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हम सब खड़े बाज़ार में
संजय द्विवेदी
भारतीय
बाज़ार एक नई करवट ले रहा है। उसका विस्तार चौंकाने वाला है और
समृध्दि चौंधियानेवाली। पिछले दस सालों में भारतीय बाज़ार का
विस्तारवाद कई तरह से निंदा और आलोचना के केंद्र में भी है।
बावजूद इसके यह बढ़ता जा रहा है और रोज नई संभावनाओं के साथ और
विस्तार ले रहा है। बाज़ार की भाषा,
उसके मुहावरे, उसकी
शैली और शिल्प सब कुछ बदल गए हैं। यह भाषा आज की पीढ़ी समझती है
और काफी कुछ उस पर चलने की कोशिश भी करती है।
भारतीय बाज़ार इतने संगठित रूप में और इतने सुगठित तरीके से
कभी दिलोदिमाग पर नहीं छाया था,
लेकिन उसकी छाया आज इतनी लंबी हो गई है कि
उसके बिना कुछ संभव नहीं दिखता। भारतीय बाज़ार अब सिर्फ़ शहरों
और कस्बों तक केंद्रित नहीं रहे। वे अब गाँव में नई संभावनाएं
तलाश रहे हैं। भारत गाँव में बसता है,
इस सच्चाई को हमने भले ही न स्वीकारा हो,
लेकिन भारतीय बाज़ार को कब्जे में लेने के लिए
मैदान में उतरे प्रबंधक इसी मंत्र पर काम कर रहे हैं। शहरी
बाज़ार अपनी हदें पा चुका है। वह संभावनाओं का एक विस्तृत आकाश
प्राप्त कर चुका है, जबकि ग्रामीण
बाज़ार एक नई और जीवंत उपभोक्ता शक्ति के साथ खड़े दिखते हैं।
बढ़ती हुई प्रतिस्पर्धा, अपनी बढ़त को
कायम रखने के लिए मैनेजमेंट गुरुओं और कंपनियों के पास इस गाँव
में झाँकने के अलावा और विकल्प नहीं है। एक अरब आबादी का यह
देश जिसके 73 फ़ीसदी लोग आज भी
हिंदुस्तान के पांच लाख, 72 हजार
गाँवों में रहते हैं, अभी भी हमारे
बाज़ार प्रबंधकों की जकड़ से बचा हुआ है। जाहिर है निशाना यहीं
पर है। तेज़ी से बदलती दुनिया,
विज्ञापनों की शब्दावली, जीवन में कई
ऐसी चीज़ों की बनती हुई जगह, जो कभी
बहुत गैरज़रूरी थी शायद इसीलिए प्रायोजित की जा रही है। भारतीय
जनमानस में फैले लोकप्रिय प्रतीकों,
मिथकों को लेकर नए-नए प्रयोग किए जा रहे हैं। ये प्रयोग
विज्ञापन और मनोरंजन दोनों दुनियाओं में देखे जा रहे हैं।
भारत का ग्रामीण बाज़ार अपने आप में दुनिया को विस्मित कर
देने वाला मिथक है। परंपरा से संग्रही रही महिलाएं,
मोटा खाने और मोटा पहनने की सादगी भरी आदतों
से जकड़े पुरूष आज भी इन्हीं क्षेत्रों में दिखते हैं। शायद इसी
के चलते जोर उस नई पीढ़ी पर है, जिसने
अभी-अभी शहरी बनने के सपने देखे हैं। भले ही गाँव में उसकी
कितनी भी गहरी जड़ें क्यों न हों। गाँव को शहर जैसा बना देना,
गाँव के घरों में भी उन्हीं सुविधाओं का पहुँच
जाना, जिससे जीवन सहज भले न हो,
वैभवशाली ज़रूर दिखता हो। यह मंत्र नई पीढ़ी के
गले उतारे जा रहे हैं। आज़ादी के 6
दशकों में जिन गाँवों तक हम पीने का पानी तक नहीं पहुँचा पाए,
वहाँ कोला और पेप्सी की बोतलें हमारी
लोकतांत्रिक व्यवस्था को मुँह चिढ़ाती दिखती हैं। गाँव में हो
रहे आयोजन आज लस्सी, मठे और शरबत की
जगह इन्हीं बोतलों के सहारे हो रहे हैं। ये बोतलें सिर्फ़
संस्कृति का विस्थापन नहीं हैं, यह
सामूहिकता का भी गला घोंटती हैं। गाँव में हो रहे किसी आयोजन
में कई घरों और गाँवों से मांगकर आई हुई दही,
सब्जी या ऐसी तमाम चीजें अब एक आदेश पर एक नए
रुप में उपलब्ध हो जाती हैं। दरी, चादर,
चारपाई, बिछौने,
गद्दे और कुर्सियों के लिए अब टेंट हाउस हैं।
इन चीज़ों की पहुँच ने कहीं न कहीं सामूहिकता की भावना को
खंडित किया है।
भारतीय बाज़ार की यह ताकत हाल में अपने पूरे विद्रूपता के साथ
प्रभावी हुई है। सरकारी तंत्र के पास शायद गाँव की ताकत,
उसकी संपन्नता के आंकड़े न हों,
लेकिन बाज़ार के नए बाजीगर इन्हीं गाँवों में
अपने लिए राह बना रहे हैं। नए विक्रेताओं को ग्रामीण भारत की
सच्चाइयाँ जानने की ललक अकारण नहीं है। वे इन्हीं जिज्ञासाओं
के माध्यम से भारत के ग्रामीण ख़जाने तक पहुँचना चाहते हैं।
उपभोक्ता सामग्री से अटे पड़े शहर, मेगा
माल्स और बाज़ार अब यदि ग्रामीण भारत में अपनी जगह तलाश रहे
हैं, तो उन्हें उन्हीं मुहावरों का
इस्तेमाल करना होगा, जिन्हें भारतीय
जनमानस समझता है। विविधताओं से भरे देश में किसी संदेश का
आख़िरी आदमी तक पहुँच जाना साधारण नहीं होता। कंपनियां अब ऐसी
रणनीति बना रही हैं, जो उनकी इस चुनौती
को हल कर सकें। चुनौती साधारण वैसे भी नहीं है,
क्याेंकि पांच लाख, 72
हजार गाँव भर नहीं, वहाँ बोली जाने
वाली 33 भाषाएं, 1652
बोलियाँ, संस्कृतियाँ,
उनकी उप संस्कृतियाँ और इन सबमें रची-बसी
स्थानीय भावनाएं इस प्रसंग को बेहद दुरूह बना देती हैं। यह
ग्रामीण भारत, एक भारत में कई भारत के
सांस लेने जैसा है। कोई भी विपणन रणनीति इस पूरे भारत को एक
साथ संबोधित नहीं कर सकती। गाँव में रहने वाले लोग,
उनकी ज़रूरतें, खरीद
और उपभोग के उनके तरीके बेहद अलग-अलग हैं। शहरी बाज़ार ने जिस
तरह के तरीकों से अपना विस्तार किया वे फ़ार्मूले इस बाज़ार पर
लागू नहीं किए जा सकते। शहरी बाज़ार की हदें जहाँ खत्म होती
हैं, क्या भारतीय ग्रामीण बाज़ार वहीं
से शुरू होता है, इसे भी देखना ज़रूरी
है। ग्रामीण और शहरी भारत के स्वभाव,
संवाद, भाषा और शैली में जमीन-आसमान के
फ़र्क हैं। देश के मैनेजमेंट गुरू इन्हीं विविधताओं को लेकर
शोधरत हैं। यह रास्ता भारतीय बाज़ार के अश्वमेध जैसा कठिन
संकल्प है। जहाँ पग-पग पर चुनौतियाँ और बाधाएं हैं।
भारत के गाँवों में सालों के बाद झाँकने की यह कोशिश भारतीय
बाज़ार के विस्तारवाद के बहाने हो रही है। इसके सुफल प्राप्त
करने की कोशिशें हमें तेज़ कर देनी चाहिए,
क्योंकि किसी भी इलाके में बाज़ार का जाना
वहाँ की प्रवृत्तियों में बदलाव लाता है। वहाँ सूचना और संचार
की शक्तियां भी सक्रिय होती हैं,
क्योंकि इन्हीं के सहारे बाज़ार अपने संदेश लोगों तक पहुँचा
सकता है। जाहिर है यह विस्तारवाद सिर्फ़ बाज़ार का नहीं होगा,
सूचनाओं का भी होगा,
शिक्षा का भी होगा। अपनी बहुत बाज़ारवादी आकांक्षाओं के बावजूद
वहाँ काम करने वाला मीडिया कुछ प्रतिशत में ही सही,
सामाजिक सरोकारों का ख्याल ज़रूर रखेगा,
ऐसे में गाँवों में सरकार,
बाज़ार और मीडिया तीन तरह की शक्तियों का
समुच्चय होगा, जो यदि जनता में
जागरूकता के थोड़े भी प्रश्न जगा सका,
तो शायद ग्रामीण भारत का चेहरा बहुत बदला हुआ होगा। भारत के
गाँव और वहाँ रहने वाले किसान बेहद ख़राब स्थितियों के शिकार
हैं। उनकी जमीनें तरह-तरह से हथियाकर उन्हें भूमिहीन बनाने के
कई तरह के प्रयास चल रहे हैं। इससे एक अलग तरह का असंतोष भी
समाज जीवन में दिखने शुरू हो गए हैं। भारतीय बाज़ार के नियंता
इन परिस्थितियों का विचार कर अगर मानवीय चेहरा लेकर जाते हैं,
तो शायद उनकी सफलता की दर कई गुना हो सकती है।
फिलहाल तो आने वाले दिन इसी ग्रामीण बाज़ार पर कब्जे के कई
रोचक दृश्य उपस्थित करने वाले हैं,
जिसमें कितना भला होगा और कितना बुरा इसका आकलन होना अभी बाकी
है?
संजय द्विवेदी
स्थानीय संपादक,
दैनिक हरिभूमि
रायपुर,
छत्तीसगढ़
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