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क्रमश...
दक्षिण में इतिहास लेखन की परंपरा
दक्षिण भारत में हिंदी प्रचार आंदोलन संबंधी कई इतिहास ग्रंथ
लिखे गए हैं । केरल के वरिष्ठ हिंदी प्रचारक श्री पी.के.
केशवन् नायर ने
‘दक्षिण
भारत के हिंदी प्रचार आंदोलन का समीक्षात्मक इतिहास’
के नाम से जो बृहद् इतिहास ग्रंथ (प्रथम संस्करण अगस्त, 1963
में प्रकाशित) लिखा है, उसमें एक अध्याय दक्षिण की हिंदी
पत्र-पत्रिकाएँ शीर्षक से जोड़कर दक्षिण भारत की हिंदी
पत्रकारिता का एक हद तक समग्र विवेचन प्रस्तुत करने का प्रयास
किया है । यद्यपि उनके विवेचन को संपूर्ण नहीं कहा जा सकता है
तथापि दक्षिण में हिंदी प्रचार आंदोलन विषयक परवर्ती कई
ग्रंथों की तुलना में उनका प्रयास सराहनीय एवं स्मरणीय है ।
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की ओर से प्रकाशित मासिक पत्र
‘हिंदी
प्रचार समाचार’
में अपने संपादनकाल में श्री सारंगपाणी ने
‘दक्षिण
की पत्र-पत्रिकाएँ’
शीर्षक से एक लेख लिखा था, श्री केशवन नायर ने इसी लेख के आधार
पर दक्षिण भारत की हिंदी पत्र-पत्रिकाओं पर लिखने की उदारता
दर्शायी थी । दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास द्वारा
‘दक्षिण
में हिंदी प्रचार आंदोलन का इतिहास’
के नाम से एन. वेंकटेशवरन के संपादन में एक पुस्तक प्रकाशित
(प्रथम संस्करण दिसंबर, 1994) हुई है, जिसमें स्वयं संपादक
सहित दक्षिण के अन्य प्रबुद्ध हिंदी विद्वानों के दक्षिण के
चारों राज्य में हिंदी प्रचार संबंधी विवेचन पर केंद्रित लेख
प्रकाशित किए गए हैं । हिंदी में प्रकाशित दो-चार
पत्र-पत्रिकाओं के नामों के उल्लेख से बढ़कर किसी भी लेखक ने
पत्रकारिता की विवेचना अथवा अपने प्रदेश से प्रकाशित तमाम
हिंदी पत्र-पत्रिकाओं की सूची प्रकाशित करने का प्रयास नहीं
किया है, यह एक विडंबना है ।
दक्षिण की हिंदी पत्रकारिता के संदर्भ में अक्षरबद्ध विवेचन
‘हिंदी
पत्रकारिता
:
विविध आयाम’
के नाम से वेदप्रताप वैदिक के संपादन में प्रकाशित बृहद् ग्रंथ
में प्रायः देश के सभी प्रदेशों की हिंदी पत्रकारिता पर
विद्वान लेखकों के लेख संकलित हैं, जिसमें आंध्र प्रदेश,
कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु प्रदेशों की हिंदी पत्रकारिता पर
केंद्रित क्रमशः डॉ. श्रीराम शर्मा, डॉ. परमानंद गुप्त, डॉ.
गोपीनाथन, श्री लक्ष्मीकांत सरस के लेखों में दक्षिण भारत की
हिंदी पत्रकारिता की एक झांकी उपस्थित हो पाई है । सातवें दशक
तक की स्थिति के संदर्भ में संक्षिप्त विवेचन इन लेखों में
प्रस्तुत हो पाया है । उक्त लेखों में दक्षिण से प्रकाशित कई
पत्र-पत्रिकाओं के नाम छूट गए हैं और कुछ प्रमुख
पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन की तिथियाँ भी ग़लत दर्ज़ की गई हैं
।
‘भारत
में हिंदी पत्रकारिता’
के नाम से डॉ. रमेश जैन के संपादन में प्रकाशित (1989) ग्रंथ
में देश के कई राज्यों की हिंदी पत्रकारिता पर विभिन्न
विद्वानों के लेख प्रकाशित हुए हैं जिसमें आंध्र की हिंदी
पत्रकारिता पर डॉ. श्रीराम शर्मा, तमिलनाडु की हिंदी
पत्रकारिता पर लक्ष्मीकांत सरस, केरल की हिंदी पत्रकारिता पर
डॉ. एन.ई. विश्वनाथ अय्यर, कर्नाटक की हिंदी पत्रकारिता पर
परमानंदगुप्त, पांडिच्चेरी की हिंदी पत्रकारिता पर श्री
रवींद्र के लेखों में किसी हद तक दक्षिण में हिंदी पत्रकारिता
का चित्रांकन हो पाया है । डॉ. वैदिक की पुस्तक में प्रकाशित
लेखों को अद्यतन बनाने की इसमें कोशिश दिखाई पड़ती है, अतः मूल
लेखों की विसंगतियाँ इन लेखों में रह गई हैं ।
‘हिंदी
साहित्य को हिंदीतर प्रदेश की देन’
के नाम से डॉ. मलिक मोहम्मद के संपादन में प्रकाशित ग्रंथ में
केरल की हिंदी पत्रकारिता पर उन्हीं का एक लेख प्रकाशित हुआ
था, जिसमें केरल की हिंदी पत्रकारिता संबंधी कुछ तथ्य वंचित रह
गए हैं ।
बैंगलूर विश्वविद्यालय द्वारा पीएच.डी. की उपाधि के लिए
स्वीकृत
‘कर्नाटक
में हिंदी प्रचार की गतिविधियाँ’
विषयक अपने शोध प्रबंध (प्रथम संस्करण नवंबर, 1994 में
प्रकाशित) में डॉ. पी.आर. श्रीनिवास शास्त्री ने कर्नाटक से
प्रकाशित आठ हिंदी पत्रिकाओं के नामों का उल्लेख सहित दो चार
पंक्तियों में उनका परिचय प्रस्तुत किया है । डॉ. शास्त्री जी
के ग्रंथ में कर्नाटक की कई हिंदी पत्र-पत्रिकाएँ उपेक्षित रह
गई हैं ।
‘केरल
में हिंदी भाषा और साहित्य का विकास’
के नाम से प्रकाशित (प्रथम संस्करण – 1996) अपनी कृति में डॉ.
एन.ई. विश्वनाथ अय्यर ने केरल में हिंदी-पत्रकारिता के नाम से
एक अध्याय जोड़ दिया है, जिसमें केरल से प्रकाशित सोलह हिंदी
पत्रिकाओं का विवेचन प्रस्तुत किया है । उक्त विवेचन में
विद्वान लेखक ने कई संदर्भों में अनुमान से काम लिया है, अपने
ही परिवेश में जीवित पत्रकारों से मिलकर प्रामाणिक बातें
प्रस्तुत करने की दिशा में शायद उनकी रुचि नहीं रही, अतः यह
स्वाभाविक है कि कुछ पत्रिकाएँ उनके विवेचन में उपेक्षित रही
अथवा छूट गई हैं ।
‘अग्रतारा’
के प्रवेशांक (अक्तूबर, 1996) में
‘दक्षिण
भारत में हिंदी पत्रकारिता’
के शीर्षक से प्रकाशित डॉ. बजरंग राव बांगरे का आलेख,
‘दक्षिण
समाचार’
(25 दिसंबर, 1996) में
‘दक्षिण
की साहित्यिक हिंदी पत्रकारिता’
के शीर्षक से प्रकाशित नूरणि विश्वनाथ अय्यर का लेख,
‘दक्षिण
भारत’
(अक्तूबर-दिसंबर, 1997) में आकाशवाणी के सौजन्य से प्रकाशित
श्री रुक्माजी राव अमर का
‘मद्रास
की हिंदी पत्रकारिता’
पर केंद्रित लेख,
‘हिंदी
प्रचार वाणी’
(दिसंबर, 1997) में
‘कर्नाटक
में हिंदी पत्रकारिता’
शीर्षक से प्रो. तिप्पेस्वामी का लेख, आंध्र प्रदेश हिंदी
प्रचार सभा, हैदराबाद द्वारा प्रकाशित
‘आंध्र
प्रदेश का गौरवशाली परिचय’
(प्रथम संस्करण – मार्च, 1999) में संकलित
‘आंध्र
प्रदेश में हिंदी पत्रकारिता’
शीर्षक का लेख, वरिष्ठ पत्रकार मुनींद्र के अमृतोत्सव के अवसर
पर
‘भारतीय
भाषा पत्रकारिता एक अवलोकन’
के नाम से प्रकाशित अभिनंदन ग्रंथ (वर्ष 2000) में
‘दक्षिण
की हिंदी पत्रकारिता’
शीर्षक से संकलित गोपाल शर्मा का लेख आदि उल्लेखनीय प्रयास हैं
जिनमें शीर्षक के अनुरूप पत्रकारिता का विवेचन का प्रयास किया
गया है । कुछ लेखों में कई तथ्य वंचित रह गए हैं और प्रकाशित
कई पत्र-पत्रिकाओं के नाम छूट गए हैं । इन कमियों के बावजूद
ऐसे लेखों के लेखन, प्रकाशन समय-समय पर होते रहना, इतिहास को
अक्षरबद्ध करने की दृष्टि से अवश्य ही उपयोगी साबित होती है ।
केरल
‘हिंदी
साहित्य अकादमी शोध-पत्रिका’
का अक्टूबर, 1999 का अंक
‘विश्व
हिंदी पत्रिका अंक’
के रूप में प्रकाशित हुआ था, जिसमें दक्षिण की हिंदी
पत्रकारिता का समग्र विवेचन प्रस्तुत करने के उद्देश्य से छः
लेख प्रकाशित किए गए थे । इन लेखों में विवेच्य प्रदेशों की
पत्रकारिता का समग्र चित्रांकन संभव नहीं पो पाया है ।
ऊपर चर्चित स्थितियों को ध्यान में रखते हुए दक्षिण में हिंदी
पत्रकारिता के समग्र इतिहास को लेखनबद्ध करने की दिशा में
अपेक्षित प्रयासों के अभाव को यथासंभव दूर करने का प्रयास इस
शोध प्रबंध में किया गया है ।
प्रस्तुत शोध प्रबंध की रूप-रेखा
इस शोध ग्रंथ में कुल आठ अध्यायों में दक्षिण भारत की हिंदी
पत्रकारिता का समग्र विवेचन प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया
है । प्रथम अध्याय
‘दक्षिण
भारत में हिंदी पत्रकारिता की भूमिका’
से आरंभ करके अगले पाँच अध्यायों में क्रमशः तमिलनाडु, आंध्र
प्रदेश, केरल और कर्नाटक राज्य और संघ शासित प्रदेश पांडिचेरी
में हिंदी पत्रकारिता का समग्र अध्ययन किया गया है । अध्ययन
की सुविधा हेतु स्वातंत्र्यपूर्व और स्वातंत्र्योत्तर हिंदी
पत्रकारिता के रूप में वर्गीकृत करके विवेचन करने का प्रयास
किया गया है । इस शोध अध्ययन के निष्कर्षों की प्रस्तुति
अंतिम अध्याय के रूप में उपसंहार में की गई है । कुछ
महत्वपूर्ण जानकारियाँ परिशिष्ट में जोड़कर शोध-प्रबंध को
पूर्णता प्रदान करने का प्रयास किया गया है ।
प्रथम अध्याय का शीर्षक
‘दक्षिण
भारत में हिंदी पत्रकारिता की भूमिका’
है, जिसमें पत्रकारिता की परिभाषा, सैद्धांतिक पृष्ठभूमि से
लेकर पत्रकारिता के जन्म, विकास तथा भारत में हिंदी पत्रकारिता
के आरंभ, विकास तक की स्थिति की चर्चा करते हुए राष्ट्रीय
चेतना के प्रसारण में हिंदी पत्र-पत्रिकाओं की भूमिका का भी
संक्षेप में विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है । इस विश्लेषण के
अंतर्गत विषय विवेचन को पूर्णता प्रदान करने की दृष्टि से
अद्यतन संचार क्रांति के परिप्रेक्ष्य में प्रमुख संचार माध्यम
के रूप में पत्रकारिता के विकास के संबंध में एक नज़र भी डाला
गया है । दक्षिण भारत में हिंदी भाषाई पृष्ठभूमि और हिंदी
प्रचार-प्रसार संबंधी गितिविधियों के ऐतिहासिक विवेचन सहित
दक्षिण में स्वैच्छिक हिंदी प्रचार संस्थाओं की गतिविधियों का
एक संक्षिप्त सर्वेक्षण प्रस्तुत किया गया है । दक्षिण में
हिंदी पत्रकारिता की प्रासंगिकता से संबंधित चिंतन सहित दक्षिण
में हिंदी पत्रकारिता से की जानेवाली अपेक्षाओं की रूप रेखा
प्रस्तुत की गई है ।
द्वितीय अध्याय का शीर्षक है –
‘दक्षिण
भारत में हिंदी पत्रकारिता का उदय और विकास’
। इस अध्याय में दक्षिण भारत की हिंदी पत्रकारिता के उदय से
लेकर स्वातंत्र्यपूर्व और स्वातंत्र्योत्तर युगों में उसके
विकास का समग्र विवेचन प्रस्तुत किया गया है । दक्षिण में लघु
पत्रिकाओं के प्रकाशन के महत्व को रेखांकित करते हुए दक्षिण
में हिंदी लघु पत्रिकाओं के प्रकाशन-अनुष्ठान की चर्चा भी की
गई है । अंत में भारतीय संविधान में हिंदी को राजभाषा दर्जा
मिलने के परिप्रेक्ष्य में विकसित राजभाषा पत्रकारिता का
विवेचन करते हुए दक्षिण भारत में राजभाषा हिंदी पत्रकारिता के
विकास की रूपरेखा प्रस्तुत की गई है ।
तृतीय अध्याय
‘तमिलनाडु
में हिंदी पत्रकारिता’
के अंतर्गत तमिलनाडु में हिंदी पत्रकारिता के उदय के आकलन सहित
स्वातंत्र्यपूर्व एवं स्वातंत्र्योत्तर युगों में हिंदी
पत्रकारिता का विश्लेषणात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है ।
तमिलनाडु में प्रकाशित सभी पत्र-पत्रिकाओं, कुछ राजभाषा
गृह-पत्रिकाओं का यथोचित परिचय कराने के बाद अंत में तमिलनाडु
में हिंदी पत्रकारिता के अतीत, वर्तमान और भविष्य संबंधी
निष्कर्ष दिया गया है ।
चतुर्थ अध्याय
‘आंध्र
प्रदेश में हिंदी पत्रकारिता’
पर केंद्रित है, जिसमें आंध्र प्रदेश में हिंदी पत्रकारिता के
उदय से लेकर हिंदी पत्रकारिता के उदय काल की सामाजिक, राजनीतिक
परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में हिंदी भाषा तथा पत्रकारिता
के समक्ष उपस्थित चुनौतियों की एक झांकी प्रस्तुत की गई है ।
स्वाधीनतापूर्व हिंदी पत्रकारिता संबंधी अध्ययन के साथ आर्य
समाजीय हिंदी पत्रकारिता का विवेचन भी प्रस्तुत किया गया है ।
आंध्र प्रदेश में स्वाधीनतापूर्व प्रकाशित हिंदी पत्रिकाओं का
परिचय देने के बाद आंध्र प्रदेश में स्वातंत्र्योत्तर हिंदी
पत्रकारिता का सम्यक विश्लेषण प्रस्तुत किया गया है ।
स्वातंत्र्योत्तर युग में आंध्र प्रदेश में बड़ी संख्या में
प्रकाशित हिंदी की समस्त पत्र-पत्रिकाओं का तथा कुछ राजभाषा
हिंदी गृह पत्रिकाओं का यथोचित परिचय कराने के बाद अंत में
आंध्र प्रदेश की हिंदी पत्रकारिता के अतीत, वर्तमान और भविष्य
की व्याख्या की गई है ।
पंचम अध्याय
‘केरल
में हिंदी पत्रकारिता’
के अध्ययन से संबद्ध है । केरल में हिंदी का प्रचलन, हिंदी
भाषाई चेतना के विकास संबंधी तथ्यों के विश्लेषण के बाद, केरल
की सामाजिक, राजनीतिक परिस्थितियों पर प्रकाश डाला गया है,
जिनका परवर्ती युग की पत्रकारिता पर प्रभाव रहा । केरल में
स्वाधीनतापूर्व प्रकाशित हिंदी पत्रिकाओं का परिचय देने के बाद
केरल की स्वातंत्र्योत्तर हिंदी पत्रकारिता का सम्यक अनुशीलन
किया गया है । स्वातंत्र्योत्तर काल में केरल से प्रकाशित सभी
हिंदी पत्रिकाओं तथा कुछ राजभाषा हिंदी की गृह-पत्रिकाओं का
परिचय प्रस्तुत करने के बाद अंत में केरल की हिंदी पत्रिकाओं
के अतीत, वर्तमान और भविष्य की व्याख्या निष्कर्ष के रूप में
की गई है ।
षष्ठ अध्याय
‘कर्नाटक
में हिंदी पत्रकारिता’
के अध्ययन पर आधारित है, जिसमें कर्नाटक की स्वातंत्र्योत्तर
हिंदी पत्रकारिता का सम्यक विवेचन प्रस्तुत किया गया है ।
कर्नाटक की सभी हिंदी पत्र-पत्रिकाओं तथा कुछ राजभाषा हिंदी की
गृह पत्रिकाओं के परिचय के बाद कर्नाटक में हिंदी पत्रकारिता
के अतीत, वर्तमान और भविष्य की व्याख्या की गई है ।
सप्तम अध्याय के अंतर्गत संघ शासित प्रदेश
‘पांडिच्चेरी
की हिंदी पत्रकारिता’
की एक झांकी प्रस्तुत की गई है ।
अष्ठम अध्याय में इस संपूर्ण शोध अध्ययन का निष्कर्ष
‘उपसंहार’
के शीर्षक से प्रस्तुत किया गया है । अंत में
‘परिशिष्ट’
के अंतर्गत कुछ प्रमुख हिंदी पत्रकारों, संपादकों का संक्षिप्त
परिचय दिया गया है । अंत में शोध अध्ययन में उपयोगी संदर्भ
ग्रंथों की सूची जोड़ दी गई है ।
दक्षिण भारत की हिंदी पत्रकारिता का लगभग एक शताब्दी का
गौरवपूर्ण इतिहास है, जिसके सम्यक अध्ययन करने तथा समग्र रूप
से अक्षरबद्ध करने की नितांत प्रासंगिकता है । इस क्षेत्र में
समग्र अध्ययन कहीं भी हुआ हो, यह मेरे ध्यान में नहीं आया था
। ऐसे अध्ययन के अभाव की पूर्ति करने का विनम्र प्रयास इस शोध
कार्य में हुआ है । हाल ही लोक भारती प्रकाशन, इलाहाबाद
द्वारा
‘दक्षिण
भारत की हिंदी पत्रकारिता’
शीर्षक से श्री रवींद्र कात्यायन की एक पुस्तक प्रकाशित हुई है
। श्री रवींद्र ने अपनी उक्त पुस्तक के अंतर्गत विषय विवेचन
के बाद अंत में दक्षिण भारत से प्रकाशित हिंदी पत्र-पत्रिकाओं
की अद्यतन सूची के शीर्षक से जो सूची प्रस्तुत की है उसमें एक
सौ ग्यारह पत्र-पत्रिकाओं के नामों का उल्लेख किया है । मेरे
इस शोध प्रबंध में लगभग ढ़ाई सौ पत्र-पत्रिकाओं की सूची शामिल
है । दक्षिण भारत से प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं में से आधे से
कम पत्र-पत्रिकाओं की चर्चा रवींद्र जी द्वारा की गई है । कई
महत्वपूर्ण प्रकाशनों का उक्त पुस्तक में उल्लेख तक नहीं किया
गया है । इसी तथ्य के आधार पर यह बात स्पष्ट होती है कि
रवींद्र जी के उक्त शोध-ग्रंथ की कई सीमाएँ हैं ।
इस शोध अध्ययन के सिलसिले में पत्रकारिता की तलाश में, पुरानी
पत्रिकाओं की खोज करते हुए मैंने पूरे दक्षिण भारत का भ्रमण
किया । प्राप्त सामग्री का उचित विश्लेषण, विवेचन एवं
मूल्यांकन किया । मुझे दक्षिण भारत के उन समस्त प्रदेशों में
पहुँचने का सौभाग्य मिला, जहाँ से हिंदी पत्र-पत्रिकाओं का
प्रकाशन हुआ था और उन प्रदेशों में भी जहाँ कई प्रकाशन जारी
हैं । इस क्रम में मैंने केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु एवं आंध्र
प्रदेश एवं पाडिच्चेरी का भ्रमण किया और कई छोटे-बड़े
पत्रकारों, साहित्यकारों से मुलाक़ात करके अपने शोध विषय से
संबंधित अनुभव एवं जानकारी का आदान-प्रदान किया है । कई
व्यक्तियों एवं सस्थाओं से सामग्री एवं तथ्यों के संकलन में
प्रत्यक्ष एवं परोक्ष सहयोग एवं सहायता प्राप्त हुआ है ।
इस शोध प्रबंध की परिधि इतना व्यापक है कि चाहते हुए भी बहुत
कुछ छोड़ देना पड़ा है । इस शोधकार्य से इस क्षेत्र के
अध्येताओं के लिए प्रेरणा मिलेगी ऐसा पूरा विश्वास है ।
दक्षिण भारत में ज्ञात, अज्ञात सभी समर्पित हिंदी सेवियों के
प्रति मेरी श्रद्धा का यह शोध-ग्रंथ एक प्रतीक मात्र है ।
मेरे इस शोध-कार्य में ज्ञात, अज्ञात, प्रत्यक्ष एवं परोक्ष
रूप से सहयोग करनेवाले सभी महानुभावों के प्रति मैं हृदय से
आभारी हूँ ।
1-2-3-4
डॉ. सी. जय शंकर बाबु
संपादक, 'युग मानस',
18 795 एफ़ 8-ए, तिलक नगर,
गुंतकल (आं.प्र.) – 515 8011
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