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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

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।। कहानी ।।

 

 

पूर्वाश...

"अदनान, आप उन परिवार वालों की वकालत क्यों कर रहे हैं जो अपनी ही बहुओं का शोषण कर रहे हैं ?.. क्या आपको उन महिलाओं से ज़रा भी हमदर्दी नहीं है जिनको झूठे सपने दिखा दिखा कर यहाँ लाया जाता है और फिर उनको एक्सप्लाइट किया जाता है। "

"मैडम कभी ग़ुलाम अली की ग़ज़ल सुनी है ?... अपणी संभाल तैनूं होर नाल की ? अपना घर संभालिये। दूसरों की चिंता करने से अपना घर नहीं संवरने वाला। "

"शायद मैं नहीं चाहती कि किसी और पाकिस्तानी औरत की ज़िन्दगी मेरी ज़िन्दगी की तरह नासूर बन जाये।...मेरी दिमाग़ी मौत रोज़-रोज़ होती है.... जिन को जिस्मानी और दिमाग़ी तौर पर परेशान किया जा रहा है, उनकी लड़ाई लड़ना मैं अपना फ़र्ज़ बना रही हूँ।.... और फिर मेरा घर तो एक ख़ूबसूरत मकान है, बंगला है... महल है। यहाँ हर तरह की सहूलियत है। .. लेकिन वो प्यार .... ख़ैर छोड़िये। आपसे उस चीज़ की उम्मीद कैसे की जा सकती है, जो आपके पास है ही नहीं?"

अदनान परेशान! यह समीना को हो क्या गया है?... शायद अब यह तलाक़ चाहती है। जानती है कि ब्रिटेन के कानून के मुताबिक उसे हर चीज़ में आधा हिस्सा मिलेगा। चाहती है कि मैं तलाक़ दूँ। नहीं... मैं इसके जाल में नहीं फसूँगा। ... भला मैं क्यों तलाक़ दूँ। अगर इसे ख़ुद को तलाक चाहिये तो पच्चीस हज़ार रुपये ले और साथ में तलाक़ मुफ़्त में मिल जायेगा!... अपने आप को कोसता है। "क्यों आया गोरों के इस मुल्क में?... यहाँ की औरतों को देख देख कर समीना में कितना बदलाव आ गया है!.. पाकिस्तान में होते तो हमेशा मेरे दबाव में रहती। यह साली ख़ुदमुख़तारी भी बहुत ख़राब चीज़ है।... पलती मेरे पैसों पर है! ऐश से जीती है और मेरे सामने मुँह खोलती है। अल्लाह से भी नहीं डरती। ... अल्लाह को तो मानती ही नहीं। क़ुरान शरीफ़ के बारे में भी सवाल खड़े कर देती है। मौलवी साहब तक को डरा रखा है! "

समस्या अदनान के सामने मुँह बाए खड़ी है। किस से बात करे। सोचता है, "इस जुम्मे को मौलवी साहब से बात करता हूँ।... घर में भी अपने मुल्क की तरह शरीयत का क़ानून लागू कर देता हूँ। पाँच वक़्त की नमाज़ ज़रूरी कर देता हूँ। मगर सुनेगा कौन? अब तो फ़रहान भी घास नहीं डालता। वो तो वैसे ही आधा अँगरेज़ बन गया है। उर्दू समझ तो लेता है लेकिन जवाब तो अँगरेज़ी में देता है। ... ज़बान भी ऐसी बोलता है कि कई बार तो समीना से तरजुमा करवाना पड़ता है, तब जा कर कहीं बात समझ में आती है। समीना इस बात पर भी ऐंठ जाती है कि फ़राहन की भाषा उसे समझ में आती है... एक अलग सा रिश्ता है माँ बेटे के बीच। ... बहुत बार अपने ही बेटे के साथ बात करने के लिये समीना का सहारा लेना पड़ता है। ... यह भी कोई ज़िन्दगी है। बेटे को न तो मेरे काम से कोई सरोकार है न नौकरी करने में दिलचस्पी है। डिग्री लेने के बावजूद अभी तक बेकार घूम रहा है!... अब डाँटने में भी डर लगता है... एक बार घर छोड़ कर चला गया था... बदनामी अलग... अल्लाह किस बात की सज़ा दे रहा है? ... सिकन्दर, बशीर, इफ़्तिख़्रार सभी कितने ख़ुश लगते हैं। उनकी बीवियाँ उनके कहने पर चलती हैं। उन्हें जो उनके शौहर देते हैं, उनमें ख़ुश रहती हैं। फिर मुझे ही ऐसी बीवी क्यों मिली जो हर वक़्त झगड़ती है? इफ़्तिख़्रार से बात करता हूँ। ... उसकी बीवी की तो समीना से अच्छी दोस्ती भी है।... लेकिन अब मैं तो समीना के साथ रहना ही नहीं चाहता। फिर इफ़्तिख़्रार या उसकी बीवी से क्या लेना ?.. मौलवी साहब से ही बात करता हूँ। वो तो ज़माने भर की मुश्किलों का हल ढूँढ लेते हैं। मेरी परेशानी का हल भी वही बता सकते हैं।...यही ठीक रहेगा। "

"देखो मियां, सबसे पहले तो तुमको इस बात पर अच्छी तरह सोच विचार कर लेना चाहिये कि तुम सचमुच समीना बेग़म से छुटकारा पाना चाहते हो। तुम्हें उनसे क्या-क्या शिकायतें हैं, इसके बारे में सोचो। कहीं तुम उनके साथ बुरा बर्ताव तो नहीं कर रहे ? ... देखिये मियां, तुम लोगों के ग़ैर-ज़िम्मेदाराना हरक़तों से इस्लाम बदनाम होता है। " मौलवी साहब आज दूसरे सुर में बातें कर रहे थे।

अदनान मौलवी साहब की शक्ल ताके जा रहा था। यह इन्सान आज विरोधी पार्टी का सदस्य क्यों लग रहा है ? अदनान ने भी पैंतरा बदला, "मौलवी साहब, हम बाकी सब तो बरदाश्त कर भी लें हमें दिक्कतें ज़रा दूसरे किस्म की भी हैं। अब देखिये नमाज़ नहीं पढ़ती हैं ; अपने मुल्क की बदनामी करती हैं; और तो और अपने मज़हब के ख़िलाफ़ बातें भी सुन लेती हैं। ... अब आप तो जानते हैं कि मेरे लिये मज़हब से बढ़ कर कुछ और है नहीं। ... मैं यह कैसे बरदाश्त कर सकता हूँ कि मेरी ही बीवी इस तरह की बातें करे। हिजाब से मेम साहिबा को एलर्जी है। मेरा बस चले तो इन्हें काफ़िर तक क़रार देने से गुरेज़ न करूँ।"

"अदनान भाई आप बहुत संगीन जुर्म लगा रहे हैं समीना बेग़म पर। बाद में मुकर मत जाइएगा। मामला आपका है घरेलू , और आप मुझसे बात कर रहे हैं दोस्त की हैसियत से। मेरे भीतर के इमाम को यहाँ मत जगाइये। कहीं कोई ग़लत बात न निकल जाए मुँह से मेरे।.. कोशिश करिये कि घर का झगड़ा घर में ही निपट जाये। घर से बाहर मत लाइये इसे।"

"मौलवी साहब, मैं तो आपको अपनी मुश्किलें समझाने की कोशिश कर रहा हूँ। कहीं कुछ बढ़ा चढ़ा कर नहीं कह रहा। अब दोस्तों की मुश्किलें भी तो आप ही हल करेंगे न ! आप तो बड़ी-बड़ी मुश्किलें चुटकियों में हल कर देते हैं। फिर, आपके लिये, मेरी मुश्किल तो कोई बहुत बड़ी होनी नहीं चाहिये। "

"अदनान मियां, आपको एक राज़ की बात बताता हूँ। ध्यान से सुनियेगा। ईमान वालों की तमाम मुश्किलात का इलाज रूहानी किताब में लिखा है। अगर आप अपनी किताब को थोड़ी भी तव्वजो दे कर पढ़ेंगे तो आपको अपनी मुश्किल का हल मिल जाएगा।... आप बस पढ़ना शुरू करिये और बक़रीद तक आपका काम हो जायेगा।... मेरी बात को गहराई से सुनियेगा, समझिएगा तो बक़रीद तक तमाम झमेलों से निजात पा जाएँगे। "

मौलवी साहब तो अपनी बात कह कर चलते बने। अदनान की मुश्किलें वहीं की वहीं खड़ी रहीं। वह सोचता रह गया कि मौलवी साहब कह क्या गये हैं ! इतनी गूढ़ी बातें भला एक सीधा सादा बिल्डर समझे भी तो कैसे। ईंट गारे की बात हो, या फिर किसी की नई छत बनानी हो तो अदनान समझ भी ले लेकिन यह क्या बात हुई कि ईमान वालों की तमाम मुश्किलात का इलाज रूहानी किताब में लिखा है। अगर आप अपनी किताब को थोड़ी भी तव्वजो दे कर पढ़ेंगे तो आपको अपनी मुश्किल का हल मिल जाएगा। और यह बक़रीद का क्या मामला है ? ... सर झटक कर रह गया था अदनान।

ज़ाहिर सी बात है कि उसके कदम इफ़्तिख़्रार मियां के घर की तरफ़ बढ़ेंगे। लेकिन फिर सोचने बैठ गया कि उसके घर कम ही जाता है तो फिर आज जाये क्या ? कहीं इफ़्तिख़्रार कुछ ग़लत न समझ बैठे। फिर किया क्या जाये। जुम्मे की रात को इफ़्तिख़्रार और तबस्सुम को घर खाने पर बुला लेता हूँ। तबस्सुम और समीना जब आपस में बातें कर रहीं होंगी, वह इफ़्तिख़्रार से अपनी बातचीत कर लेगा।

भोजन के समय बस औपचारिक बातें होती रहीं। कुछ फ़रहान के बारे में या फिर इफ़्तिख़्रार के बच्चों के बारे में। कुछ गरमा-गरम बातें ब्रिटेन के वर्तमान हालात को लेकर भी हो रही थीं। इंगलैण्ड में मुसलमान कितना असुरक्षित महसूस कर रहे थे, स्थितियाँ कितनी संकटपूर्ण हैं। ... बच्चे आजकल अपने बड़ों की इज्ज़त नहीं करते....हमारा कल्चर तो बस तबाह हो रहा है.... वगैरह-वगैरह... और फिर यह की समीना भाभी क्या लज़ीज़ चॉप्स बनी हैं... बिरयानी का तो जवाब ही नहीं...... आपके घर के खाने का तो जवाब ही नहीं......

भोजन के बाद कॉफ़ी का कप ले कर अदनान और इफ़्तिख़्रार एक ओर बैठ गये और समीना तबस्सुम को लेकर अपने कमरे में चली गयी।

"यार एक बात तो समझ लो कि मौलवी साहब बिना किसी वजह के इतनी गहरी बात नहीं कह सकते। तुम्हारी दिक्कत का हल तो मुकद्दस किताब में ज़रूर होगा। "

"यार अपने को कौन सी अरबी ज़बान आती है ? पढ़ें तो कैसे ? "

"भाई आजकल तो उर्दू का तरजुमा भी मिलता है बाज़ार में पढ़ लो, पढ़ कर देख लो। "

"यार अगर पढ़ना ही होता तो अपने मुल्क में रहते, पढ़ते और कोई पढ़ा लिखा काम करते। तुम क्या समझते हो कि अगर हम पढ़े लिखे होते तो क्या फिर हम यहाँ बिल्डर का काम कर रहे होते ? ये साला बिल्डर भी तो ग्लोरिफ़ाईड नाम है। वैसे तो हम मज़दूर ही हैं। .. तुम ये पढ़ने लिखने की बात हम से न किया करो। पढ़ाई के नाम से डर लगता है। "

"मियां, देखो हम भी तुम से कोई अलग नहीं हैं। पढ़ाई के मामले में हमारा भी हाथ उतना ही तंग है। वो तो स्टूडेंट डेज़ में एक डिग्री हासिल कर ली जो आज काम आ रही है। वर्ना कोई तुर्रम ख़ान हम भी नहीं हैं। ... अगर तुम सोच रहे हो कि मैं तुम्हारे लिये यह काम कर पाऊँगा.... तो मियां भूल जाइये। अपने बस की बात नहीं है। "

"यार तुम कैसे दोस्त हो ? क्या दोस्त के लिये इतना भी नहीं कर सकते ? "

"भाई कोई ढंग का काम कहिये हमसे। जान भी हाज़िर कर देंगे। अब इस उम्र में पढ़ाई न करवाइये हम से।"

"यार तुम से तो हिन्दुस्तानी फ़िल्मों के दोस्त हज़ार दर्जे अच्छे होते हैं। वो तो गाना भी दोस्ती का गाते हैं, यारी भी निभाते हैं। तुम्हारे लिये क्या कहूँ कि दोस्त दोस्त न रहा...... ! "

"यार अब इमोशनल ब्लैकमेल तो करो मत। थोड़ा सुधर जाओ। "

"देखो इफ़्तिख़्रार, इस तरह दिक्कत तो हल नहीं होगी। कुछ न कुछ तो सोचना पड़ेगा न।  यार कुछ तो करो।"

"यार भाभी में बुराई क्या है ? हमें तो ठीक-ठाक लगती हैं। तुम छुटकारा पाना क्यों चाहते हो ? "

"इफ़्तिख़्रार भाई, पिछले करीब दस बरस से तुम समझ लो कि हम दोनो भाई बहन की तरह रह रहे हैं। कोई रिश्ता नहीं हमारे बीच।... दरअसल एक अजीब-सा ठण्डापन पैठ चुका है हमारे रिश्तों के बीच। ... अब लगता नहीं कि हम दोनों एक दूसरे के बारे में कुछ भी पॉज़िटिव सोच सकते हैं।... एक दूसरे पर से विश्वास उठ गया है। दरअसल, मैं अपनी ग़लतियों को छिपाना नहीं चाहता। ग़लतियाँ दोनो तरफ़ से हुईं। जब उसे मेरी ज़रूरत थी मैं उसके आसपास नहीं था ; आज उसके पास मेरे लिये वक़्त नहीं है। लेकिन एक बात मैं सोचता हूँ कि उसे मेरा अहसानमन्द होना चाहिये कि मैने उसे इतनी आरामदेह ज़िन्दगी दे रखी है। ... मर्सीडीज़ गाड़ी है, इतना बड़ा घर है, नौकर है, ज़िन्दगी का हर आराम है... और उसे क्या चाहिये ? तुम बताओ, क्या कोई अँगरेज़ भी ऐसी ज़िन्दगी जीता है जैसी हमने समीना को दी है ? "

"हूँ.... बात यह है कि हमने भाभी साहिबा से तो बात की नहीं है। उनके मन में क्या है, यह जाने बिना हम कैसे कोई राय बना सकते हैं ? "

"यार तुम तो अदालत जैसी बातें कर रहे हो। ऐसा थोड़े ही होता है। तुम दोस्त हो मेरे, सारा-सारा दिन ख़बरें सुनते हो ; अख़बार पढ़ते हो ; कोई ऐसा तरीक़ा बताओ कि समीना से छुटकारा भी मिल जाए और उसे कुछ देना भी न पड़े। "

"यार दिक्कत यह है कि तुम दोनो ही ब्रिटिश पासपोर्ट होल्डर हो। यहाँ ब्रिटेन में तो यह मुमकिन है नहीं। यहाँ तो हर काम ब्रिटिश लॉ के हिसाब से होगा। "

बातें दूसरे कमरे में भी हो रही थीं। तबस्सुम हैरानी भरे लहजे में समीना को बता रही थी, "समीना तुमने कुछ सुना ? इफ़्तिख़्रार बता रहे थे कि उन्होंने अख़बार में पढ़ा है... यकीन नहीं होता। .."

"अरे अख़बारों में न जाने क्या क्या छपता रहता है। सब सच थोड़े ही होता है।"

"यह तो मैं भी नहीं जानती कि सच है या नहीं, लेकिन जब से इफ़्तिख़्रार ने बताया है एक अजीब-सा डर मेरी सोच में समा गया है।"

"भला ऐसी क्या बात बता दी इफ़्तिख़्रार भाई ने?... "

"उन्होंने बताया कि मिडलैण्ड के एक बीवी और शौहर में बनती नहीं थी। शौहर अपनी बीवी को जब अपने मुल्क ले गया तो वहाँ उसका कत्ल करवा दिया। ... कत्ल भी अपने चचा-ज़ाद भाई से करवाया और फिर शरीया कानून के मुताबिक उसको ख़ुद ही माफ़ भी कर दिया।"

"यह कैसे हो सकता है? यह तो कोई इन्साफ़ न हुआ!"

"बस समीना बेग़म, मैने तो जबसे सुना है वापिस मुल्क जाते हुए डर लगने लगा है। इस बाहियात-सी ख़बर ने हमारे तीस साला शादीशुदा ज़िन्दगी को हिला कर रख दिया है।"

"तुम्हें लगता है कि इफ़्तिख़्रार भाई ने अदनान को भी यह बात बता दी होगी? " समीना की आवाज़ में अनिश्चितता साफ़ सुनाई दे रही थी।

उधर इफ़्तिख़्रार अपनी बात अदनान को समझा रहे थे, "देखिये मियां, अगर हिम्मत है तो कर गुज़रिये। आप जो चाहते हैं वो भी हो जायेगा जो आप चाहते हैं और आपको कुछ देना भी नहीं पड़ेगा। वैसे अगर चाहो तो मौलवी जी से पूछ सकते हो कि क्या शरीयत में ऐसा कोई कानून है?"

"पागल हो गये हो क्या? यार पच्चीस साल का साथ है। ऐसे कैसे मरवा दूँ।.... बिल्डर हूँ कोई कसाई थोड़े ही हूँ!...ऐसी बेहूदा बात तुमने कही कैसे?"

"यार कमाल करते हो! ख़ुद ही मुश्किल का हल भी चाहते हो और नाराज़ भी होते हो।"

"सुनो, तबस्सुम को ये बात पता है? "

"हाँ।... मैने ही बताया था।"

"या अल्लाह! "

गुडनाईट कह कर इफ़्तिख़्रार और तबस्सुम चल दिये।

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 रात को बाहर हल्की हल्की सी बर्फ़ पड़ रही है। जमने वाली बर्फ़ नहीं है। सुबह होते ही सूरज की रोशनी और धूप से पिघल कर बह जायेगी। अपने अलग-अलग बेडरूम में अदनान और समीना खुली आँखों से अपनी अपनी छत को ताके जा रहे हैं। नींद दोनों की आखों से बग़ावत कर चुकी है। दोनों के दिमाग़ों में पिछले पच्चीस वर्ष का विवाहित जीवन एक फ़िल्म की तरह तेज़ी से गुज़रा जा रहा है। एक बात तय है कि अब दोनों इकट्ठे एक साथ कभी भी अपने मुल्क वापिस नहीं जा पायेंगे।

  पृष्ठ 1-2

   तेजेन्द्र शर्मा

74-A, Palmerston Road, Harrow & Wealdstone,

 Middlesex HA3 7RW

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