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मूर्तवत
कोई कविता सिर्फ़
एक बार वज़ूद में आती है
और कवि पर नहीं
परिस्थितियों पर निर्भर करती
है
रेशमी शब्द मिलकर
बुनते रहते हैं कोमल कठोर
कविताएँ
शब्द जानते हैं पड़ावों को
बिसात पर मोहरों को
रखना भी जानते हैं
जो घटता है हम देखकर भी
उसे अनदेखा करते रहते हैं
हमारी हठधर्मिता ने
मूर्तवत बना दिया है हमें
इतना मूर्तवत कि हम गर्दन न
घुमा कर
इधर-उधर आगे-पीछे
कुछ भी अब देख नहीं सकते
और हमारा अपना बादशाह
सारे मोहरों के रहते
शह पर शह खाते-खाते
मात खा जाता है
सुरेन्द्र काले
नवाब काटेज
पुर्दिलपुर,
गोरखपुर, उ.प्र.
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