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नारी विमर्श
डॉ. अजित गुप्ता
क्या
है नारी विमर्श
?
नारी पर चिंतन कभी थमता क्यों नहीं
?
समाज का वह कौन सा सत्य है जो नारी को सदैव
सुखिर्यों में रखता है
?
कल भी और आज भी,
नारी एक ओर जगत्जननी के रूप में दिखायी
देती है तो दूसरी तरफ रति-स्वरूपा। जगत्जननी और रति का संघर्ष
आज का नहीं है,
यह
सदियों पुराना है। लेकिन कल और आज में एक वृहत् अन्तर दिखायी
देता है।
कल तक पुरुष
चरित्र को संस्कारित करने के लिए प्रयत्न किए जाते थे,
उसे सतत इंद्रिय-निग्रह का
पाठ पढाया जाता था,
लेकिन आज पुरुष संस्कार की बात बिसरा दी गयी है अपितु नारी को
ही पुरुष के समकक्ष खडा होने का उपदेश दिया जा रहा है। इतना ही
नहीं कुछ तो नारियों
को भी पुरुष के समान स्वच्छंदता के हक की बात करने लगे हैं।
अर्थात् पुरुष की
काम-वासना नारी को असुरक्षित और अपमानित करती रही है और अब
नारी स्वयं उसका भोग्य
बनेगी। पूर्व में सारे ही वेद-पुराणों में वर्णित कथानक पुरुष
को संस्कारित करते
हुए और नारी को देवी-रूप में स्थापित करते हुए दिखायी देते
हैं। पुरातन काल में
जब-जब पुरुष ने अपनी मर्यादा तोडी तब-तब साहित्यकारों ने,
चिंतकों ने नारी के
सम्मान में अपनी कलम को उठाया। उन्होंने समय-समय पर कहा कि
“यत्र
नार्थर्यस्तु
पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता”।
इतना ही नहीं उसके मातृस्वरूप को लक्ष्मी,
दुर्गा और
सरस्वती के रूप में भी प्रतिष्ठापित किया। इतना ही नहीं जब
कुन्ती,
सूर्य के कारण
कर्ण को जन्म देती है तब भी उसने कुन्ती को और दुष्यन्त के
कारण जब शकुन्तला भरत को
जन्म देती है तब शकुन्तला क सम्मानपूर्वक जीवन का अधिकार दिया
और पाषाण-शिला बनी
अहल्या को भी पुनःजन्म दिया। पुरातन काल में नारी विमर्श के
स्थान पर पुरुष-विमर्श,
पुरुष को संस्कारित करने के लिए स्थापित किया गया।
हमारे चिंतकों ने समाज की
मर्यादा को सर्वोपरि माना और उसके स्वच्छ,
धवल स्वरूप की स्थापना के लिए सतत प्रयास
किए। सुधार कहाँ किया जाना चाहिए,
इस पर चिंतन किया और इस चिंतन से सुधार हुआ भी।
अतः कल तक का पुरुष विमर्श आज नारी विमर्श में तब्दील हो गया
है और नारी की पीडा कम
होने के स्थान पर बढती ही जा रही है। हमारे मनीषी चिंतन दे
सकते थे,
उसे संस्कृति
के रूप में अबाध प्रवाहित कर सकते थे,
लेकिन मनुष्य के अंदर छिपे शैतान को पूर्ण
रूप से शान्त नहीं कर सकते थे। पुरातन काल में सर्वाधिक चिंतन
मनुष्य की काम-वासना
पर ही किया गया,
उसे संस्कारित करने के अनेक उपाय किए गए। बाल्यकाल से लेकर
वृद्धावस्था तक,
इंद्रिय-निग्रह का सतत पाठ पढाया जाता रहा,
लेकिन फिर भी मनुष्य
की स्वाभाविक प्रवृत्ति कब दावानल में परिवर्तित हो जाती,
इसका अनुमान स्वयं मनुष्य
को भी नहीं होता और फिर नारी अहल्या बनकर पत्थरवत् जड मौन हो
जाती। पुरातन काल में
माना गया कि काम केवल गृहस्थ का धर्म है और इसकी अति दोष है।
इसी दोष निवारण के
लिए गृहस्थों से लेकर संन्यासियों तक ने तपस्या की। लेकिन आज
नारी के काम को ही
उत्तेजित किया जा रहा है।
युग बदलते गए लेकिन मनुष्य की प्रवृत्ति टस से मस
नहीं हुई,
वह कल भी शिव-राम-कृष्ण का रूप था और आज भी है,
लेकिन उसके शिवत्व में कब
इन्द्र प्रवेश कर गया,
उसके रामत्व में कब रावण समा गया और कब कृष्णत्व में
दुर्योधन प्रवेश कर गया,
यह उसे भी नहीं मालूम। पृथ्वी अपनी धुरी पर घूम रही है,
चन्द्रमा भी और सूर्य भी। अकस्मात् चन्द्रमा भटक जाता है और
पृथ्वी अंधकार रूपी
त्रस्त को भोगती है। यही अंधकार कलुषित है,
तभी ग्रहण में शुद्धि का विधान है। भारत
में मनीषियों ने इस दुरूह रोग के निवारण के लिए संस्कारों की
पाठशाला अनवरत संचालित
की। प्रकृति ने दानव और मानव दोनों ही श्रेणियों को अभयदान
दिया। दानव किसी संस्कार
को नहीं मानते,
संस्कृति में नहीं बँधते,
उन्हें केवल अपनी शक्ति से इन्दि्रयों के
सुख बटोरने की आदत है,
वे केवल भोग को ही सुख मानते हैं। उन्हें अपना दानव-स्वरूप
ही सुख के साधनों के लिए उपयुक्त लगता है,
वे सोचते हैं कि यदि दानवता का चोला हट
गया तब फिर हमारे इंद्रिय जनित सुख सरलता से प्राप्त नहीं
होंगे। वर्तमान में भी
यही स्थिति है,
कमजोर पुरुष ने भी ताकतवर बनने का चोला पहन लिया है,
कभी दाढी
बढाकर,
कभी केश बढाकर,
या फिर विचित्र और डरावनी वेशभूषा के द्वारा। रावण की
राक्षसी प्रवृत्ति और साधु के मुखौटे ने सीता का हरण किया,
तब लक्ष्मी,
दुर्गा,
सरस्वती स्वरूपा नारी के अस्तित्व पर भी प्रश्नचिन्ह्व लगा।
साहित्यकारों ने
बार-बार नारी की अवधारणा को रेखांकित किया इसी कारण मुगलकाल के
पूर्व तक नारी
स्वाभिमान से जीती रही।
मानव को मानव बने रहने का यह संघर्ष चल ही रहा था कि एक
नवीन सिद्धान्त ने मानवता के राह में काँटे बो दिए और मनुष्य
को दानव बनाने की छूट
दे दी। सिद्धान्त में कहा गया कि नारी भोग्या है,
उसमें आत्मा भी नहीं होती अतः हे
पुरुष तू उसका जैसे चाहे वैसे भोग कर। सिद्धान्त सुनामी की तरह
आया और सारे ही
तटबन्ध टूट गए। समुद्र सम्पूर्ण मर्यादाओं को तोडता हुआ
प्रकृति को नेस्तनाबूद करने
पर उतारू हो गया। त्राहि-त्राहि मच गयी,
सभ्यताएँ असुरक्षित हो उठीं और सुरक्षित
ठिकानों की ओर मानव दौड पडे और नारियों को सात तालों में
अमूल्य निधि के रूप में
बंद कर दिया गया। कैसा भी वेग हो,
एक दिन मन्द पडता ही है और यह दावानल भी भोग की
चरम सीमा को पार कर शान्त होने की ओर बढने लगा,
तब मानवों ने फिर से नारी के ताले
खोलने प्रारम्भ किए। कहीं सती-प्रथा का ताला तो कहीं बाल-विवाह
का,
कहीं अशिक्षा का
तो कहीं पर्दा-प्रथा का। इसे नवीन सामाजिक चेतना का नाम दिया
गया। कहीं-कहीं
नारी-मुक्ति का नाम भी उछाला गया।
शिक्षा का प्रभाव सर्वत्र व्यापक हुआ,
नारी
ने भी कलम को पकडा और अपनी दास्तान लिखना प्रारम्भ किया। इसे
नया नाम मिला
नारी-विमर्श। नारी की समस्या समाज की समस्या से पृथक हो गयी
समाज कहने लगा या समाज
के प्रतिनिधि के रूप में पुरुष ने भी कहा कि यह नारी की समस्या
है। कहीं-कहीं पुरुष
ने अपना दम्भ दिखाना प्रारम्भ किया,
वे कहने लगे कि नारी पर अत्याचार हो रहा है,
लेकिन यह नहीं कहा कि नारी पर हम अत्याचार कर रहे हैं। बस केवल
नारी को अबला बताने
और सिद्ध करने में ही उनका पुरुषत्व लग गया। मनीषी,
समाज-चिंतक,
ऋषि-मुनि भी जहाँ
पूर्व में सनातन काल से ही पुरुष को संस्कारित करने में लगा था,
उसे अनवरत
इंद्रिय-निग्रह का पाठ पढाया करता था,
अब वह केवल नारी-विमर्श की बात करने लगा।
संस्कार परे हटे और पुरुष उच्छृंखल होता चला गया। जब तक नवीन
सभ्यता ने भी पैर
पसारने प्रारम्भ किए,
पूर्व में दानवता परिभाषित थी लेकिन अब उसने भी नया
सम्भ्रान्त चोला ओढ लिया। अब मानव और दानव का बाह्य स्वरूप का
अन्तर समाप्त हो गया।
दोनों में भेद करना कठिन हो गया। इसी कारण नारी छली जाती है।
जब नारी सात तालों
में बन्द की गयी और उसके बाद जब से उसके ताले खुलने शुरू हुए
तभी से नारी को भी
पुरुष की तरह शोहरत पाने की ललक लग गयी। शोहरत के मार्ग में तो
काँटे ही काँटे हैं।
पुरुष भी इन काँटों से होकर ही गुजरता है और जब नारी ने यह
मार्ग चुना तब उसके लिए
भी काँटे बिछाए गए। शोहरत के मार्ग दो होते हैं,
एक मार्ग बहुत लम्बा है और दूसरा
मार्ग बहुत सरल। इस दूसरे मार्ग पर पुरुष ने नारी के लिए काँटे
बिछाएँ हैं और जब भी
कोई नारी इस सरल मार्ग को अपनाती है तब मार्ग में बिछी
नागफणियां उसके आँचल को
तार-तार कर देती हैं। सूक्ष्म काँटे ओढनी में ऐसे धँस जाते हैं
कि ओढनी शरीर से
त्यागनी ही पडती है। तब नारी को लगता है कि मैं छली गयी। उसे
नियति तभी लम्बा मार्ग
दिखाती है और कहती है कि यदि तुमने यह लम्बा कर्म का मार्ग
चुना होता तो पाँव में
बिवाई तो फट सकती थी लेकिन दामन सही-सलामत रहता। शोहरत और
सफलता तो कर्मों की दासी
है,
कर्म करते रहिए,
शोहरत और सफलता स्वतः ही दबे पाँव आफ दाएँ-बाँए खडी दिखायी
देंगी। इस शोहरत के छोटे मार्ग ने भी नारी-विमर्श को जन्म
दिया।
आज नारी की
पीडा इतनी बढ गयी है कि मानवता लज्जित होने लगी है। जहाँ पूर्व
में मनीषियों ने
नारी को देवी रूप में स्थापित कर उसे पूज्य बनाया वहीं वर्तमान
में नारी की स्थिति
पतंगे के समान हो गयी है। वह स्वयं ही आग के साथ खेलने लगी है
और इसका उदाहरण
भारतीय चल-चित्र है। न्यूयार्क में आयोजित विश्व हिन्दी
सम्मेलन में एक अप्रवासी
भारतीय शिक्षिका ने प्रश्न किया कि हम भारतीय चल-चित्र को
बॉलीवुड क्यों कहते हैं
?
उनका मकसद शायद हिन्दी प्रेम ही था,
लेकिन मैं यहाँ कहती हूँ कि बॉलीवुड कहने से हम
हॉलीवुड की नकल करते हैं और वैसी ही अश्लीलता एवं नारी का रूप
हम सिनेमा के पर्दे
पर दिखाते हैं लेकिन जब हम भारतीय चल-चित्र कहते हैं तब हम
हमारे सिनेमा को
भारतीयता का मार्ग दिखाते हैं। दुनिया हमारी तरफ देख रही है और
हम दुनिया भर की
अश्लीलता अपने यहाँ परोस रहे हैं। नारी शोहरत के नाम पर स्वयं
ही अपने छिलके उतार
रही है। पुरुष भी मजे ले रहा है,
वह भी उसे नग्नता के लिए उकसा रहा है। एक तरफ,
एक
वर्ग,
समाज और परिवार को परम्परा के नाम पर नेस्तनाबूद कर देना चाहते
हैं तो दूसरी
तरफ वही वर्ग नारी को स्वच्छंदता का पाठ पढा रहा है। परिणाम
होता है कि कल तक पुरुष
को नारी को पाने के लिए प्रयास करना पडता था,
कहीं-कहीं छल करना पडता था,
अब तो वह
स्वयं कटी पतंग की तरह उसकी बाँहों में आकर गिर जाती है। पूर्व
में समाज,
नारी की
रक्षा करता था और अब समाज का वजूद ही समाप्ति की ओर है।
आज नारी-विमर्श के
द्वारा नारी पर हुए अत्याचार और उसकी स्वतंत्रता के लिए उसकी
स्थिति को दर्शाया गया
है। लेकिन एक प्रश्न मेरे मन में बेताल के प्रश्न की तरह निकल
आता है कि नारी की
पीडा,
जो उसने स्वयं ने भोगी है,
उस पीडा को पुरुष कैसे लिख सकता है
?
जिसने जो
अनुभव किया ही नहीं वह क्या जाने पीर पराई। आप जितने भी नारे
देखेंगे वह पुरुष की
सत्ता को दर्शाते हैं,
जैसे पुरुष प्रधान समाज,
नारी अबला है,
आदि-आदि। जबकि पुरातन
काल में पितृ-सत्तात्मक या मातृ-सत्तात्मक परिवार होते थे और
नारी महिषासुर-मर्दिनी
के रूप में प्रतिष्ठित थी। आज नारी भी स्वयं को अबला मानने पर
उतारू है। वह इस बात
से भी अनभिज्ञ है कि उसने पुरुष को जन्म दिया है और उसके अंदर
बुद्धि और बल का
संधारण उसने ही किया है। फिर भी पश्चिम के प्रभाव से नारी पर
सातवीं शताब्दी से ही
अत्याचार होने प्रारम्भ हुए तो उसे लिखने दीजिए अपने दर्दों का
लेखा-जोखा। नारी पर
किसने अत्याचार किए,
कौन कर रहा है,
कैसे अत्याचार हैं,
इन सबका उत्तर नारी ही दे
सकती है। उसे ही लिखने दीजिए अपने दर्दों का हिसाब,
उसे ही ढूँढने दीजिए अपने
मार्ग। जैसे पूर्व में समाज उसके साथ खडा था,
वैसे ही सभी को उसके साथ खडा होना
चाहिए। समाज को पुनः यह सिद्ध करना चाहिए कि नारी अबला नहीं
अपितु दुर्गा है। साथ
ही पुरुष के पतन के प्रति भी उसकी दृष्टि जानी चाहिए क्योंकि
आज जितना पतन पुरुष का
हुआ है,
उतना पतन किसी भी काल में नहीं हुआ था,
अतः उसे पुनः संस्कारित करने की
आवश्यकता है। लेकिन यह भी निर्विवादित सत्य है कि पूर्व में
केवल पुरुष को
संस्कारित किया जाता था,
लेकिन आज दोनों को ही संस्कारित करने की आवश्यकता आन पडी
है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमारा चल-चित्र है,
जिसमें पुरुष से भी अधिक नारी
असंस्कारित दृष्टिगोचर हो रही है।
डॉ. अजित गुप्ता
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