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काका अरगरे का जाना
जया केतकी
बात
उन दिनों की है जब मेरा विवाह हुआ और काका,
माई के साथ आशीर्वाद देने आए। उनकी वह
आकर्षक वेशभूषा और सधी हुई भाषा अनायास ही दिमाग में घर कर गई।
साथ ही माई का वह सादापन अविस्मरणीय रहे। फुरसत के क्षणों में
परिवार के साथ अक्सर उनकी चर्चा होती और किसी भी मुश्किल के
आने पर मैं काका का ध्यान करती और डटी रहती।
वे आते और समस्या को सुलझा जाते। अक्सर हम ज्वलंत विषयों पर
चर्चा करते। वह निर्भीकता और साहस से संघर्ष के गुर बताते और
हम संतुष्ट हो जाते।
जब भी कभी पारिवारिक आयोजन होते,
तो वे अपनी यादों के पन्ने खोलकर रख देते। एक बार जबलपुर का
जिक्र आते ही वह पुरानी यादों में खो गए और बताने लगे कि वे
भी क्या दिन थे जब सेठ गोविन्ददास जी,
श्री कस्तूरचंद गुप्त तथा कालिकाप्रसाद दीक्षित मुझे
पत्रकारिता के कठिन और कर्मठ मार्ग पर चलने की सूझबूझ दिया
करते थे। संयोगवश मैं भी जबलपुर से हूँ,
इसलिए मुझे जबलपुर के किस्से सुनने में कुछ ज्यादा ही रूचि
होती ।
पचास के दशक में उन्होंने पत्रकारिता क्षेत्र में सहसंपादक के
रूप में प्रवेश किया। उनमें कर्मठता के साथ ही लगन और विश्वास
भी भरपूर था। लगातार तीन वर्ष सहसंपादक रहे। यह वह समय था जब
विंध्य क्षेत्र के एकमात्र हिन्दी दैनिक
'जयहिन्द'
में श्री कस्तूरचंद गुप्त तथा कालिकाप्रसाद
दीक्षित के अंर्तगत उनकी कलम को संस्कार मिले।
जब उनके बत्रडे बेटे जयंत का विवाह सरिता से हुआ तो माई - काका
ने सभी मेहमानों की दिल से आवभगत की। रात में जब हम सब एकसाथ
भोजन कर रहे थे तो सरिता को देखकर माई ने अपने विवाह का किस्सा
सुनाया।
4जून
1956
को जब उनका काका के साथ ब्याह हुआ तो काका लगभग
28
वर्ष के थे। गर्मी पूरे शबाब पर थी और फिर ग्वालियर की गर्मी
में कुछ ज्यादा ही जोश था। गर्मी के मारे काका का बुरा हाल हो
रहा था। माई कभी अपना पल्लू सम्हालती तो कभी सात्रडी। तभी काका
को श्री ए.डी. मणि की याद हो आई जिन्होंने विवाह के दो दिन बाद
ऑफिस जाने पर काका को वापस घर भेज दिया था।
जब मेरे देवर के विवाह पर हम एकत्रित हुए तब काका हितवाद की
कमान सम्हाले थे। अचानक मित्रता की चर्चा शुरू हुई और सब अपनी
मित्रता के किस्से बत्रढ-चत्रढकर सुनाने लगे। तभी उनके
पत्रकारिता के क्षेत्र से जुत्रडे श्री रामेश्वर संगीत आए और
फिर जो बातें शुरू हुईं तो समय का किसी को ख्याल नहीं रहा। बात
के पक्के होने के साथ ही मित्रता के प्रति भी वह बहुत ईमानदार
और समर्पित रहे। मदन श्रीवास्तव,
श्याम सुन्दर शर्मा जी तथा अवस्थी चाचा से
उनकी मित्रता सबसे अधिक रही।
हमारे परिवार में कोई भी आयोजन होता तो वह माई को साथ लेकर ही
आते। माई भी काका की ही तरह कर्मठ महिला रहीं। उन्होंने नारी
के सम्मान और इज्जत को ही उसका आभूषण माना। मराठा परिवार की
बहू होने का अंदाजा माई को देखते ही हो जाता था। उनके सिर से
सात्रडी का पल्लू कभी नहीं गिरा। भोपाल की शासकीय कन्या शालाओं
में उन्होंने प्रचार्या के रूप में मार्गदर्शन दिया।
बात के पक्के होने के साथ ही काका मित्रता के प्रति भी बहुत
ईमानदार रहे। मदन श्रीवास्तव श्याम सुन्दर शर्मा जी,
अवस्थी जी,
चंदू काका और हितवाद के समय से संगीत चाचा के साथ उनकी मित्रता
की दृत्रढता को सभी को जानते हैं । दो मूर्धन्य पत्रकारो की
वैसी जोडत्री भोपाल मे दूसरी नही बनी। किसी भी वैचारिक सम्मेलन
में सभी मित्र मंडली साथ होती।
सन
2000
की बात है मेरे भान्जे को रायपुर जाना पत्रडा,
तभी मध्यप्रदेश के निर्माण का जिक्र निकल आया। काका बताने लगे
कैसे
'हितवाद'
के भोपाल संस्करण को लीड करने भोपाल आए।
1986
से उन्होंने हितवाद के संपादक का पद सम्हाला। उसके बाद तो एक
के बाद एक पत्रकारिता क्षेत्र के किस्से सुनाते चले गए।काका को
आंचलिक क्षेत्रों की सूचनाओं और विकास से काफी लगाव था।
उन्होंने श्रमजीवी पत्रकार संघ की गतिविधियों में भी सक्रिय
रूप से भाग लिया। अस्सी के दशक में भोपाल श्रमजीवी पत्रकार संघ
के अध्यक्ष भी बने और समूचे पत्रकार जगत को प्रभावित किया।
अपने परम मित्र रामेश्वर संगीत की मृत्यु पर जब भी बात करते,
उनका गला भर आता।
ईशान का सितार-वादन सुनकर अपने
48
वर्षों के प्रसारण हेतु किए गए आलेखन की
बात करते हुए कमली में अभिनीत भूमिका के बारे में बताया। जब भी
सोचते दूसरों के भले की सोचते। अनुवाद का कार्य भी बत्रडी रूचि
से करते । काका ने अनुवाद का कार्य शायद इसी उद्देश्य के साथ
किया, जिससे अंग्रेजी की कम समझ
वाले भी जानकारी प्राप्त कर सकें। । उन्होंने पत्रकारिता और
अर्थशास्त्र की कतिपय पुस्तकों का अनुवाद किया जो आज हिन्दी
ग्रंथ अकादमी में सुरक्षित हैं।
जया केतकी
45,
मंसब मंजिल रोड, भोपाल,
462001
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