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सृजनगाथा

 

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वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

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।। मूल्याँकन ।।

 

 

स्वाधीनता के असाधारण बिम्ब हैं दद्दा


डॉ. विजय बहादुर सिंह

 

जैसे विवेकानंद को कोरा सन्यासी, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को कोरा राजनेता कहकर टाला नहीं जा सकता, ठीक उसी तरह दद्दा के नाम से जाने जाने वाले माखनलाल चतुर्वेदी को कोरा साहित्यिक या विशुद्ध कवि कहकर भी हम नहीं टाल सकते । भारत की 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध से लेकर भी सवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक चेतना की तरंगों का अध्ययन करने पर यह साफ अनुभव होगा कि ये दिन नवजागरण और अंगड़ाई  के दिन हैं। जातीय जीवन के दर्पण में अपने बुनियादी चेहरे और उसकी पहचान के दिन । माखनलाल चतुर्वेदी जैसे कार्यकर्ता और आंदोलनी कवि इन्हीं दिनों की उपज हैं । नवजागरण और राष्ट्रीय आंदोलन के  अर्न्तवर्ती स्वरूप को समझे बगैर माखनलाल जैसे कवियों और लेखकों को समझना अत्यंत मुश्किल होगा ।

 

इस भूमिका पर जो पहली बात कही जा सकती है वह यह कि भक्ति आंदोलन के बाद पहला ऐसा आंदोलन है जहां साहित्य और राजनीति एक-दूसरे की मदद के लिए आगे आते हैं और एक-दूसरे का भरोसेमंद साथ देते हैं । भक्ति आंदोलन में साहित्य और सामाजिक जीवन-दर्शन अध्याय बोध और क्रांतिकारी धर्म भावना एक साथ प्रकट होते हैं । आज जो लोग भक्ति आंदोलन और उसके महान कवियों की एक खास तरह की राजनीतिक दृष्टि या विचारधारा से अध्ययन कर रहे हैं, इसकी आजादी तो उन्हें है पर हम पाठकों को यह पूछने की भी आजादी है कि कभी र का रहस्यवाद अगर कभी र काव्य से बाहर ला दिया जाए तो कभी र अपनी सामाजिक दृष्टि और तीखी आलोचनात्मक उक्तियों में कितने बचते हैं ? भक्ति आंदोलन को ठेठ साहित्यिक कसौटियों पर देख पाना मुश्किल होगा । तथापि वह एक साहित्यिक आंदोलन भी है । उसी तरह आजादी के आंदोलन की प्रेरणाओं से लिखी गई कविता को भी विशुद्ध साहित्यिक मानदंडों पर कसने के भी अपने खतरे होंगे । माखनलाल ही क्यों, मैथलीशरण गुप्त, हरिओम, राम नरेश त्रिपाठी भी और यहां तक कि भारतेन्दु हरिश्चंद्र और प्रेमचंद भी इस खतरे से बाहर नहीं हैं । साहित्य के पाठको और रसिकों को यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि प्रतिभा का पहला लक्षण अनुगमन नहीं है । बनी-बनाई राहों पर चलना प्रतिभा के प्रति संदेह पैदा करता है । उससे एक खास तरह का शास्यवाद या रीतिवाद पनपता है । कला की खूबसूरती उसकी मौलिकता में है । दुनिया को देखने की एक नई निगाह और कहने का एक नया अंदाज ! कहते हैं, है गालिब का अंदाजे बयां और, इसलिए जो लोग अपने पूर्ववर्तियों अथवा समकालीनों का अनुगमन करते हैं; वे बने-बनाए रास्तों के पथिक तो कहे जा सकते हैं पर नई राहों के प्रवर्तक और प्रस्थानकर्ता तो कतई नहीं ।

 

भक्ति आंदोलन के चारों बड़े कवियों: कभी र दास, मालिक मोहम्मद जायसी, सूरदास और तुलसीदास यहां तक कि पांचवी मीरा बाई को भी देखें तो साफ पता चलेगा कि कोई एक भी दूसरे का अनुसरण और अनुगमन नहीं करता । सबकी भाषा का अंदाज अलग है । यहां तक कि विग्रह का स्वरुप भी । काव्य विज्ञान ते सर्वता अलग ।

 

राष्ट्रीय आंदोलन के कवियों में अगर मैथिलीशरण गुप्त, माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्रा कुमारी चौहान और बालकृष्ण शर्मा नवीन को देखें तो पता चलेगा कि गुप्त, जी गौरवपूर्ण अतीत की मार्मिक स्मृतियों से भरे हुए हैं तो सुभद्रा जी इतिहास के बलिदानी चरित्रों के गाता गान से । नवीन में विद्रोह और क्रांति की  बेचैनियां और उथल-पुथल हैं तो माखनलाल में आत्मोत्सर्ग की तीव्रता और प्रबलता । मैथिली शरण राष्ट्रीय आंदोलन के सहचर कवि के रुप में आते हैं, माखनलाल जी आंदोलन के प्रत्यक्ष कार्यकर्ता, नेता और नायक भी । बहुत कुछ यही स्थिति सुभद्रा जी की भी है । वे भी प्रत्यक्ष राजनीतिक में हैं । अगर सहित्य उन्हें भुला भी देना चाहे तो राजनिति का इतिहास उनकी अग्निधर्मी चेतना को याद रखने को मजबूर होगा । उनका जीवन उनकी राजनीति उनका साहित्य जिस तरह एकमेव और अभिन्न हैं वे अपनी आलोचना में इतने साम्प्रदायिक फार्मूलाबाजी और परिप्रेक्ष्य विहीन हो चले हैं कि आलोचना विचारधारा और उसके जड़ शस्त्रवाद के हवाले हो उठी है । सुभद्रा जी के साथ अगर अब भी अन्याय जारी है तो कारण यही है । माखनलाल जी की कुछ और भी दिक्कते हैं । वे एक महान पत्रकार तो हैं ही, स्वतंत्रता सेनानी और देशभक्त भी हैं। उनकी लय भी जानी-पहचानी पर उनके शब्द जीवन-साध्रा की जिस भट्ठी से तप कर निकल रहे और लपटें फेके रहे हैं, उसकी तीखी आंच से भाषा ज्वालामुखी हो उठी है।

 

आज इस पर क्यों नहीं सोचा जाना चाहिए कि माखनलाल जी देश की जिस भट्ठी में तप रहे थे, वह सत्ता-राजनीति की थी या फिर वहीं जिसका संबंध न केवल गांधी बल्कि भगत सिंह आदि से भी ता। माखनलाल जी पिस्तौल भी रखते थे। वे तिलक के अंगरक्षकों में थे पर इतने सच्चे और समर्पित किस्म के इंसान थे कि अपने देश वासियों के भावात्मक मोड़ों और वैचारिक बदलावों के प्रति अत्यन्त सचेत थे। उनके बाद हिन्दी में दूसरे कोई उस तरह के कवि दिखते हैं तो पहले नागार्जुन और दूसरे भवानी प्रसाद मिश्र । माखनलाल जी की तरह इन्हें भी जन-राजनीति और उसके आन्दोलनों से कभी कोई परहेज नहीं रहा । भवानी मिश्र तो सन 42 में भारत छोड़ो आन्दोलन के दौरान साढ़े तीन बरस नागपुर जेल में रहे । नागार्जुन स्वामी सहजानंद द्वारा प्रवर्तित किसान आन्दोलन में इससे पहले जेल गये पर 1975 में जब इन्दिरा गांधी ने आपातकाल घोषित कर दिया तब भी यो दोनों बूढ़े कवि हिन्दी लेखकों और कवियों की लाज रखने को आगे आए । नागार्जुन तो 18 महीने फिर आजाद भारत की जेलों में रहे। भवानी मिश्र त्रिकाल संध्या करते आपात काल के खात्मे के अभियान में जुटे रहे ।

 

तीसरा नाम जो इसी में होम हो गया, वह थे कताकार फणीश्वर नाथ रेणु। बाकी जिसने भी जाने-पहचनाने छद्म क्रांतिकारी और प्रगतिशील थे, सबके सब इंदिरा और उनके आपातकाल के समर्थन और वाहवाही में जुट गए ।  बाद में ये ही लोग प्रतिष्ठान द्वारा तरह-तरह से नवाजे गए।

 

यह इतिहास इसलिए लिख रहा हूं कि माखनलाल जी का व्यक्तित्व और चरित्र पहचानने का कोई आधार तैयार किया जा सके। वे सत्ता के लिए राजनीति करने वालों में से अगर होते तो आज उनके प्रति लोकमानस में जो पूज्यभाव है वह कदापि न होता; उनकी कविता भी राष्ट्रीय आंदोलन के नारों की अनुगूंज मात्र होकर रह गई होती। ऐसा नहीं है। उनकी पत्रकारिता अगर उनका एक हथियार है तो कविता दूसरा अस्त्र। वे मुझे बार-बार चतुर्भुजी विष्णु के रूप में दिखाई देते हैं जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा-पद्म हैं। पत्रकारिता, कविता, साहित्य-देवता जैसे निबंध और एक समर्पित कार्यकर्ता के रूप में उनकी सक्रियता और प्रत्यक्षता हमें उनकी राजनीति, उनके साहित्य, उनकी देशभक्ति का एहसास दिलाती है।

 

आज यह कहना और भी मुश्किल हो उठा है कि वे कार्यकर्ता बड़े थे या पत्रकार या फिर लेखक और कवि के रूप में ? माखनलाल जी को अलग करके देखने से उनको पूरा देख पाना संभव न होगा। इन दिनों हम परिपूर्णता वाली दृष्टि छो़ड़ आए हैं । गांधी पत्रकार थे या राजनेता, कभी र संत थे या समाज सुधारक;  इस तरह के सवाल उठाने में हमे अपने अपूर्णता प्रामाणिक सी लगती जान पड़ती है। माखनलाल जी को भी हम इसी तरह देखने का अभियान चलाते रहते हैं। यह भूल ही जाते हैं कि जिस ईश्वर की कल्पना हमने कर रखी है वह सर्वव्यापी ही नहीं सर्वशक्तिमान भी है। वह सगुण भी है, निर्गुण  भी। वह आदमी की तरह चलता फिरता, माया-विभोर भी है और माया से ऊपर-जल में कमल की तरह उठा हुआ भी। यही हमारी जातीय दृष्टि है। इस कसौटी पर जब हम माखनलाल जी जैसे कवियों को देखते हैं तब कहना पड़ता है कि वे साहित्य में होकर भी साहित्य से ऊपर उसी तरह है जिस तरह राजनीति के तमाम दल-दल और कीचड़ के भी च उससे ऊपर उसी तरह है जिस तरह राजनीति के तमाम दल-दल और कीचड़ के भी च उससे ऊपर वे रहे । सो, उन पर कोई प्रचलित प्रतिमान (वह चाहे साहित्य का हो जारे राजनीति का) कारगर न होगा। इसे दूसरे ढंग से कहूं तो वे राजनीति में भी आत्मनिर्वासित व्यक्ति की तरह रहे, साहित्य में भी; पत्रकारिता में भी वे जिन मूल्यों के लिए तपते रहे, वे मूल्य विलुप्त प्राय हैं। साहित्य में उनकी रूक्षता, अनगढ़ता, उनकी अकाव्यात्मक सी बनावट और खुरदुरी पहचान का सौंदर्य उनकी उस तेजस्वी दृष्टि में निवास करती है, जिससे साहित्य के प्रति परिवर्तनकारी समाज के मन में भरोसा और निष्ठा का भाव जन्म लेता है।

 

सच तो यह कि वे भी सवीं सदी के उन आधुनिक ऋषियों में से है जिनके शब्द मंत्र की तरह आज भी याद किए जाते हैं । वे भी सवीं सदी के भारतीय पौरूष और पुरूषार्थ के प्रतीक हैं। वे व्यक्ति होकर भी हमारी स्वाधीन चेतना और उसकी जूझारू छवियों के जनप्रयि किंतु असाधारण बिम्ब हैं। उनके इस बिम्ब को बचाकर रखना हमारी राष्ट्रीय जिम्मेदारी है।

    डॉ. विजय बहादुर सिंह

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अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

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