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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। कविता ।।

 

 

खण्डहर

 

नहीं जलाया जाता साँझ का दिया

नहीं लौटती अब रंभाती हुई गैय्या

उग आए हैं - घास - पात

बिखर गए हैं ईंट-पत्थर

 

नहीं सुनाई देती अब लोरियाँ

नहीं दिखायी देती अब

छज्जे पर बाल सुखाती औरतें

 

यूँ ही भटकते-भटकते

कभी-कभी चले आते हैं

कुछ जोड़े

ढूँढ़ते हुए एकान्त

 

दिखाते हैं वे -

घास-पात के बीच आँगन में

सूख चुके तुलसी के पेड़

   माँझी अनन्त

ग्राम-कोमा, राजिम, रायपुर, छत्तीसगढ़

 ◙◙◙

कवि

- सुरेन्द्र काले

- स्वप्निल श्रीवास्तव 

- अरुण शाद्वल

- स्वर्ण ज्योति

- सुरेश उजाला

- माँझी अनन्त

- निलय उपाध्याय

नई कलम

- तेजपाल सिंह हंसपाल

 

 

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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