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अनेक उदाहरणों को देखने के बाद मैं यह मानता हूँ कि हिंदी में
तकनीकी- वैज्ञानिक शिक्षण के लिए नए सिरे सोचने की
ज़रूरत है। क्लिष्टता ही विद्वता का पर्याय नहीं है। सरलता ही
सर्वकालिक होती है। इस दृष्टि से हिंदी में नई शैक्षणिक
प्रविधि विकसित करने की
ज़रूरत
है। अंतरजाल (इंटरनेट)
के माध्यम से हिंदी वैश्विक होती जा रही है। अब उसे
शिक्षण-प्रशिक्षण की सार्थक भाषा बनाने के लिए नई परियोजनाएँ
बनानी होंगी। बन भी रही हैं। शब्दावली आयोग तो 1961 से ही इसी
काम में प्राणपण से
सक्रिय है। आयोग ने अब तक लगभग पाँच लाख पारिभाषित शब्दों का
जाल-सा बिछा दिया है। मानविकी, विज्ञान, प्रशासन आदि से जुड़े
हजारों नए शब्द तैयार हुए। यह अभूतपूर्व काम है। भाषाविदों को
भी अलग-अलग मोर्चों
पर काम करना पड़ेगा। शर्त यही है, कि अनुसंधान एवं सर्जना के
लिए सरल भाषा में ही वैकल्पिक शब्दों की संरचना हो। वह आम
बोलचाल की भाषा भी न हो, लेकिन कम से कम ऐसी तो हो, कि
विद्यार्थी उसे आसानी से समझ और उच्चारित कर सकें।
अपने समय के महान भाषा विज्ञानी डॉ. रघुवीर, डॉ. भोलानाथ
तिवारी, हरदेव बाहरी, फादर
कॉमिल
बुल्के आदि ने हज़ारों
शब्द सर्जित किए थे। डॉ. रघुवीर
ने डेढ़ लाख पारिभाषिक शब्दों का भारी-भरकम कोश तैयार किया था।
उन्होंने
अँगरेज़ी के अनेक शब्दों के हिंदी अनुवाद किए, नए शब्द भी गढ़े, मगर
तत्सम रूपों के कारण उन्हें स्वीकृति नहीं मिल सकी, लेकिन
उन्होंने युगांतकारी काम किया था, वे शुद्धतावादी थे अब केवल
संस्कृतनिष्ठ शब्दों से काम नहीं चलेगा। हमें भारतीय भाषाओं के
सहारे शब्दों की रचना करनी होगी।
डॉ. रघुवीर के काम को जी-तोड़ श्रम करने वाले अरविंदकुमार जी
आगे बढ़ा रहे हैं। लेकिन अनेक शब्द व्यावहारिकता के निकष पर
खरे नहीं उतर सके हैं।
अभी और मेहनत करनी होगी
और विज्ञान-तकनीकी शिक्षण के लिए दुरूह शब्दों के साथ-साथ मूल
शब्द भी प्रचलन में रखना होगा। धीरे-धीरे ही सही, क्लिष्ट शब्द
भी हमारे शैक्षणिक जीवन के हिस्से बन
जाएँगे।
ज़रूरत
इस बात की है, कि नए शब्द
पर्यायवाची रूप में निरंतर प्रचलन में रहें। इस बात का ध्यान
भी रखना होगा, कि अपनी भाषा की श्रेष्ठता का दंभ न पाला जाए।
अन्य भारतीय भाषाओं से भी शब्द लेने की कोशिशें हों। संस्कृत
को देववाणी
कह दिया जाता है। महाराष्ट्र के महान संत नामदेव इसीलिए तो
पूछते हैं, कि संस्कृत अगर देववाणी है
तो मराठी क्या चोरवाणी है
?
दरअसल अस्मिता के नाम पर हमारे हिंदी विद्वान कुछ ज़्यादा ही
भावुक और शुद्धतावादी हो गए। यही भावुकता शिक्षण-प्रशिक्षण में
बाधा बन रही है।
हिंदी का बृहत्तर समाज अब वैश्विक
होता जा रहा है, इसलिए वह शिक्षण के मामले में भी उदार बने।
हिंग्लिश या हिंगरेज़ी या
अँगरेज़ी
का तेज़ी से विस्तार हो रहा है। यह इस बात का प्रतीक है, कि
वर्जनाएँ टूट रही हैं। शुद्धता अब कोई अहम् मुद्दा नहीं। अब तो जो हमारी सेवा में तैनात है, उसकी भाषिक
प्रविधि को ही निखारने की
ज़रूरत
है।
अँगरेज़ी
हमारी जीवन शैली का हिस्सा बनती जा रही है। ऐसे समय में अगर
कुछ यौगिक शब्द बनें या
अँगरेज़ी
शब्दों की सरल अनुसर्जना हो, तो यह स्वागतेय है। जेल-खाना,
रेल-गाड़ी, रेलवे, प्लेटफार्म,
बस स्टैंड, शेयरधारक, आदि को हम हिंदी को हम हिंदी मानकर चलें।
रेडियो,
टीवी, भाषा के मामले में हम सर्वग्रह्म प्रवृत्ति के संत बन कर
यौगिक एवं सरल शब्दों को प्रोत्साहित करें। ग.मा. मुक्तिबोध ने
कहा था, कि राष्ट्रभाषा वही है जिसकी पहुँच ज़्यादा आदमियों तक
रहे। किंतु हम तो हिंदी की प्रेषणीयता को ही ख़त्म
करने जा रहे हैं। बात बिल्कुल सही है। दुरूह शब्दों को परोसने
की कोशिश
प्रकारांतर से हिंदी की प्रेषणीयता को ख़त्म कर देगी।
भाषिक संरचना की दिशा में निरंतर अनुसंधान हो रहे हैं इसलिए
विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षण की शब्दावलियों के बारे में आम राय
यही है कि उनके लोकव्यापीकरण पर ध्यान दिया जाए। जैसे प्रजनन
सरल लगता है, मगर उस प्रवर्णन कितना कठिन हो जाएगा। एल्फा के
लिए अकाराणु, कन्वैक्टर के लिए
पंखित्र जैसे शब्द उचित-से
प्रतीत नहीं होते। मेरे ख्याल से हारमोन को हारमोन ही रहने
दिया जाए। कन्वेक्टर अगर कन्वक्तर भी हो जाए तो चल सकता है।
जैसे रिपोर्ट का रपट हो गया। कार्डियल को हृदयल अनुवाद
हृदयग्राही है। ज्ञापन, परमाणु, अणु, रेडियोएक्टिवता, अधीक्षक,
निगम, मुदा-स्फीति, प्रायोजित अनुवांशिकी, डाक्टर, इंजीनियर,
जैसे अनेक शब्द हैं, जो धीरे-धीरे जीवन में घुल-मिल रहे हैं। मगर लाइटर के लिए प्रज्वलित्र कठिन है। उजालक जैसे
विकल्प पर विचार किया जाए। कम्प्यूटर के माउस को माउस ही रहने
दें। उसे चुहा न बनाएँ।
बहरहाल, हिंदी में तकनीकी और
वैज्ञानिक शिक्षण शिक्षण की दिशा में जो भगीरथ प्रयास हो रहे
हैं, वे विफल नहीं हो सकते। वह दिन दूर नहीं जब हमारी
राष्ट्रभाषा हिंदी में संपूर्ण तकनीकी शिक्षण शुरू हो जाएगा।
बस, हमें
अँगरेज़ी
के साथ-साथ भारतीय भाषाओं को भी खंगालना होगा। वहाँ भी हमें अँगरेज़ी
के पर्यायवाची शब्द मिल सकते हैं। उर्दू या कहें कि
हिंदुस्तानी भाषा के उनके शब्द लिए जा सकते हैं । दक्षिण की
भाषाओं के भी शब्द तलाशे जा सकते हैं। प्रख्यात व्याकरणाचार्य
किशोरीदास वाजपेयी कहते थे, कि हिंदी को तो अंतर-प्रांतीय
व्यावहार का माध्यम स्वीकार करना है।
अँगरेज़ी
भाषा के लदे रहने से प्रांतीय भाषाएँ नहीं दबीं, तब हिंदी से
क्या दबेंगी ?
हिंदी के सहयोग से तो वे अत्यधिक विकसित होंगी। महावीरप्रसाद
द्विवेदी जी कहते हैं, कि हिंदी भाषा जीवित भाषा है। जो लोग
उसे किसी परिमित सीमा के बीतर ही आवद्व
करना चाहते हैं, वे मानो
उसका उपचय-उसकी कलेवर-वृद्धि-नहीं चाहते।...संसार में शायद ही
ऐसी एक भी भाषा न होगी जिस पर, संपर्क के कारण, अन्य भाषाओं का
प्रभाव न पड़ा हो और अन्य भाषाओं के शब्द उसमें सम्मिलित न हो
गए हों । अंगरेज़ी
भाषा संसार की समृद्ध भाषाओं में है। उसी को देखिए
-
उसमें लैटिन, ग्रीक, फ्रेंच, जर्मन
आदि अनेक भाषाओं के शब्दों, भावों और मुहावरों का सम्मिश्रण है। उसमें संस्कृत भाषा तक के कुछ थोड़े ही परिवर्तित रूप
में पाए जाते हैं। उदाहरणार्थ पाथ के रूप में हमारा पथ और
ग्रास के रूप में घास प्रायः ज्यों का त्यों विद्यमान है। ये
सब उदाहरण इस बात के प्रमाण हैं कि हमारे पुरखे भी प्रगातिशील
सोच वाले थे, और वे भाषाई आदान-प्रदान का प्रबल पक्षधर थे।
हिंदी की शब्दावली को समृद्ध करने के लिए दूसरी भाषाओं की नदी में उतरना ही होगा। वैसे हमारी लोक भाषाएँ भी
बेहद प्राणवान हैं। छत्तीसगढ़ी भाषा में ही एक-एक शब्द के अनेक
पर्यायवाची शब्द मिल जाते हैं। भारतीय भाषाएँ समृद्ध है। इनमें
अँगरेज़ी
के समतुल्य अनेक शब्द मिल
जाएँगे।
ऐसा करके हम भाषाई सद्भावना की दिशा में भी एक सशक्त कदम बढ़ाएँगे
और तकनीकी शिक्षण के स्वप्न को भी पूरा करेंगे।
संदर्भः
(1)
अनुवाद पत्रिका के कोश विशेषांक (अंक-94-95, जनवरी-जून 1998)
(2)
अनुवाद शतक विशेषांक जुलाई-दिसंबर- 1999
(3)
समकालीन सृजन, अंक 18, 1998।
(4)
भाषा, जनवरी-, 2006
1-2
गिरीश पंकज
जी-31, नया
पंचशील नगर,
रायपुर-
492001 (छ.ग)
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