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वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

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।। हिंदी-विश्व ।।

 

 

हिंदी में वैज्ञानिक-तकनीकी शिक्षण और चुनौतियाँ


 गिरीश पंकज मंजुला पाध्याय

 

हिंदी अपनी वैश्विक पहचान बनाने की दिशा में तेज़ी के साथ बढ़ रही है। लेकिन तकनीकी और वैज्ञानिक शिक्षण की दिशा में अनेक स्तुत्य प्रयासों के बावजूद अभी भी बहुत कछ करना शेष है। चीन, जापान, जर्मन,फ्रांस और रूस जैसे अनेक देशों में राष्ट्रभाषा में कर सका है। हमारे यहाँ अगरेज़ी क रोना रोया जाता है। गुलामी एक बड़ा कारण रही है। आज भी हमारा तंत्र अँगरेज़ी के दुष्चक्र से बाहर नहीं निकल सका है। इसीलिए यह कह दिया जाता है, कि यहाँ हिंदी में तकनीकी या वैज्ञानिक शिक्षण नहीं हो सकता । जबकि ऐसा बिल्कुल नही हैं। हमारे भाषाविदों ने इस चुनौती को स्वीकार करके वर्षों पहले इस दिशा मे महत्वपूर्ण कार्य शूरू कर दिया है। डॉ. रघुवीर और उनके जैसे बहुत से लोंगो ने शुरुआत की, तो अरविंदकुमार जैसे एकनिष्ठ महानुभावों ने उस कार्य को और आगे बढ़ाया । लेकिन दिक्कत यही है कि तकनीकी शिक्षण के नाम पर जो अनुवाद हो रहा है, जो शब्द गढ़े जा रहे हैं, वे इनते क्लिष्ट हैं, कि उनको ग्राह्रा कर पाना संभव नहीं हो पा रहा। चुनौती यही है, कि हमारे भाषाविद् अँगरेज़ी के बरक्स ऐसे नए-नए शब्द सर्जित करें, जो  बेहद आसा किस्म के हों। राजभाषा के रूप मे ही अनेक शब्दों की सर्जना हुई है, वही लोगों के समझ में नहीं आते। वे उच्चारण की दृष्टि से भी बेहद कठिन हैं। फिर भी उन्हें प्रचलन में लाने की कोशिश हो रही है, जबकि शिक्षण के लिए सरल शब्दों के लिए और अधिक कठि साधना ज़रूरी है। एक तरफ़ पूरा मीडिया हिंग्लिश अथावा हिंगरेज़ी नामक नई भाषा विकसित करने पर तुला हुआ है, दूसरी तरफ़ उत्तरआधुनिकता का राग अलापने वाले लोग हैं, जो ऐसी ही वर्णसंकर भाषा पसंद कर रहे हैं। यह अगर एक नई सर्वमान्य संस्कृति होती, तो भी उसे स्वीकृति मिल सकती थी, मगर यह तो विशुद्ध रूप से अपसंस्कृति है। इसे कैसे आत्मसात किया जा सकता है ऐसे विद्रूप समय में हिंदी की वैज्ञानिक शिक्षा के मार्ग में चुनौतियाँ हैं । फिर हिंदी हिंदी है। संभावनाओं का ऐसा द्वार जो सर्जनात्मकता के लिए सदैव खुला रहता है।

 

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हिंदी को निरंतर समृद्ध बनाने की दिशा में भाषाविदों अपनी जवानी होम कर दी। आज भी कुछ लोग अपना बुढापा होम कर रहे हैं इन सबके प्रयासों से ही हिंदी की तकनीकी शिक्षण का मार्ग प्रशस्त हुआ है। हिंदी में अनुवाद के रूप में या अनुसंधान के रूप में अनेक नए शब्दों की सर्जना हुई है, हो रही है, लेकिन अधिकांश मामले में उसकी बुनावट जटिल है, इसे स्वीकारना होगा । शब्द गढ़ने के नाम पर कई बार असफल प्रयास हुए हैं। लोक प्रचलित हो चुके अँगरेज़ी के शब्दों के कठिन अनुवाद अब ग्राह्रा नहीं हो सकते । टाई के लिए कंठलंगोट और कंठभूषण अथवा सिगरेट के लिए श्वेत धूम्रपान दंडिका जैसे शब्द मजाक बन कर ही रह गए। कुछ शब्दों को तो जस का तस आत्मसात करना होगा, मगर जो अन्य शब्दावलियाँ हैं, उनकी सरलता पर काम करने की ज़रूरत है। टेक्निकल को तकनीकी बनाकर हमने उसे लोकप्रिय कर दिया। रिपोर्ट को रपट किया । अल्टीमेटम को अंतिमेत्थम कहा। अलेक्जेंडर सिकंदर बना। अरिश्टोटल अरस्तू हो गया, और रिक्रूट रंगरूट में बदल गया। कई बार भाषाविदों का काम समाज भी करता चलता है। जैसे मोबाइल को चलितवार्ता भी कहा जाता है। भाषाविद् प्रयास कर रहे होंगे कि इस शब्द का सही अनुवाद सामने आए । कोई सरल शब्द संभव न हो सके तो मोबाइल को ही गोद लेने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। पराई संतानों को स्वीकार करके हम उनके नए नामकरण की कोशिश करते हैं लेकिन हर बार सफलता मिल जाए, यह ज़रूरी नहीं।

 

हिंदी की तकनीकी शब्दावली को समृद्ध करने के लिए यह अति आवश्यक है कि हम सरल अनुवाद की संस्कृति को प्रोत्साहित करते रहें। अनुवाद ही वह सर्वोत्तम प्रविधि है, जो हिंदी के तकनीकी शिक्ष का आधार बनेगी। अनुवाद एक पुल है, जो दो दिलों को, दो भाषिक संस्कृतियों को जोड़ देता है। हिंदी की तकनीकी या वैज्ञानिक-चिकित्सकीय शिक्षण में अनुवाद का अप्रतिम योगदान रहेगा। अनुवाद के सहारे ही विदेशी या स्वदेशी भाषाओं के अनेक शब्द हिंदी में आते हैं और नया संस्कार ग्रह करते हैं। कोई भाषा तभी समृद्ध होती है, जब वह अन्य भाषाओं के शब्द भी ग्रहण करती चले। हिंदी में शब्द आते हैं और नया संस्कार ग्रहण करते हैं। हिंदी भाषा में आकर अँगरेज़ी के कु शब्द समरस होते हैं, तो यह खुशी की बात है। लेकिन इस चक्क में हमारे मूल शब्द ही हाशिये पर चले जाए, तकनीकी शब्दावली सरल होगी, तभी स्वीकार्य होगी। वरना सारी शब्दावलियाँ पुस्तकों तक ही सीमित होकर रह जाएगी । या फिर उनका हश्र भी संस्कृत भाषा की  तरह हो जाएगा। व्यवहार में अँगरेज़ी ही चलती रहेगी। अनुवाद पत्रिका सदभावना दर्प का प्रकाशन करते हुए मैंने महसूस किया कि पत्रिका में जो कविता या कहानी सरल भाषा में अनूदित हुई, उस पर तो पाठकीय प्रतिक्रियाओं की भरमार रही, मगर जिन रचनाओं के अनुवाद क्लिष्ट थे, उन पर कोई प्रतिक्रिया ही नहीं आई। इक्का-दुक्का अगर आई भी, तो यही कहा गया, कि सरल अनुवाद पर ध्यान दें।

 

पिछले कुछ वर्षों में नए-नए शब्द-संसार से गुज़रते  हुए बहुतों ने यह महसूस किया कि हिंदी के तकनीकी शिक्षण में फिलहाल सबसे बड़ी दिक्कत यही है, कि जो नए-नए शब्द गढ़े जा रहे हैं, वे तत्सम-प्रकृति के हैं और क्लिष्ट भी हैं। उनमे सरलीकरण का खाँटी अभाव है। जैसे समय के साथ-साथ शब्द भी आसान होते चलते हैं, तद्भवी रूप लेते रहते हैं, उसी तरह तकनीकी शब्दों को भी थोड़ा आसान बनाना होगा। जिव्हा से जीभ, वृच्श्रिक से बिच्छू, अक्षि से आँख, स्तन से थन, कोकिल से कोयल और इंतकाल का रूपांतरण अंतकाल सचमुच  सरल और व्यावहारिक लगता है। लेकिन संस्कृत या अंगरेजी़ के कुछ शब्दों का हिंदीकरण करने के चक्कर में उसे और ज़्या क्लिष्ट बना देना अन्याय ही है। जैसे अपमार्जिका को अपमार्जक जंतु, उरका को सरीसृप जीव कहना मूल शब्द से एक तरह का खिलवाड़ ही लगता है। संस्कृत के अतिचित्र को कैरिकेयर और प्रक्षेपित्र को प्रोजक्टर के विकल्प रूप में रखना तो सुखद लगता है, मगर मीसोन को मध्योण, पोजीट्रोन को धनोण, न्यूट्रोन को नपुंसोण और ऐक्स क्रोमोसोम का अक्षसोप या अक्षोम नामकरण शिक्षण को और दुरूह कर देगा। बेहतर यही होगा कि हम वैज्ञानिक एवं तकनीकी शिक्षण के लिए सरल एवं ग्राह्म हो सकने वाले शब्दों की ही सर्जना करें। जैसे गलूकोज को मधुरोस, प्रोटीन को प्रोथीन, चार्जिक को चार्जन करना ज़्यादा व्यावहवारिक एवं ग्राह्म प्रतीत होता है।

 

मूल्य शब्दों से परे जाकर अनुवाद करना और और मूल शब्द से मिलते-जुलते शब्दों की सर्जना में अंतर है। शब्दकोश की समृद्धि के लिए दुरूह प्रयोग ठीक हो सकते हैं, लेकिन शिक्षण की दृष्टि से देखें तो ये कतई उपयोगी सिद्ध नहीं हो सकेंगे । जैसे प्रक्षालित्र, उत्थापित्र, प्रोत्थापित्र, प्रदोलित्र, संरोधित्र, श्यानित्र जैसे शब्द लाख कोशिशों के बावजूद छात्र ग्राह्म नहीं कर पाएगे। इससे बेहतर तो यही होगा कि हम अँगरेज़ी के शब्दों को ही जस का तस रख दें, या फिर रुपांतरण इतना आसान बनाएँ, कि अटपटा न लगे। फ्रिजर का अनुवाद श्यानित्र, एयरकूलर का शीतित्र अथवा वातानुशीतित्र तथा इनवाइटर को इग्रित्र कहना अटपटा प्रयोग लगता है। ऐसा करके हम छात्रों को शिक्षण ही नहीं, हिंदी से भी दूर ले जाएँगे। एयरकूल का वातानुकूल तो ठीक है, लेकिन यह भी स्वीकारना होगा, कि हर युग में और हर कहीं केवल सरलता ही स्वीकार्य होती है। वाल्मीकि द्वारा संस्कृत में रची गयी रामायण संस्कृत के विद्वान तो समझ पाए, लेकिन वह आम लोगों से दूर ही रही, लेकिन जैसे ही तुलसीदास जी ने रामचरित मानस की अवधी जैसी खड़ी बोली में, सर्जना की, तो वह देखते ही वैश्वीक हो गई।

 

विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षण के लिए गढ़े जाने वाले शब्दों के साथ भाषाविद् इस बात का भी ध्यान रखें, कि उसे लो-सवीकृति मिले। नए तकनीकी शब्द अगर किताबी बन कर रह गए, तो उनकी उपादेयता क्या रहेगी ? वे हमारे जीवन के भी अनिवार्य हिस्से क्यों न बनें ? नित नए शब्दों के सर्जक दिन-रात एक कर रहे हैं। लैंस को चंद्रक, कार्डियल को हृदयल, पैथसिन के लिए जठरिन, एयर कन्वेटर के लिए परिवत्र या संवाहित्र, और इंक्केरी के लिए परिपृष्टा जैसे शब्दों की सर्जना वंदनीय है लेकिन य ग्राह्रा नहीं हो सकते। अगर हम ऐसे शब्दों के सहारे शिक्ष करने की तैयारी कर रहे हैं, तो छात्र दूर होते जाएगे। सरलीकरण का ध्यान रखते हए शब्द-संधान हो। ऐसे शब्द तैयार हों, जो पानी की तरह बहते हों। नए सृजित शब्दों के अधिकांश उदाहर मैंने अरविंदकुमार जी के समांतर कोश से ही लिए हैं। अरविंदकुमार जी ने अपनी धर्मपत्नी के साथ मिल कर निसंदेह युगांतकारी काम किया है। हिंदी साहित्य उनका ऋणी है, लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से उनके अनेक शब्द शायद अप्रचलित ही रह जाएँगे । शिक्षण-प्रशिक्षण की दृष्टि से उपयोगी सिद्ध नहीं हो पाएगे। जिस तरीके के शब्द सामने आ रहे हैं, उसे देख कर ही यह माना जाने लगा है कि हमारे यहाँ भी हिंदी में तकनीकी शिक्षण सर्वाधिक जटिल का है।

 

भूमंडलीकरण के इस दौर में एक भाषा में अन्य भाषाओं के शब्द भी सहज रूप से समरस होने लगे हैं। यह वैश्वीकरण की दिशा में रचनात्मक पहल है। आक्सफोर्ड शब्दकोश में पक्का, अचार, गंगा, पंडा, हिंदी, पंडित जैसे अनेक शब्द शामिल हो चुके हैं। तब हम अँगरेज़ी के बेहद प्रचिलत शब्दों का शिक्षण में इस्तेमाल क्यों नहीं कर सकते ? शब्दों की नई संरचनाएँ स्वागतेय हैं, मगर वे पर्यायवाची के रूप में ही रहें। जैसे ब्लैकहोल को कालत्र कहना या विटामिन के लिए जीवामिन शब्द बनाना ठीक है, लेकिन समीचीन यही होगा, कि हम ब्लैकहोल और विटामिन का ही व्यवहार करते रहे, क्योंकि ये शब्द अब बेहद प्रचलित हो गए हैं। एयरकूल एयरकूल ही ठीक है। इसे वातानुशीतित्र करने से गरमी बढ़ सकती है। मानसिक शीतलता दृष्टि से कठिन शब्दावलियों से परहेज भी ज़रूरी है। तभी तकनीकी शिक्षण सफल हो पाएगा। (क्रमश...)

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