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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। गीत ।।

 

 

अधरों पर अँगारा रखकर

 

मैं तो तुमसे अधिक तुम्हारे व्यवहारों का आभारी हूँ

जिनने मुझको यह समझाया मन कैसे टूटा करता है ।

 

तुमको पता नहीं था तुमसे मिलने की क्या मज़बूरी

संबंधों के इस जंगल में ब़ाकी रहे न कोई दूरी

परिचित गलियारा मेरी इस भावुकता पर खूब हँसा था

अधरों पर अँगारा रखकर आँगन तक ने व्यंग्य कसा था

शायद पहली बार मुझे भी तब जाकर आभास हो सका,

मंजिल के आने से पहले पथ कैसे छूटा करता है ।

 

दीवारों ने कहा किसी के दरवाज़े सपने मत लाना

आँसू गंगाजल होता है सागर को यह मत समझाना

तुमने क्या आशीषा मेरी पीड़ा सूरजमुखी हो गई

तुमने जिस दिन इसे न सींचा यह हतभागी दुःखी हो गई

संबोधन के लिए अचानक तुम अनुदार न हो जाते तो,

मैं अनभिज्ञ रह गया होता मीत कहाँ रूठा करता है ।

 

इतना संबल ही क्या कम है तट छूटा तो लहर पा गया

भटका हुआ बिसाती सबकुछ खोकर अपने गाँव आ गया

मैं मरुथल हूँ मुझे न चिन्ता लेकिन तुम तो हरे हो गये

संबंधों का नीर सुखाकर, उपचारों से परे हो गये

मैं ड्योढ़ी तक आ पहुँचा था केवल यही बताने तुमको

परिचित तह पर किसी बटोही कैसे लूटा करता है ।

    राम अधीर

108/1, शिवाजीनगर, भोपाल - 16

 ◙◙◙

गीतकार

- जगत प्रकाश चतुर्वेदी

- डॉ. जगदीश सलिल

- श्रीमती मीरा शलभ

- राम अधीर

- डॉ. अशोक गुलशन

 

माह का गीतकार

- राकेश खंडेलवाल

....नाम तुम्हारा

....किसके चित्र बनाती

....वक्त की हवायें

....लड़खड़ाने लगी बाग में

....एक विधेयक-आँखों ने

 

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तकनीकः प्रशांत रथ

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