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खण्डहर
नहीं जलाया जाता साँझ का दिया
नहीं लौटती अब रंभाती हुई गैय्या
उग आए हैं - घास - पात
बिखर गए हैं ईंट-पत्थर
नहीं सुनाई देती अब लोरियाँ
नहीं दिखायी देती अब
छज्जे पर बाल सुखाती औरतें
यूँ ही भटकते-भटकते
कभी-कभी चले आते हैं
कुछ जोड़े
ढूँढ़ते हुए एकान्त
दिखाते हैं वे -
घास-पात के बीच आँगन में
सूख चुके तुलसी के पेड़
माँझी अनन्त
ग्राम-कोमा,
राजिम, रायपुर, छत्तीसगढ़
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