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सृजनगाथा

 

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वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

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।। शोध ।।

 

 

क्रमशः...

राष्ट्रीय आंदोलन, हिंदी प्रचार और पत्रकारिता 

 गांधीजी की संकल्प-निष्ठा और कई समर्पित हिंदी प्रचारकों की कर्तव्य-निष्ठा से हिंदी की रसमय धारा दक्षिण में प्रवाहित होने के साथ-साथ दक्षिण में हिंदी पत्रकारिता की नींव पड़ी थी । पत्रकारिता सामाजिक चेतना का महत्वपूर्ण तंत्र है ।  ग़ुलामी शासन के विरुद्ध उन्मुक्त आवाज़ के रूप में भारतीय पत्रकारिता का उदय कलकत्ता महानगर में हुआ था ।  स्वाधीनता आंदोलन के एक अभिन्न अंग एवं सशक्त हथियार के रूप में भारतीय भाषाई पत्रकारिता की नींव कलकत्ता में ही डाली गई थी ।

      

दक्षिण भारत में पत्रकारिता का उदय मद्रास महानगर (वर्तमान चेन्नई) में हुआ था और यहाँ के पत्रों ने भी राष्ट्रीयता की आवाज दी थी ।  हिंदी प्रचार के एक विशिष्ट आयाम के रूप में दक्षिण भारत में हिंदी पत्रकारिता की नींव भी मद्रास में ही डाली गई थी ।  स्वाधीनता आंदोलन के दिनों में दक्षिण भारत से तमिल, तेलुगु, कन्नड, मलयालम, उर्दू तथा अंग्रेज़ी आदि भाषाओं में अधिकांश पत्र-पत्रिकाएँ राष्ट्रीय भावनाओं से प्रेरित होकर ही प्रकाशित हो रही थीं ।  जनता में राष्ट्रीय चेतना जगाकर स्वाधीनता की संकल्पना को साकार बनाना ही इन पत्र-पत्रिकाओं का चरम लक्ष्य रहा ।  अपनी शैशवावस्था में अपनी सीमाओं में आबद्ध रहते हुए भी दक्षिण भारत की हिंदी पत्रकारिता ने हिंदी प्रचार आंदोलन को गति देने के द्वारा वास्तव में राष्ट्रीय चेतना जगाकर स्वाधीनता संग्राम के लिए अपेक्षित भावभूमि के निर्माण में भी यथोधिक योग दिया ।

      

जहाँ एक ओर दक्षिण में हिंदी प्रचार-प्रसार के अभिन्न अंग के रूप में हिंदी पत्रकारिता का आविर्भाव हुआ था वहीं दूसरी ओर स्वाधीनतापूर्व युग में ही धर्म रक्षार्थ एवं धर्म प्रचार-प्रसारार्थ भी छोटी-मोटी पत्र-पत्रिकाएँ भी प्रकाशित हुई थीं ।  विशिष्ट अर्थों में धार्मिक प्रकृति की होते हुए भी इन पत्र-पत्रिकाओं द्वारा सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय भावनाओं को अक्षुण्ण रखने का प्रयास किया गया था ।  इस प्रकार स्वाधीनता आंदोलन के दौर में दक्षिण में हिंदी में प्रकाशित पत्र-पत्रिकाओं ने निश्चय ही राष्ट्रीय भावना के परिपोषक की भूमिका अदा की थी ।

      

स्वाधीनता प्राप्ति के पश्चात् पूरी गरिमा के साथ दक्षिण में सांस्कृतिक-साहित्यिक हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन का दौर चल पड़ा ।  चारों राज्यों में कई समर्पित हिंदी सेवियों ने हिंदी पत्रकारिता के आलोक बढ़ाने की दिशा में उल्लेखनीय सेवा की है ।  दक्षिण भारत में आज तक सैकडों की संख्या में हिंदी पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित हुई हैं ।  इन पत्र-पत्रिकाओं की गरिमा, प्रासंगिकता और प्रभावकारिता को ध्यान में रखते हुए दक्षिण भारत की हिंदी पत्रकारिता का गौरवपूर्ण इतिहास लिखा जा सकता है ।

 

इतिहास लेखन, उपेक्षा और संवेदनात्मक पहलू 

आमतौर पर इतिहास की संज्ञा उसी प्रयास को दी जा सकती है, जिसमें अतीत का संभव सभी आयामों पर मूल्यांकन के रूप में अक्षरबद्ध प्रस्तुति हो ।  ज्ञान अथवा सूचना प्रस्तुत करने लिए योग्य अथवा संभव आयामों की उपेक्षा इतिहास लेखन का संकुचित पक्ष कहलाता है ।

      

दक्षिण में हिंदी भाषाई चेतना, हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार एवं प्रयोग की गौरवपूर्ण परंपरा, हिंदी साहित्यिक सर्जना एवं हिंदी पत्रकारिता के उल्लेखनीय विकास के बावजूद जहाँ तक मेरी जानकारी है हिंदी साहित्येतिहास संबंधी किस भी ग्रंथ में आज तक इसका सही मूल्यांकन नहीं हो पाया है, यह एक निष्ठुर एवं विस्मयजनक सत्य है ।  कई आलोचकों ने यह प्रश्न छेड़ दिया है कि हिंदी साहित्य तथा पत्रकारिता के इतिहास लेखन के तमाम प्रयासों में समग्रता की कमी है, हिंदी साहित्य के अधिकांश इतिहासकारों ने हिंदी भाषा, साहित्य तथा पत्रकारिता के लिए दक्षिण भारत के प्रदेयों की उपेक्षा की है ।  उस उपेक्षा से दक्षिण भारत के हिंदी साहित्यकारों के आत्मबल को क्षति पहुँचने की संभावना है ।  भारत में हिंदी पत्रकारिता संबंधी इतिहास ग्रंथों में भी दक्षिण भारत में हिंदी पत्रकारिता के उदय और विकास संबंधी विवेचन सर्वदा उपेक्षित रहा ।  यह बड़ विडंबना है ।

      

हिंदी भाषा, साहित्य एवं पत्रकारिता के विकास में दक्षिण के योगदान के आलोक में भी यहाँ के कई हिंदी सेवियों के अंतर्मन में छिपे संवेदनात्मक पहलू हमारे समक्ष उपस्थित हो जाते हैं ।  उत्तर के तथाकथित बुद्धिजीवियों, साहित्य के अन्वेषी-अध्येताओं और हिंदी साहित्य के इतिहासकारों ने इतिहास लेखन संबंधी तमाम प्रयासों में दक्षिण के हिंदी सेवियों, हिंदी साहित्यकारों तथा पत्रकारों के योगदान का मूल्यांकन नहीं के बराबर किया है ।  इस उपेक्षा को लेकर कई साहित्यकार निश्चित रूप से चिंतित हैं ।  एक संवेदनात्मक पहलू यह भी है कि दक्षिण भारत को अहिंदी प्रदेश की संज्ञा से अभिहित किया जा रहा है, जो सर्वदा ग़लत संबोधन है ।  जब हिंदी राष्ट्रभाषा मानी जाती है, राष्ट्र के किसी प्रदेश विशेष के लिए वह अछूत भाषा कैसी बन सकती है ?  ‘अहिंदी शब्द का भारतीय मूल की किसी भी भाषा, व्यक्ति के साथ जोड़कर प्रयोग करना असंगत एवं निरर्थक प्रयोग माना जाएगा ।  भारतीय यानी भारतवासी अथवा भारतीय मूल  के व्यक्ति के प्रति हिंदी या हिंदीतर अथवा तेलुगु भाषी, तमिल भाषी, कन्नड भाषी इत्यादि शब्दों का प्रयोग किया जा सकता है । दक्षिण भारत के वासियों की अपनी समृद्ध प्रादेशिक भाषाओं और मातृभाषाओं की मौज़ूदगी के बावजूद हिंदी के प्रति अनन्य प्रेम देखा जा सकता है ।  तथाकथित हिंदी प्रदेश के राज्यों के द्वारा आज प्राथमिक स्तर से ही शिक्षालयों में अंग्रेज़ी की पढ़ाई की व्यवस्था करने में जो रुचि दर्शायी जा रही है, जबकि भारतीय भाषा परिवेश में श्रेष्ठ चिंतन-अनुचिंतन के आधार पर प्रतिपादित त्रिभाषा-सूत्र के साथ हिंदी प्रदेशों का लेना-देना नहीं रह गया है ।  आज सिर्फ़ दक्षिण भारतवासी अपनी मातृभाषा अथवा प्रादेशिक भाषा के अलावा हिंदी सीखने के लिए तत्पर हैं ।  हाँ, तमिलनाडु में हुई कुछ छुट-पुट घटनाओं के कारण पूरे दक्षिण भारत पर एक कल्पनात्मक दाग बनी हुई है ।  इसी कारण आज अधिकांश हिंदी भाषी तमिलनाडु की ओर इशारा करने के लिए अपनी तर्जन को सक्षम मानते हैं ।  यहाँ हम सबको वास्तविक धरातल पर उतरकर इस प्रश्न को गहराई से समझने का प्रयास किया जाना चाहिए ।  अपनी स्वार्थ-सिद्धि हेतु तमिलनाडु की कुछ संकुचित मानसिकता के राजनीतिक तत्वों ने अपने कुछ अनुयायियों को असामाजिक शक्तियों के रूप में बदलकर भाषा के नाम पर बीभत्स मचाने की कोशिशें की थीं ।  तमिलनाडु ही नहीं, किसी भी प्रदेश में किसी भाषा के विरुद्ध भी ऐसी घटनाएँ हो सकती हैं, तब उसे जनमत मानना अथवा उस प्रदेश की जनता की राय मानना असमीचीन ही नहीं निरर्थक धारणा भी    कहलाएगी ।  यह स्पष्ट है कि तमिलनाडु में हिंदी विरोध जनता द्वारा हिंदी भाषा के प्रति प्रकट विरोध कदापी नहीं है ।  तमिलभाषी अपने बच्चों को हिंदी पढ़ाने के लिए तत्पर एवं प्रतिबद्ध हैं ।  जहाँ सरकार प्रबंधन के स्कूलों में हिंदी की पढ़ाई की व्यवस्था नहीं है, वहीं अभिभावक निजी स्कूलों में दाखिल करवाकर ही सही अपने बच्चों को हिंदी पढ़ाने की तत्परता दर्शा रहे हैं, यह गौर करने की बात है ।

      

भारतीय भाषाओं और हिंदी के प्रति दक्षिण के निश्छल प्रेम और निष्ठा के बावजूद अहिंदी शब्द का प्रयोग संकुचित मानसिकता की ओर इंगित करता है ।  तेलुगु भाषी हिंदी लेखक, कन्नड भाषी हिंदी लेखक जैसी संज्ञाओं से तो बात समझ में आ जती है ।  अहिंदी शब्द में हिंदी से अस्पृश्यता जैसी भावना का आभास दिलानेवाले शब्द के प्रयोग की परंपरा समाप्त हो जानी चाहिए ।  हिंदी के सर्जनात्मक लेखन की दिशा में अग्रसर होनेवाले लेखक को उसकी मातृभाषा के साथ भी न जोड़ते हुए हिंदी साहित्यकार की संज्ञा देना ही सर्वदा उचित और स्वागत योग्य प्रयास कहलाएगा ।  अहिंदी भाषियों का हिंदी साहित्य वाली संज्ञा के अनुरूप अहिंदी भाषियों की हिंदी, अहिंदी भाषियों की हिंदी पत्रकारिता जैसी भ्रांत संज्ञाएँ स्थाई अस्तित्व पाने में सफल न हो यही दक्षिण के हिंदी-प्रेमियों, हिंदी सर्जकों एवं हिंदी भाषियों की भी मन की संवेदना का मूल है ।

 

दक्षिण में इतिहास लेखन की परंपरा और हिंदी पत्रकारिता की उपेक्षा

बहरहाल दक्षिण में भी हिंदी प्रचार आंदोलन के इतिहास संबंधी कई ग्रंथ प्रकाशित हुए हैं, किंतु अधिकांश इतिहास ग्रंथों में पत्रकारिता पक्ष की उपेक्षा की गई है ।  कुछ ग्रंथों में हिंदी की दो-चार पत्र-पत्रिकाओं के नामों का उल्लेख के सिवाय कोई विवेचन नज़र नहीं आता है ।  दक्षिण में हिंदी भाषाई चेतना के विकास में हिंदी में मौलिक एवं अनूदित साहित्य के सृजन के लिए संबल देने में दक्षिण भारत की हिंदी पत्रकारिता के योगदान की चर्चा करने का साहस अथवा उदारता दिखानेवाले इतिहास लेखकों को उंगलियों पर गिना जा सकता है ।  इतिहास-चेतना से उद्वुद्ध दक्षिण के कुछ विद्वानों द्वारा इधर-उधर कुछ छोटे-मोटे लेखों के माध्यम से दक्षिण भारत की हिंदी पत्रकारिता का आभास दिलाने से बढ़कर आज तक दक्षिण भारत की हिंदी पत्रकारिता के इतिहास को अक्षरबद्ध करने का अथवा समग्र रूप से विस्तृत विवेचन प्रस्तुत करने का कोई उल्लेखनीय प्रयास नहीं हुआ है ।

 

प्रस्तुत शोध-अध्ययन, उद्देश्य और प्रासंगिकता 

इतिहास लेखन के संबंध में दक्षिण भारत की हिंदी पत्रकारिता के परिप्रेक्ष्य में ऊपर संदर्भित अभाव को दूर करने की दिशा में यह शोधकार्य एक प्रथम प्रयास है ।  इस अध्ययन में कोई पूर्वाग्रह अथवा पक्षपात नहीं है ।  दक्षिण में हिंदी भाषा, साहित्य एवं हिंदी पत्रकारिता के महत्व का रेखांकन, हिंदी भाषाई हित का चिंतन एवं अनुचिंतन, दक्षिण में हिंदी पत्रकारिता की दशा-दिशा का वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विश्लेषण एवं विवेचन ही इस शोध का मूल उद्देश्य है ।  तमाम संभव प्रयासों से प्राप्त तथ्यों तथा सामग्री के आधार पर आरंभ से आज तक दक्षिण भारत से हिंदी में प्रकाशित प्रायः सभी पत्र-पत्रिकाओं का अध्ययन और विवेचन इस शोध-प्रबंध में किया गया है ।

      

यद्यपि दक्षिण में जहाँ स्वाधीनता के पूर्व ही हिंदी प्रचार का सिलसिला आरंभ हो चुका था, तथापि आज तक यह लक्ष्य निश्चित रूप से पूरा नहीं हो पाया है ।  हिंदी के व्यापक प्रचलन हेतु काफ़ी प्रयासों की आवश्यकता पड़ेगी ।  इस दायित्व को पूरा करने में दक्षिण भारत की हिंदी पत्रकारिता अहम भूमिका निभा सकती है ।  मुख्यतः संविधान की आठवीं अनुसूची में विनिर्दिष्ट भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूप, शैली और पदों को आत्मसात करने, हिंदी के शब्द-भंडार की समृद्धि सुनिश्चित करने संबंधी संवैधानिक निदेशों के अनुपालन की दिशा में निश्चय ही दक्षिण भारत की हिंदी पत्रकारिता का सहयोग अपेक्षित होगा ।  इन सभी अंशों के आलोक में दक्षिण भारत में हिंदी भाषा के प्रचलन का जितना महत्व है, हिंदी पत्रकारिता के उदय और विकास का भी उससे कई गुना अधिक महत्व है ।

      

इस महत्व को रेखांकित करने की दिशा में आज तक कुछ छोटे-मोटे लेखों के माध्यम से कुछ प्रयास अवश्य किए गए हैं, किंतु दक्षिण भारत की हिंदी पत्रकारिता के समग्र अध्ययन का आज तक नितांत अभाव रहा है ।  इन सभी तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में दक्षिण भारत की हिंदी पत्रकारिता के उद्गम और विकास पर केंद्रित इस अध्ययन की प्रासंगिकता है ।

 

शोध-अध्ययन की कठिनाइयाँ

प्रस्तुत शोध अध्ययन में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है ।  सबसे बड़ी कठिनाई आधार सामग्र की रही ।  कई पुरानी पत्र-पत्रिकाओं के अंक आज दुर्लभ हैं ।  दक्षिण की हिंदी पत्रकारिता पर शोध प्रबंध लेखन हेतु तमाम पत्रिकाओं की फाइलें, अन्य तथ्यों से संबंधित आधार सामग्री कहीं एक जगह एकत्र मिलना संभव नहीं है ।  काफ़ी पुराने विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों में भी हिंदी की प्रतिष्ठित एकाध पत्रिकाओं की फाईलों अथवा कुछ अंकों के अलावा कुछ नहीं मिल पाए हैं ।  एक सौ वर्ष की कालावधि में प्रकाशित छोटी-बड़ी पत्रिकाओं को एकत्रित करना ही मेरे लिए एक चुनौती रहा ।  क्योंकि ये सारी पत्रिकाएँ दक्षिण भारत के कोने कोने में प्रकाशित हुई थीं जिनको संभालकर रखने की ओर तत्संबंधी कार्यालयों ने कोई प्रयास नहीं किया था ।  पत्रिकाओं के संग्रह कार्य में मैंने पूरे दक्षिण भारत का भ्रमण किया और यथा संभव इन पत्रिकाओं का संग्रह किया जिनके आधार पर यह विवेचन और मूल्यांकन संभव हो पाया है ।

      

लगभग साठ वर्ष पूर्व हिंदी पत्रकारिता पर प्रथम शोध ग्रंथ प्रस्तुत करनेवाले डॉ. रामरतन भटनागर ने अंग्रेज़ी में प्रस्तुत अपने शोध प्रबंध दि राइज एंड ग्रोथ ऑफ हिंदी जर्नलिजम (1826-1945) में उस समय उपस्थित कठिनाइयों का उल्लेख करते हुए निष्कर्ष एवं सुझावों के अंतर्गत पत्रिकाओं का एक स्थान पर उपलब्ध न होने की कठिनाई की ओर संकेत किया था और इस बात को भी रेखांकित किया था कि हिंदी पत्रकारिता के सार्थक एवं समग्र इतिहास की प्रस्तुति के लिए हिंदी पत्रों के कोश तथा वार्षिक निर्देशिकाएँ, हिंदी की आवधिक पत्रिकाओं की वर्गीकृत सूचियाँ, प्रत्येक पत्र-पत्रिका का इतिहास, हिंदी पत्रकारिता से संबद्ध व्यक्तियों के परिचय-पत्रक, श्रेष्ठ पत्रकारों की जीवनियाँ, राष्ट्र निर्माण के विभिन्न तत्व यथा – साहित्य, सामाजिक एवं राजनीतिक चेतना आदि की दृष्टि से पत्रकारिता के योगदान का विश्लेषण आदि की अपेक्षा होती है ।  किंतु उनकी अपेक्षाओं के अनुरूप माहौल आज तक भी नहीं बन पाया है ।  यही कारण है कि हिंदी पत्रकारिता के प्रामाणिक अनुसंधान के लिए और इतिहास लेखन के लिए आज भी रास्ता खुला हुआ नहीं है ।

 

पत्रकारिता के इतिहास लेखन की परंपरा

भारत में हिंदी पत्रकारिता के इतिहास को अक्षरबद्ध करने हेतु किए गए कुछ महत्वपूर्ण प्रयासों तथा दक्षिण में हिंदी पत्रकारिता संबंधी विषय पर लिखने की दिशा में किए गए प्रयासों का स्मरण भी करना चाहता हूँ ।

      

भारत में हिंदी पत्रकारिता के इतिहास लिखने का सर्वप्रथम प्रयास श्री बी. राधाकृष्णदास का रहा, जिन्होंने हिंदी के सामयिक पत्रों का इतिहास लिखा, जिसका प्रकाशन 1986 में वाराणसी के नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा किया गया था ।  उक्त ग्रंथ में 1845 से 1894 तक प्रकाशित 139 हिंदी पत्र-पत्रिकाओं की सूची मिलती है ।  इस ग्रंथ की प्रेरणा से श्री बी. बालमुकुंद गुप्त ने गुप्त निबंधावली के नाम से हिंदी, उर्दू पत्रकारिता पर भारत मित्र में प्रकाशित अपने लेखों को संकलित किया था ।  फ्रांसीसी इतिहासकार गार्सा-दा-तासी ने तीन खंडों में हिंदी हिंदुस्तानी के साहित्य का इतिहास लिखा है, जिसमें 1850 से 1876 के बीच प्रकाशित हिंदी उर्दू पत्र-पत्रिकाओं का उल्लेख मिलता है ।  तासी के ग्रंथ में दक्षिण के मिरातुल अख़बार (1834 में मद्रास से प्रकाशित) का उल्लेख मिलता है, जिसे तासी ने प्रथम उर्दू अख़बार की संज्ञा दी है ।  आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य का जो इतिहास लिखा था, शायद उसमें हिंदी पत्रकारिता के इतिहासपरक विवेचन प्रस्तुत करने का उनका कोई उद्देश्य नहीं रहा है, अतः कुछ महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं का विवरण तथा उनकी महत्वपूर्ण सामग्री से कुछ उल्लेखों से बढ़कर पत्रकारिता संबंधी कोई और उल्लेख उनके इतिहास ग्रंथ में नहीं मिलता है ।  डॉ. रामशंकर शुक्ल रसाल द्वारा लिखे गए हिंदी साहित्येतिहास में हिंदी पत्रकारिता पर एक समग्र विवेचन प्रस्तुत करने का प्रयास देखा जा सकता है ।

      

हैदराबाद निवासी श्री बंकटलाल जी ओझा ने अपने द्वारा संस्थापित हिंदी समाचारपत्र संग्रहालय की ओर से हिंदी समाचारपत्र-सूची के नाम से एक निर्देशिका किस्म की पुस्तक प्रकाशित की थी, जिसमें सन् 1826 से 1925 ई. तक निकलने वाले प्रायः सभी हिंदी पत्रों की तालिका प्रस्तुत की गई थी ।  उत्तर भारत से हिंदी पत्रकारिता पर केंद्रित इतिहास ग्रंथों, शोध प्रबंधों के लिए यही पुस्तक एक आधार ग्रंथ  रहा । 1925 तक दक्षिण से प्रकाशित हिंदी पत्र-पत्रिकाओं की संख्या उंगलियों पर ही गिनी जा सकती है। अतः उत्तर भारत के प्रबुद्ध विद्वानों को दक्षिण की हिंदी पत्र-पत्रिकाओं की संख्यात्मकता और गुणात्मकता का विवेचन प्रस्तुत करने से वंचित रहना पड़ा ।

      

श्री रामरतन भटनागर ने हिंदी पत्रकारिता पर प्रथम शोध ग्रंथ लिखा है, जिसे उन्होंने प्रयाग विश्वविद्यालय को प्रस्तुत किया है ।  उक्त शोध ग्रंथ में उन्होंने 1826 से 1945 तक की हिंदी पत्र-पत्रिकाओं पर विवेचन प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, जिसमें इधर-उधर से संग्रहित सूचियाँ जो प्रस्तुत हुई हैं उनमें दक्षिण से प्रकाशित हिंदी प्रचारक, दक्षिण भारत और आर्य भानु के नाम शामिल हो पाए हैं ।  भटनागर जी ने दक्षिण भारत के प्रकाशन की अवधि 1922 लिखा है, जो सही नहीं है ।  वास्तव में इसका प्रकाशन 1938 में हुआ था ।  लगभग आठ सौ पृष्ठों के अपने बृहद् शोध-ग्रंथ में उक्त संदर्भित बातों के अ