाकर दो चार हजार पाओगे। भैया आपका ये
छोटा भाई काहै के लिए अपने जूते घिस रहा है। जब छोटा भाई है तो
बड़ा भाई क्यों चप्पलें चटकाये । हम तो हैं सेवा में। काहे
अख़बार निकालने का कष्ट करते हैं- सो तब से बंद पडा है। अब तो
जब पैसे की दरकार होती है तो किसी
'तोप'
के पास चला जाता हूँ और कहता हूँ कि सहयोग करो नही तो अख़बार
निकालना पडेगा । लोग भले हैं,
सहयोग करते हैं। साबजी अपने अकबर इलाहाबादी जी को तो लोग सही
अर्थों में नहीं लेते,
उन्होंने तो बहुत साफ-साफ़-साफ-साफ़ कहा है कि- गर तोप मुकाबिल
हो तो अख़बार निकालो । अब भाईसाहब तोप मुकाबिले में ही नहीं
आती है तो फिर बिना वजह क्यों अख़बार निकालें।''
'तोप'
शुक्ला जी के इस आख्यान पर विचार मग्न हो जाये इसके पहले ही वे
पुन: निवेदन करते हैं
''भाई
साहब एक कष्ट देने आया था। ये वर्माजी हमारे रिश्तेदार बराबर
है,
आपके ही विभाग में मुलाजिम है कई वर्षों से सैंवढा में सड़ रहे
हैं विचारे । इनका काम कर दे तो बडी कृपा होगी। आप जैसी दिव्य
मूर्तियों के र्दशनों का सौभाग्य मिलता रहेगा नही तो फिर उसी
साले अख़बार में घुसना पडेगा।''
तोप
शुक्ला
जी का काम कर देती है।
वर्मा जी भी
शुक्ला
जी का
'काम'
कर देते हैं।
हम
अख़बार
निकाल सकते हैं,
इसलिए हमसे डरो,
नही तो
अख़बार
निकाल देंगे - ऐसा आदेश
देते हुये हर नगर कस्बे में डायरी दावे,
खैनी फटकारते अनेक लम्बे कुर्ते वाले मिल
जायेंगे जो केवल होली, दिवाली,
पन्द्रह अगस्त,
छब्बीस जनवरी को स्थानीय तुक्कड़ों की फूहड़ कविताओं और
त्यौहारों की तरह मिलने वाले सरकारी विज्ञापन के साथ
अख़बार
इसलिए छापते हैं कि सनद रहे,
वक्त
ज़रुरत
पे काम आवे।
चूँकि
किसी के
मुँह
पर तो लिखा नहीं रहता कि ये
अख़बार
निकालते हैं सो वे अपने स्कूटरों पर प्रेस लिखवा लेते हैं -
बडे बडे मोटे मोटे अक्षरों में । इस प्रेस का यह मतलब नहीं है
कि हम
अख़बार
वाले हैं अपितु इसका मतलब है कि हम
अख़बार
निकाल सकते हैं । टे्रैफिक के कानिस्टबिलों,
वर्जित क्षेत्र में प्रवेश
कराने वालो,
स्कूटर चराने
वालों,
अगर पढ़
सकते हो तो पढ लो कि हम वो हैं जो
अख़बार
निकाल सकते हैं। नहीं निकाल
रहे
यह हमारा अहसान है । यह लोकतंत्र का चौथा पाया है जो हमने उपर
उठा रखा है अभी । अगर टिका दिया तो लोकतंत्र चौपाया होकर जम
जायेगा । इसलिए-
है
तीन हिस्सों,
हमें टिकने को मजबूर मत करो । तुम अपनी मन
मर्जी करो और हमारा ध्यान रखो, नही
तो हम टिक जायेंगे ।
हम टिक नहीं पाये इसलिए हमें बिकते रहने दो ।
अख़बार
निकालने वालों की तुलना में
अख़बार
न निकालने वालों से तापें
ज़्यादा
डरती हैं । अब जो
अख़बार
निकाल ही रहा है उसे तो हजार दूसरे काम भी हैं और उसे तो किसी
तरह निकालना
ज़रूरी
है सो उसका ध्यान दूसरी तरफ रहता है,
पर
अख़बार
न निकालने वाले तो बाल की खाल और ढोल की पोल में घुसने के लिए
जगह तलाशते
रहते हैं । भूखे भेड़ियों
की तरह
यहाँ वहाँ
पहुँचने
की कोशिशें
करते हैं
जहाँ
तोपों के हित में उन्हें नहीं होना चाहिये । इसीलिए तोपों की
कोशिश
रहती है कि इसका
अख़बार
न निकले ।
अख़बार
निकालने वालों की तुलना में
अख़बार
न निकालने वालों की सक्रियता देखते ही बनती है। निकालने वालों
की तुलना में सभी चिन्ताओं से मुक्त वे प्रभावशाली
नेताओं के इर्द-गिर्द
घूमते रहते हैं ।
वे जनसम्पर्क विभाग से निरंतर सम्पर्क रखते हैं । उन्हें
ज़्यादा
पता होता है कि कब किसकी प्रेस कान्फ्रेंस
कहाँ
होने वाली है।
अख़बार
निकालने वाले जब चुटीले प्रश्न
खोज
रहे
होते हैं तब
अख़बार
न निकालने वाले गर्म समोसों की खुशबू
सूँघ
रहे
होते हैं । कोल्ड डिंक की बोतलों के ढक्कनों के खुलने की
प्रतीक्षा में होते हैं । प्राप्त हाने वाले उपहारों की
संभावाअनों को तलाश
रहे
होते हैं,
उनका
मूल्याँकन
कर
रहे
होते हैं ।
अकबर इलाहाबादी आज होते तो
शायद
उन्हें भी यह लिखना पडता कि तोप से मुकाबला कैसा
अख़बार
न निकालो और तोप के साथ हो जाओ इसी में
फ़ायदा
है।
वीरेन्द्र
जैन
21
शालीमार स्टर्लिंग रायसेन रोड
अप्सरा टाकीज
के पास भोपाल मप्र
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