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नाव
मैंने एक नाव बनायी
नदी ने कहा - मेरे साथ चलो
साथ चलते-चलते हम पहुँच
जायेंगे समुन्दर
समुन्दर में पानी की दुनिया
है
तुम्हें मिल जायेगा घर
और मुझे मुक्ति मिल जायेगी
मैं अपना घर-द्वार छोड़ कर
पानी के साथ उसके घर गया
पानी ने कहा - देखो दूर-दूर
तक
फैला हुआ है, मेरा साम्राज्य
क्या तुम पानी बनना
चाहोगे ?
उसे क्या पता पानी मेरी आँखों
में है
उसमें डूब सकती हैं कई नावें
सुरेन्द्र काले
नवाब काटेज
पुर्दिलपुर,
गोरखपुर, उ.प्र.
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