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नेपाल: राजशाही का अन्त और माओवाद का उदय
तनवीर जाफ़री
दक्षिण
एशिया की हिमालय पर्वत श्रृंखला व इसकी तराई में पड़ने वाला
लगभग
147181
वर्ग किलोमीटर क्षेत्र के भू भाग वाला नेपाल
देश इन दिनों राजनैतिक परिवर्तन के एक ऐतिहासिक दौर से गुज़र
रहा है। उत्तर दिशा में चीन व तिब्बत तथा दक्षिण पूर्व व
पश्चिम क्षेत्रों में भारतवर्ष से घिरे हुए लगभग 800
किलोमीटर लम्बे व 200
किलोमीटर चौड़े इस छोटे से देश में सैकड़ों वर्ष से चली आ रही
राजशाही का सूर्य अब अस्त होने जा रहा है। नेपाल दुनिया का
अकेला ऐसा देश है जहाँ 85 प्रतिशत से
अधिक नागरिक हिन्दू धर्मावलम्बी हैं। यह प्रतिशत भारत में
हिन्दुओं की प्रतिशत संख्या से भी अधिक है। यही वजह है कि
नेपाल को हिन्दू राष्ट्र के रूप में जाना व पहचाना जाता था।
परन्तु अब भारत का निकटस्थ पड़ोसी यह देश राजनैतिक परिवर्तन की
एक ऐसी नई इबारत लिखने जा रहा है जिसे पूरा विश्व आश्चर्यचकित
होकर देख रहा है।
गत दिनों नेपाल में सम्पन्न हुए आम चुनावों में नेपाली
कम्यूनिस्ट पार्टी (माओवादी) को अप्रत्याशित रूप से बड़ी सफलता
हासिल हुई है। नेपाली संसद की कुल
601
सीटों पर चुनाव सम्पन्न हुए थे। इसमें 240
सीटों पर तो प्रत्यक्ष रूप से उम्मीदवारों का चुनाव सम्पन्न
हुआ जबकि 365 सीटों पर समानुपातिक
पद्धति द्वारा चुनाव कराए गए। समानुपातिक पद्धति से हुए चुनाव
में मतदाताओं द्वारा सीधे उम्मीदवारों का चयन करने के बजाए
अपनी पसन्द की पार्टी को चयनित किया गया। इन चुनावों के
परिणामों में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) को आश्चर्यजनक
ढंग से बड़ी सफलता हासिल हुई तथा वह देश के सबसे बड़े राजनैतिक
दल के रूप में उभर कर सामने आई है। इस बात की प्रबल सम्भावना
है कि माओवादियों की ओर से अपने प्रमुख नेता पुष्प कमल दहल
प्रचण्ड को नेपाल के प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तावित किया
जाएगा। चूंकि नेपाल में वर्तमान संविधान के अन्तर्गत
राष्ट्रपति के पद का कोई प्रावधान नहीं है अत: ऐसी संभावना भी
व्यक्त की जा रही है कि माओवादियों द्वारा सरकार का गठन करने
के पश्चात नेपाल के वर्तमान संविधान को संशोधित किया जाए तथा
इसमें राष्ट्रपति पद की व्यवस्था करते हुए प्रचण्ड को नेपाल का
प्रथम राष्ट्रपति बना दिया जाए। ज्ञातव्य है कि नेपाल की सत्ता
के शिखर पर सुशोभित होने जा रहे ब्राह्मण कुल में जन्मे
54 वर्षीय प्रचण्ड पेशे से एक स्कूल शिक्षक
रहे हैं। इनके नेतृत्व में माओवादियों ने राजशाही के विरोध में
नेपाल में नेपाली सरकार तथा नेपाली सेना को पूरी चुनौती देते
हुए गृहयुद्ध जैसे हालात पैदा कर दिए थे। लगभग 13000
लोग इस गृहयुद्ध की भेंट पर चढ़ चुके थे। कई
वर्षों के लम्बे संघर्ष के बाद नवम्बर 2006
में माओवादियों ने हिंसा का रास्ता छोड़कर
मुख्यधारा की राजनीति में सक्रिय होने का फ़ैसला किया था। इसके
बाद ही संयुक्त राष्ट्र संघ की मध्यस्थता में नेपाली राजशाही
के अधीनस्थ चलने वाली नेपाली सरकार,
नेपाल सेना व माओवादियों के मध्य विश्वास बहाली के उपाय किए
गए। इन प्रयासों के तहत माओवादियों को नेपाल में गृहयुद्ध
समाप्त करने, हथियार छोड़ने तथा
लोकतांत्रिक तरीक़े से चुनाव में भाग लेकर नेपाली जनता से
संवाद करने हेतु उन्हें राज़ी किया गया। सन् 2006
में माओवादियों व नेपाल सरकार के मध्य हुए इस
समझौते के पश्चात एक अंतरिम सरकार का गठन किया गया। इसमें
माओवादियों को भी शामिल किया गया। इसी अंतरिम सरकार द्वारा
नेपाल में राजशाही समाप्ति की घोषणा तो की ही गई,
साथ-साथ नेपाल के साथ लगा हिन्दू राष्ट्र का
शब्द भी हटा लिया गया तथा इसे एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र घोषित
कर दिया गया। जैसे-जैसे माओवादियों द्वारा नेपाल की सत्ता
को नेतृत्व प्रदान किए जाने का समय नज़दीक आता जा रहा है,
पूरे विश्व की निगाहें बड़ी उत्सुकता से नेपाल
में होने जा रहे इस ऐतिहासिक राजनैतिक परिवर्तन को अत्यन्त
सूक्ष्मता से देख रही है। कल तक आतंकवादी कहे जाने वाले,
जंगलों में अपने प्रशिक्षण शिविर चलाने वाले,
अवैध हथियारों से लैस लाखों माओवादी अब नेपाल
में शासन की बागडोर संभालने जा रहे हैं। दुनिया की नज़रों इस
पर भी टिकी हैं कि कई वर्षों तक माओवादियों से संघर्षरत रही
नेपाली सेना तथा अन्य नेपाली सुरक्षा एजेन्सियां आख़िर इन
माओवादियों से किस प्रकार अपना तालमेल बिठा सकेंगी। एक और
चिंताजनक बात यह भी है कि नेपाल में हुए संसदीय चुनावों के
फ़िलहाल आए परिणामों से यह भी ज़ाहिर हो रहा है कि माओवादी देश
के सबसे बड़े राजनैतिक दल के रूप में तो नेपाली संसद में ज़रूर
प्रवेश कर गए हैं परन्तु ताज़ातरीन चुनाव नतीजों के अनुसार
उन्हें सरकार चलाने हेतु पूर्ण बहुमत नहीं मिल सका है।
सम्पूर्ण चुनाव परिणाम आने तक यदि उन्हें पूर्ण बहुमत प्राप्त
हो गया फिर तो नेपाल में माओवादियों की अकेली सरकार स्थापित हो
जाएगी अन्यथा उन्हें सरकार चलाने हेतु पूर्ण बहुमत हासिल करने
के लिए किसी सहयोगी राजनैतिक दल का सहारा लेना पड़ सकता है।
परन्तु यदि ऐसी स्थिति पैदा हुई तो भी एक समस्या इसलिए उत्पन्न
हो सकती है क्योंकि माओवादी विचारधारा अन्य राजनैतिक दलों के
साथ बिल्कुल मेल नहीं खाती। इसका मुख्य कारण यह है कि
विचारधारा में बुनियादी अन्तर होने की वजह से माओवादी किसी के
साथ मिलजुल कर काम करने के आदी नहीं हैं।
तो क्या सत्ता में आने के बाद भी माओवादियों के तेवर उसी
प्रकार आक्रामक होंगे जैसा कि सत्ता में आने से पूर्व नेपाली
सरकार व नेपाली सेना व उनके मध्य हुए संघर्ष के दौरान थे?
या फिर उनमें कोई क्रांतिकारी परिवर्तन देखा
जा सकेगा। यह जानने के लिए माओवादियों के प्रमुख नेताओं के
नेपाल नरेश राजा ज्ञानेन्द्र के विषय में दिए जाने वाले
वक्तव्यों में निरंतर आते जा रहे परिवर्तनों को बड़े ग़ौर से
देखना होगा। हालांकि अंतरिम सरकार बनते ही राजशाही समाप्त करने
की घोषणा कर दी गई थी। परन्तु जैसे-जैसे चुनाव का समय नज़दीक
आता गया तथा माओवादियों को इस बात का एहसास होने लगा कि चुनाव
में उन्हें सत्ता हासिल हो जाएगी,
वैसे-वैसे राजा ज्ञानेन्द्र के प्रति माओवादियों का रुख़ और
सख्त होता गया। बातें यहाँ तक की जाने लगीं कि राजा
ज्ञानेन्द्र से राजधानी स्थित उनका शाही महल 'नारायणहिती'
ख़ाली करा लिया जाएगा। ऐसी भी ख़बरें थी कि राजा को गिरफ़्तार
कर जेल में भी डाला जा सकता है। उधर अभी कुछ दिनों पूर्व ही यह
ख़बर भी फैली थी कि राजा ज्ञानेन्द्र नेपाल छोड़कर भारत में शरण
ले सकते हैं। परन्तु माओवादियों के एक प्रमुख नेता द्वारा राजा
ज्ञानेन्द्र के संबंध में जो ताज़ातरीन बयान दिया गया है उसके
अनुसार राजा ज्ञानेन्द्र को नेपाल की राजशाही का प्रतीक समझे
जाने वाले इस राजमहल को छोड़ने के लिए तो अवश्य कहा जाएगा
परन्तु उन्हें नेपाल में ही स्थिति एक अन्य पैलेस में रहने का
अवसर दिया जाएगा। इस बात से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि सत्ता
में आने से पूर्व तथा सत्ता में आने के बाद माओवादियों की सोच
व कार्यशैली में एक क्रांतिकारी परिवर्तन आना संभावित है।
बहरहाल नेपाल में नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी माओवादी सत्तासीन
होने जा रही है। मज़दूरों,
किसानों व ग़रीबों का प्रतिनिधि होने का दावा
करने वाली इस पार्टी के सत्ता में आने के बाद निश्चित रूप से
कामगार वर्ग में काफ़ी उम्मीदें जगी हैं। यदि माओवादी उनकी
उम्मीदों पर खरे उतरते हुए कामगार,
मज़दूर व किसान वर्ग को रचनात्मक रूप से राहत पहुँचा पाने में
सफल होते हैं जैसी कि कामगार वर्ग को इनसे उम्मीद भी है,
फिर तो सत्ता में आने पर इनका स्वागत किया
जाना चाहिए। परन्तु इसके साथ-साथ इन्हें उच्चवर्ग,
पूँजीपति वर्ग तथा उद्योगपति वर्ग के साथ अपने
पारंपरिक विद्वेष को भी समाप्त करने की सख्त ज़रूरत है।
क्योंकि देश के विकास के लिए उद्योगपतियों,
कामगारों, ज़मींदारों
व खेतीहर मज़दूरों सभी के मध्य आपसी तालमेल व सामंजस्य का होना
नितांत आवश्यक है। आशा की जानी चाहिए कि माओवादी न सिर्फ नेपाल
में एक अच्छा ख़ुशगवार व प्रगतिशील शासन देंगे बल्कि भारत जैसे
अपने पड़ोसी एवं प्रमुख सहयोगी देश के साथ भी भारत व नेपाल के
मध्य सैकड़ों वर्ष से क़ायम पारम्परिक रिश्तों में और भी मजबूती
पैदा करेंगे।
तनवीर जाफ़री,
सदस्य, शासी परिषद,हरियाणा साहित्य अकादमी
22402, नाहन हाऊस,
अम्बाला शहर, हरियाणा
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