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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। कविता ।।

 

 

राह के दरख्त

 

काश.....

राह पर खड़े दरख़्त

कुछ बोल पाते

अपनी ज़ुबानी अपनी गवाही दे पाते तो

कितने किस्से कह पाते

काश...यह कुछ बोल पाते........

 

पंथी को साया

राही को छाया

भूलों को राहें

भटकों को बाँहें

देकर भी ये हैं

कितने....अकेले

 

हरियाली के मेले

हैं कितने अलबेले

आँव में अपनी

नन्हें नीडों को पालें

पर हैं अकेले

तन्हाई का दुःख झेंलें

 

काश.....ये कुछ बोल पातें

तो अपनी व्यथा-कथा

अपनी दर्द बाँट पाते

काश....राह के दरख़्त कुछ बोल पाते   

  स्वर्ण ज्योति

नं २२ ९वाँ क्रॉस

राजाजी नगर, पाँडिचेरी

 ◙◙◙

कवि

- सुरेन्द्र काले

- स्वप्निल श्रीवास्तव 

- अरुण शाद्वल

- स्वर्ण ज्योति

- सुरेश उजाला

- माँझी अनन्त

- निलय उपाध्याय

नई कलम

- तेजपाल सिंह हंसपाल

 

 

 

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