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वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

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।। शोध ।।

 

 आठवाँ किश्त

हिंदी लघुकथा का विकास


डॉ. अंजलि शर्मा

 

(लघुकथा हिंदी साहित्य की नवीनतम् विधा है । इसका श्रीगणेश छत्तीसगढ़ के प्रथम पत्रकार और कथाकार माधव राव सप्रे के 'एक टोकरी भर मिट्टी से होता है' । हिंदी के अन्य सभी विधाओं की तुलना में अधिक लघुआकार होने के कारण यह समकालीन पाठकों के ज्यादा करीब है । और सिर्फ़ इतना ही नहीं यह अपनी विधागत सरोकार की दृष्टि से भी एक पूर्ण विधा के रूप में हिदीं जगत् में समादृत हो रही है । इसे स्थापित करने में जितना हाथ लघुकथाकारों का रहा है उतना ही कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव, बलराम, आदि संपादकों का भी रहा है । खास कर लघुपत्रिकाओं के संपादकों का । इंटरनेट पर भी कई वरिष्ठ लघुकथाकार इसे विश्वव्यापी लोकप्रियता के लिए कटिबद्ध हैं ।

 

हमने अपने प्रिय पाठकों के लिए पहली बार हिंदी लघुकथा के विकास पर किसी शोध ग्रंथ को धारावाहिक रूप से छापने का निर्णय लिया है ताकि इस लघु किंतु गुरुतर विधा से सारी दुनिया के रचनाकार और पाठक भी अवगत हो सकें । हमें खुशी है रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर, छत्तीसगढ़ के शोध छात्रा और हिदीं के प्राध्यापक डॉ. अंजलि शर्मा जी की सहमति से संपूर्ण शोध कृति अंतरजाल पर प्रकाशित हो रहा है, जिस पर उन्हें पी-एच.ड़ी की उपाधि मिल चुकी है । हिंदी अंतरजाल के इतिहास में शायद पहला अवसर है कि कोई शोध कृति धारावाहिक प्रकाशित हो रही है । अभी तक आप भाग 1, भाग 2, भाग 3, भाग 4 भाग 5, भाग 6 एवं भाग 7 पढ़ चुके हैं। पिछले अंकों से आगे पढ़िए - संपादक )

 

आधुनिक लघुकथाएं- (सन् 1950 से आज तक) आधुनिक लघुकथाओं का आरंभिक रुप सन् 1950 से मानना उचित होगा । सन् 1950 के आसपास लघुकथा का समग्र रुप दिखाई देता है । प्रारंभिक काल एवं विकासोन्मुख काल के स्वरूप एवं संप्रेषणीयता की अपेक्षा आधुनिक लघुकथा का स्थान सर्वोपरि कहा जाये, तो आतिशयोक्ति नहीं होगी। आधुनिक काल में लघुकथा पुष्पित एवं पल्लवित हुई। लघुकथा अपने लघुरूप से ही अपनी समग्रता, तीक्ष्णता एवं समसामयिक स्थिति को व्यक्त करती है। डॉ. कृष्णा अग्निहोत्री के अनुसारसमय की तेज़ रफ़्तार में आधुनिक लघुकथा का अस्तित्व बड़ा भारी साहित्यिक भराव है । संक्षिप्त अभिव्यक्ति से तेज़, पैनी प्रसार घात कही जा सकती है । कुछ व्यक्तियों को  इसमें चुटीलापन दिखता है, लेकिन वह भी इसकी विशेषता है । चुटकुलों में केवल हँसी का दौर संक्षिप्ति में है । इसमें गंभीरता से भी बात कही जाती है । भाषा शैली के कुछ नये चुटकीले आयाम प्रस्तुत हो रहे हैं । कुछ सम-सामयिकता तो लघुकथा  के अध्ययन एवं माध्यम से ही प्रस्तुत हो रहे हैं । लघुकथा  एक ओर व्यंग्य- सी तीखा प्रहार करती है, तो दूसरी ओर उनमें कथा का मनोरंजन भी है । दुहरी भूमिका निभाने में इस सक्षम विधा की आज प्रगति और लोकप्रियता बढ़ती जा रही  है । इसमें जो सोद्दश्यता है, यह इसे स्थान दिलाने में पर्याप्त है । आधुनिक लघुकथाओं के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को निम्नकाल खंडों में विभाजित किया जा सकता हैः-

 

(1) छठा दशक- (सन 1951 से 1960 तक ) छठे दशक का प्रारंभ सन् 1951 से माना जाता है। सच्चे अर्थों में यह जाये कि आधुनिक लघुकथा का जन्म छठे दशक में ही हुआ तो अत्युक्ति न होगी। लघुकथा का सही टेक्नीक में लेखन परंपरा छठवें दशक  से ही प्रारंभ हुआ । सन् 1952 के लगभग बैजनाथ मिश्र ने आधुनिक गद्य संग्रह नाम से सभी विधाओं का एक संकलन प्रकाशित किया। इसमें आठ लघुकथाएं संकलित हैं जिनमें रामधारीसिंह दिनकर की नदियाँ और समुद्र गंगा प्रसाद पांडेय कीमनस्तत्व और भिखारी का ज्ञान,  सत्य की तपभग, बैकुंठ लाल मेहरोत्रा की प्यासी धरतीउबड खाबड़ रास्ता शांति एम.ए. की मौली के तार उल्लेखनीय है। ये लघुकथा  में प्रारंभिक होने के बावजूद भी संप्रेषणीयता के गुणों से संपृक्त हैं।

 

सन् 1955 में डॉ. धर्मीवीर भारती व लक्ष्मीकांत वर्मा द्वारा संपादित निकष-2 में हरिशंकर परसाई की गधा और भोर तथा गोभक्ति लघुकथाएं प्रकाशित हुईं। ये लघुकथाएं शिल्प आकार और उद्देश्य से किसी प्रकार वर्तमान लघुकथाओं से भिन्न नहीं है।

 

लघुकथा की स्थापना एवं विकास में रामप्रसाद रावी का नाम सगर्व लिया जाना चाहिए । सन् 1958 में रावीजी की प्रथम लघुकथा मेरे कथा गुरु का कहना है प्रकाशित हुई। यह लघुकथा साहित्य लोक में एक दृढ़ स्तंभ थी। जिसके सहारे अनेक लताएं चढ़ी, परंतु इसके पूर्व की लघुकथा भी मील का पत्थर साबित हो चुकी थी।

 

 सन् 1952 में जगदीश चंद्र मिश्र की मिट्ठी के आदमी पंचतत्व और उड़ने के पंख आदि लघुकथा संग्रह प्रकाशित हुए । सन 1960 में लक्ष्मीचंद जैन कृत काग़ज की किश्तियाँ नामक लघुकथा संग्रह प्रकाशित हुई । इसके अतिरिक्त 1950 के बाद जो लघुकथा संग्रह प्रकाशित हुई, उनमें रामधारी सिंह का उजला आग रामनारायण उपाध्याय की  गरीब और अमीर, बैकुंठ मेहरोत्रा की ऊँचे और ऊँते, शरद कुमार मिश्र की धूप आर धुँआ, अवधेश कुमार शुक्ल की ज्योत्सना, अयोध्या प्रसाद गोयलीय की गहरे पानी पैठ, रामधन खत्री की पाषाण के पंछी, अयोध्या प्रसाद गोयलीय की जिन खोजा नित पाइयाँ, हरिशंकर परसाई की तब की बात और थी, ज्योति प्रकाश की दिल का गहराई से, कामता प्रसाद सिंह का काम तथा नावक के तीर प्रमुख हैं। डॉ. रामकुमार वर्मा तथा श्री सरोज शर्मा की लघुकथाएं वर्तमान लघुकथाओं से भिन्न है, परंतु इनका स्वर वर्तमान लघुकथाओं के स्वर से भिन्न नहीं है। ये लघुकथाएं दार्शनिकता से युक्त है। इसमें सामाजिक तथा नैतिक समस्याओं का निरुपण है। छठवें दशक के लघुकथाकारों ने अपनी लघुकथा के माध्यम से लघुकथा के विकास की गति को आगे बढ़ाया सातवें दशक के लिये मार्ग प्रशस्त किया ।

 

सातवां दशक- (सन् 1961 से 1970 तक) सातवें दशक का प्रारंभ सम् 1961 से होता है । सातवें दशक का सर्वाधिक महत्व इसलिये है, क्योंकि लघुकथा स्वतंत्र साहित्यिक विधा के रुप में प्रतिष्ठित हुई । सन् 1961 में पदमसिंह शर्मा, कमलेश द्वारा रचित हिन्दी गद्य की विधाएं और विकास में कथा साहित्य शीर्षक के अंतर्गत लघुकथा को स्वतंत्र विधा की मान्यता दी गई । डॉ. कमलेश ने लिखा है- यह नितांत  नूतन विधा हिन्दी के प्रसिद्ध विचारक और गद्य लेखक श्री रावी द्वारा समृद्ध हुई ।

 

सन् 1952 में शंकर देव अवतरे ने अपनी पुस्तक हिन्दी साहित्य में काव्य रूपों का प्रयोग निबंध शीर्षक के अंतर्गत लघुकथा को भी स्थान दिया है । परंतु उन्होंने लघुकथा को कहानी के अंतर्गत न रखकर निबंध शीर्षक के अंतर्गत रखा, जबकि मूलतः यह विधा कहानी से ही संबंधित है । डॉ. अवतरे ने अपनी लघुकथा की  व्यंग्य लेख के अंतर्गत परिगणित करते हुए लिखा है व्यंग्य लेख में आजकल सबसे अधिक प्रचार-प्रसार लघुकथा का है । व्यक्ति प्रधान स्वतंत्र विवरण के कारण से व्यक्ति प्रधान निबंधों के अधिक पास हैं, किंतु लघुकथा में अपना एक तत्व भी है, वह है, उसका तीखापन जो नश्तर की तरह नस-नस पर उतर जाता है । इसलिये इसे बाल साहित्य के भीतर नहीं रखा जा सकता । डॉ. श्यामसुंदर घोष द्वारा लिखित पुस्तकसाहित्य के नये रूप में  ‘लघुकथा को पृथक शीर्षक के अंतर्गत रखा गया है। सम-सामयिक हिंदी साहित्य में (संपादक हरिवंश राय बच्चन, डॉ. नगेंद्र, भारत भूषण अग्रवाल) लघुकथाओं पर गद्य गीतों का प्रभाव बतलाते हुए लघुकथा के रोचक तथ्यों  की ओर संकेत किया है।

 

इस प्रकार स्पष्ट कहा जा सकता है कि सन् 1961 के बाद लघुकथा को साहित्यिक विधा के रुप में स्थान प्राप्त होने लगा । सन् 1961 में रावी के विचार प्रधान लघुकथाओं का संकलन  ‘मेरे कथा गुरु का कहना है भाग 2 प्रकाशित हुई। सन् 1961 में इंद्रदेव सिंह द्वारा संपादित आकार में प्रभाकर द्विवेदी की चार लघुकथाएं व्यक्तित्व रूप की छाया,ज्ञान का प्रश्न और पुष्पा और प्रकृति प्रकाशित हुई। कादम्बिनी अगस्त 1961 के अंक में परेशचंद्र मिश्र की जासो सुत जाहत लियो तथा कादम्बिनी 1964 के अंक में लारेंस हाऊ मैन की कवि और सौंदर्य लघुकथा प्रकाशित हुई। छठवें और सातवें दशक में कादम्बिनी ने लघुकथा के विकास में पर्याप्त योगदान दिया। सन् 1962 में कृष्ण कमलेश की वीर अर्जुन तथा पराये फूल लघुकथाएं प्रकाशित हुई। सन् 1963 में केसरी कुमार द्वारा संपादित गद्य भारती में हिमांशु श्रीवास्तव का वेतन आज की लघुकथाओं का प्रतिनिधित्व करती है। गद्य भारती में ही महात्मा गांधी की हिंसा की भूख शांत होगी तथा रामेश्वर नाथ तिवारी की पंडे की दक्षिणागधे की पढ़ाई भी संकलित है। खलिल जिब्रान की दो लघुकथाएं लोमड़ीदो विद्वान प्रकाशित हुई।

 

हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग की मासिक पत्रिका माध्यम में भी लघुकथाएं नियमित रुप से प्रकाशित होती रही हैं। माध्यम-1966 के अंक में फसलों की शरारत जुलाई 1966 के अंक में शिवशंकर त्रिपाठी की जीवन का कर्म और भ्रमर का स्वभाव,  प्रकाशित हुई । परंतु ये शिल्प की दृष्टि से आधुनिक लघुकथाओं से मेल नहीं खाती है। माध्यम के अगस्त अंक में शंकरदयाल पांडे की लघुकथा  गुरु दक्षिणा प्रकाशित हुई जो लघुकथा  की अपेक्षा लघु कहानी के अधिक निकट है। सन् 1966 में सुगनचंद मुक्तेश की लघुकथाओं का संग्रह स्वाति बूंद प्रकाशित हुई। स्वाति बूंद की अधिकांश रचनाएं उपदेशात्मक हैं, यथा-हिंसा अहिंसा में गुरु शिष्यों को हिंसा का अर्थ समझाते हैं। इसी प्रकार शांति का रहस्य पाप का मूल कारण स्वाति बूंद, मृगतृष्णा, प्रश्न और प्रश्न कीचड़ और काई आदि में शिक्षा का स्वर प्रधान है। अपने संग्रह के बारे में लेखक का कथन-हिंदी में लघुकथाएं अभी निज शैशवकाल में हैं, और प्रस्तुत संग्रह जैसी तो संभवतः प्रसूतिगृह में ही।

 

सन् 1966 के बाद लघुकथा  को व्यापक क्षेत्र प्राप्त हुआ। लघुकथा  में गतिशीलता आयी । सजग लघुकथाकारों द्वारा लघुकथा को सुसंस्कृत एवं परिष्कृत बनाया गया, फलस्वरुप लघकथा एक सशक्त विधा के रुप में स्थापित हुई। एक ओर संकुचित मनोवृत्ति वाले लोग थे, जिनके कारण लघुकथा को दलगत वाद विवादों में फँसना पड़ा। इन नामधारी लघुकथाकारों द्वारा लघुकथा  को चुटकुले के समीप खड़ा किया गया, फलस्वरुप लघुकथा कभी अखबारों की कतरन बन रह गई, तो कभी घिनौने व्यंग्य के रुप में सामने आयी, कभी लेखकों द्वारा अपने संत्रास और कुंठा को अभिव्यक्त करने का माध्यम बनी। उपरोक्त कारणों से लघुकथा  के स्तर में गिरावट आने लगी। दूसरी ओर ऐसे लेखकों की भी कभी नहीं थी, जिन्होंने लघुकथा के यज्ञ में संपूर्णाहुति दी। इनमें भगीरथ, रमेश बतरा, कृष्ण कमलेश, पृथ्वीराज अरोड़ा, महावीर प्रसाद जैन, चित्रा मुद्गल, कमलेश भारतीय, सतीश दुबे, शंकर पुणतांबेकर, सिमर सदोष, विभा रश्मि, श्री विक्रम सोनी, डॉ. कमल चोपड़ा, प्रबोंध कुमार गोविल आदि लघुकथाकारों ने सातवें दशक में विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में भी लघु कथाओं को संरक्षण मिला । ये लघुकथाएं पृथक शीर्षक के रूप में प्रकाशित हुई । दैनिक हिंदी मिलाप जालंधर में लघुकथाओं को स्थान दिया जाने लगा। जून 1964 के अंक में पूरन मुद्गल की लघुकथा कुल्हाड़ा और क्लर्क प्रकाशित हुई, जिसका स्परूप आधुनिक लघुकथा के समान हैं। हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग की मासिक प्रत्रिका माध्यम में नियमित रुप से लघुकथाओं को स्थान दिया जाने लगा था।

 

लघुकथा के विकास एवं लोकप्रियता में सारिका ने सराहनीय भूमिका निभायी है। सन् 1970 से लेकर सारिका अब तक(प्रकाशन बंद होने तक) लघुकथाएं प्रकाशित कर रही हैं, जो प्रायः स्तरीय होती है। सातवें दशक में ही विभिन्न विदेशी भाषाओं की लघुकथाओं का हिंदी में अनुवाद किया गया उदाहरणार्थ सुरेश पांडे द्वारा अनुदित बलगेरियन लघुकथा परोपकार प्रकाशित हुई। सुरेश पांडे की 1970 में सारिका अक्टूबर अंक में गधा गोद का बच्चा और भाग्य लेख प्रकाशित हुई । सारिका ने दो लघुकथांक भी निकाले जिससे लघुकथा के विकास में गति आयी । पत्र पत्रिकाओं, गद्य संकलनों तथा गद्य संग्रहों, गद्य विधाओं के संकलनों या गद्य के विकास की दृष्टि से लिख गये ग्रंथों में भी प्रायः लघुकथाओं का उल्लेख मिलता है, उदाहरणार्थ सन् 1968 में रामचंद्र तिवारी की कृति में हिंदी गद्य साहित्य तथा गद्य साहित्य की अन्य विधायें शीर्षक के अंतर्गत लघुकथा का उलेलेख करते हुए डॉ. तिवारी लिखते हैं- हिंदी में अब लघुकथाएं भी लिखी जाने  जाने लगी । लघुकथाओं में जीवन के किसी गूढ़ अंर्तवर्ती सत्य संदेश विचार था छोटी सी साधारण प्रतीत होने वाली कहानी के स्थान में प्रस्तुत करते हैं।

 

सारांश में कहा जा सकता है लघुकथाकारों की लेखन शैली द्वारा लघुकथा  की नींव प्राप्त हुई, जिससे लघुकथा  रूपी भवन स्थिर हुआ तथा लघुकथा  एक साहित्यिक विधा के रुप में प्रतिष्ठित हुई। पत्र-पत्रकाओं में भी लघुकथाओं को स्थान दिया जाने लगा।

 (क्रमशः अगले अंकों मे)

  डॉ. अंजलि शर्मा

सहायकशासकीय स्नातकोत्तर कला एवं वाणिज्य महा.

जरहाभाटा, बिलासपुर, छत्तीसगढ

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