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सृजनगाथा

 

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वर्ष-2, अंक-20, जनवरी, 2008

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।। इटली से ।।

 

 

शब्द और चित्र


सुनील दीपक

 

अँगरेज़ी में लिखने वाले भारतीय लेखक अलताफ़ टायरवाला से बात हो रही थी। मैंने उनसे पूछा कि उन्हें किस तरह का पढ़ना अच्छा लगता है तो बोले, "जिसमें कम से कम शब्दों में बात की जाये। जहाँ अधिक विवरण हो, बात को लम्बा खींचा जाये तो मुझे सहन नहीं होता। कोई यह माने कि मुझे मालूम नहीं और सब कुछ समझाना बताना है तो मुझे अच्छा नहीं लगता।" उनका यह भी कहना था कि शायद उनके इस तरह महसूस करने की वजह इंटरनेट पर पढ़ने की आदत है जहाँ सब कुछ संक्षिप्त होना चाहिये और लम्बा हो तो लोग उसे नहीं पढ़ते।

 

हँगरी मूल की प्रसिद्ध लेखिका अगोटा क्रिस्टोफ़ जिन्हें साहित्य के लिए नोबल पुरस्कार मिल चुका है, भी अलताफ़ की तरह सक्षिप्तता में ही विश्वास करती हैं। कई साल पहले जब "के का शहर" के नाम से उनकी तीन पुस्तकें पढ़ीं तो  लगा था कि जैसे उन्होंने शब्दों की टहनी को ले कर उसे चाकू से छील कर, अनावश्यक शब्दों को काट फेंक कर, टहनी के अतंर्स्थल में छुपे तीर को बाहर निकाला हो। हर शब्द नपा तुला, तेज़धार वाला जो कागज़ के पन्नों से सीधा दिल को चीरता निकल जाये। इतने थोड़े से शब्दों में इतना कुछ कहने की ताक़त शायद तभी आती है जब हम में गहरा आत्मविश्वास हो!

 

शब्द चाहे कम हों, उनमें एक गम्भीरता-सी लगती है पर अगर शब्दों के साथ चित्र जोड़ कर कहानी कही जाये तो लगता है कि बात कुछ हल्की हो गयी। शायद यह बचपन में पढ़ी बेताल की या आर्ची की कोमिक्स पढ़ने का असर हो कि चित्रकथाएँ बच्चों की सी बातें लगती हैं। बचपन में मुझे इंद्रजाल कोमिक्स वालों की छापी जाने वाली बेताल की किताबें बहुत अच्छी लगती थीं। पिछले कुछ सालों में कई बार अमर चित्र कथाओं के बारे में पढ़ा है कि कैसे विदेशों में रहने वाले भारतीय इनको अपने बच्चों में भारतीय संस्कृति या धर्म की जानकारी देने का अच्छा माध्यम मानते हैं। पर क्या इन चित्रकथाओं को साहित्य की गरिमा दी जा सकती है, मुझे यह नहीं लगता था। कॉमिक शब्द ही कुछ ऐसा है, यानी हँसने हँसाने वाली बात।

पुस्तकालय के किताबप्रेमियों के मँडल की गोष्ठी में मैंने यही बात कही थी जब लोरेंज़ो ने कहा कि वह केइको ईछिगुची की किताब के बारे में बात करना चाहेगा। केइको जापानी मूल की हैं और कई वर्षों से हमारे शहर बोलोनिया में ही रहती हैं और चित्रकथाएँ लिखती भी हैं, बनाती भी हैं। हमारे किताबप्रेमियों का मंडल माह में एक बार मिलता है और हर बार हर सदस्य को उस महीने में पढ़ी किसी किताब के बारे में बोलना होता है। लोरेंज़ो का कहना था कि चित्रकथाएँ किसी उपन्यास के कम साहित्यिक नहीं।

 

बाद में मैं पुस्तकालय में चित्रकथाओं वाले हिस्से में रखी किताबों को देखने गया तो हैरानी हुई कि वहाँ इस तरह की इतनी अधिक किताबें रखी थीं। पहले कभी उस हिस्से की किताबों को ठीक से नहीं देखा था। उनमें से कई किताबें वयस्कों के लिए भी हैं जिन्हें भारत में साहित्यक नहीं बल्कि अश्लील माना जायेगा। पर साथ ही बहुत