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विदेशी नाच में कमर हिलती है दिल नहीं
पद्मभूषण
तीजनबाई से आसिफ़ इकबाल की भेंट
लोग
कहते-लिखते हैं तीजन बाई बहुत बड़ी अंतराष्ट्रीय लोक कलाकार है
पर भाई मैने अपने आपको कभी ऐसा नहीं मानी । मैं आज भी एक टेम
बोरे बासी (रात में पका चावल पानी में डालकर) और टमामर की चटनी
खाती हूँ। मेरे घर में एक टेम सभी बासी खाते हैं। लोग
पूछते-बोलते हैं, तीजनबाई कुछ नाश्ता किया करो तो मैं बोलती
हूँ आप मन नाश्ता करते हो तो मैं बासी क्यों नहीं खा सकती
?
भई, बोरे-बासी
छत्तीसगढ़ का अमृत है- जौउन ला खाके हम अन जितना काम कर सकते
हैं उतना दूसरा भोजन या नाश्ता करके नहीं किया जा सकता। बासी
के सामने शराब का नशा भी कुछ नहीं है।
ईमानदारी से कहूँ
मैं आज भी गाँव की औरत हूँ । सब काम करती हूँ, सब्जी बनाती
हूँ, चटनी बनाती हूँ, धान मिंजाई व ओसाई भी कर लेती हूँ आप मन
ही बतावो मैं कहां से बड़ी हूँ। मेरे दिल में कुछ नहीं है
ऊँच-नीच, गरीब-अमीर कुछ नहीं, मैं सभी से एक जैसे ही मिलती
हूँ, बात करती हूँ, बच्चों बूढ़ों के बीच बैठ जाती हूँ- इससे
दुनियादारी की कुछ बातें सीखने तो मिलती है और अनुभव भी
बाढ़थे। ऐसे में कोई कुछ-कह बोल भी दे तब भी बुरा नहीं लगता।
खराब छपने का भी बुरा नहीं मानती। भोपाल के एक पत्रकार ने छापा
था कि तीजनबाई डिस्को डांस के समान पंडवानी करती है, ओव्हर
मेकअप करती है, ओव्हर पहनती है, वैसा लोक कलाकार को नहीं करना
चाहिए। ऐसा बुरा छपने का भी बुरा नहीं लगा पर सोचना चाहिए,
आदिवासी औरतें आज भी कुछ नहीं पहनती, लुगरा पहनती हैं बिना
बेलाउज के रहती है। मैं भी पहले गाँव में ऐसे ही रहती थी,
लेकिन आज युग बदल गया है आज मैं जो पहन रही हूँ वह कैसे ओव्हर
हो गया सलवार सूट भी तो मैंने नहीं पहनी, न पहनूँगी,
साड़ी-पोलखा पहनती हूँ। मेकअप का ये सामान देखो, इसमें क्या,
पाउडर- क्रीम और बोरोलीन ही तो है क्या ये फुल मेकअप है
? मैं पूछती हूँ-
क्या काजर लगाना, टिकली-माहूर सजाना, माँग में सिंदूर भरना,
बारों महीना हाथ पर चूडी़ पहरना कैसे ओव्हर है भाई ?
युग बदल गया तो
मैं भी बदल गई लेकिन इतनी नहीं बदली कि लोग अंगुली उठाएं। मैं
जो पहनती हूँ वही पूरा छत्तीसगढ़ है, अऊ मोर छत्तीसगढ़ के ये
श्रृंगार है। यह बुरा कैसे हो सकता है। रही बात डिस्को की, मैं
कभी डिस्को नहीं देखती। किसी स्कूल के प्रोग्राम में चीफ गेस्ट
बना देते हैं तो देखती हूँ छोटे-छोटे लइका मन को डिस्को करते,
बच्चों का डिस्को करना अच्छा लगता है पर हमारी लोककला में जो
बात है वह बिदेशी नाच-गाना में नही। बिदेशी नाच में कमर जरुर
हिलथे बाबू, अऊ हमर लोककला में दिल हिलथे।
लोककला के बारे
में कुछू कहना-लिखना आसान है लेकिन एला बचाने में बहुत मेहनत
करनी पड़ेगी। अब मेरी अपनी ही बात बताऊँ पंडवानी में करांति
(क्रांति) आ गई है फिर भी मेरे अपने घर में मेरी लोककला का कोई
प्रतिनिधि नहीं है। अच्छी-खासी फौज है बहू-बेटा, नाती पोतों
की, पर कोई भी पंडवानी से जुड़ा नहीं है। इसका मुझे कोई दुख भी
नहीं है। बाहर कोई कलाकार तो होगा उसे तैयार करुँगी और अपनी
कला देकर जाऊंगी, जिसमें प्रतिभा होगी। मेरे बच्चे आज वो सब कर
रहे हैं जो मैं नहीं कर पाई यानी मैं एक किलास (क्लास) भी नहीं
पढ़ पाई। पढ़ाई न करने का कोई दुख भी नहीं है। हो सकता है
पढ़-लिख लेती तो शायद लोककला से नहीं जुड़ पाती।
बिदेस खूब घूम
डाली हूँ, पर अपना देस अलग है वहाँ एक टाइप की कला है यहाँ
विविध कलाएं हैं। मैं धार्मिक सिनेमा को छोड़कर दूसरा कोई
सिनेमा भी नहीं देखती, किसी हीरो-हीरोइन को भी नहीं जानती।
बचपन में जब दो रोटी भी घर में नहीं थी फिल्म कहां से देखती।
पदमश्री मिलने का दिन आज भी मोर सुरता में है, वेंकटरमनजी ने
दिया था। उसी दिन इंदिरा गांधी से भी मिली थी बहुत अच्छी लगी,
उन्होंने मेरी पंडवानी सुनी थी। मुझे बुलाकर बोली- छत्तीसगढ़
की हो ना। मैने हाँ कहा तो इंदिरा बोली महाभारत करती हो तो मैं
बोली पंडवानी सुनाती हूँ महाभारत नहीं कराती, सुनकर इंदिराजी
खुश हुई और मेरी पीठ थपथपाई थीं।
आसिफ़
इकबाल
54-604, अंजुम,
चर्च रोड
डंगनिया,
रायपुर, छत्तीसगढ़
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