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सृजनगाथा
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वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008
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।। गीत ।।
स्वप्न मृगी के पीछे-पीछे
उमर बावली कितनी दौड़ी
और हताशा की बेला में
साँसों की भी प्याली तोड़ी ।
चादर छोटी देह बड़ी थी
सो आपस में आन पड़ी थी
तार-तार हो गयी चदरिया
अब पछताए देह निगोड़ी ।
आकुल-व्याकुल मन की मैना
बहुत अँधेरी शीतल रैना
निर्जन वन मे इतना भटकी
उसने भोर की आस न छोड़ी ।
हँसती रही स्वप्न-सी माया
मूरख को कितना भरमाया
छोड़ चली संग काया छाया
हाथ लगी न माया कौड़ी ।
मीरा शलभ
243, सेक्टर-1, चिरंजीव विहार
गाजियाबाद - 201002
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गीतकार
- जगत प्रकाश चतुर्वेदी
- डॉ. जगदीश सलिल
- श्रीमती मीरा शलभ
- राम अधीर
- डॉ. अशोक गुलशन
माह का गीतकार
- राकेश खंडेलवाल
....नाम तुम्हारा
....किसके चित्र बनाती
....वक्त की हवायें
....लड़खड़ाने लगी बाग में
....एक विधेयक-आँखों ने
संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति
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