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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। कविता ।।

 

 

नाव

 

मैंने एक नाव बनायी

नदी ने कहा - मेरे साथ चलो

साथ चलते-चलते हम पहुँच

जायेंगे समुन्दर

 

समुन्दर में पानी की दुनिया है

तुम्हें मिल जायेगा घर

और मुझे मुक्ति मिल जायेगी

मैं अपना घर-द्वार छोड़ कर

पानी के साथ उसके घर गया

 

पानी ने कहा - देखो दूर-दूर तक

फैला हुआ है, मेरा साम्राज्य

क्या तुम पानी बनना चाहोगे ?

उसे क्या पता पानी मेरी आँखों में है

उसमें डूब सकती हैं कई नावें

    सुरेन्द्र काले

नवाब काटेज

पुर्दिलपुर, गोरखपुर, उ.प्र.

 ◙◙◙

 

कवि

- सुरेन्द्र काले

- स्वप्निल श्रीवास्तव 

- अरुण शाद्वल

- स्वर्ण ज्योति

- सुरेश उजाला

- माँझी अनन्त

- निलय उपाध्याय

नई कलम

- तेजपाल सिंह हंसपाल

 

 

 

 

 

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