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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। गीत ।।

 

 

वृक्ष हैं किनारों के

 

और हम दो-चार दिन मिल लें

वृक्ष हैं हम

अब किनारों के !

 

बंद होंगी जब, हवाओं के लिए भी सीढ़ियाँ

क्या हमें पहचान लेंगी, कल सुबह की पीढ़ियाँ

 

डाल पर कुछ और हम खिल लें

फूल हम

अंतिम बहारों के !

 

आ रही डोली, दिखाई दे रहे मस्तूल

आज की मीनार है यह, सिर्फ़ कल की धूल

 

पास आती आहटें सुन लें

चल पड़े हैं

पग कहारों के !

 

साथ थे हम जिस तरह, पंखुरी गुलाबों की

थी यही तस्वीर, अपने चंद ख्वाबों की

 

एक पल सपने वही बुन लें

हम दिये

बुझते सितारों के !

    जगत प्रकाश चतुर्वेदी

देवाश्रय, आश्रम रोड, मैनपुरी, उ.प्र.

 ◙◙◙

 

गीतकार

- जगत प्रकाश चतुर्वेदी

- डॉ. जगदीश सलिल

- श्रीमती मीरा शलभ

- राम अधीर

- डॉ. अशोक गुलशन

 

माह का गीतकार

- राकेश खंडेलवाल

....नाम तुम्हारा

....किसके चित्र बनाती

....वक्त की हवायें

....लड़खड़ाने लगी बाग में

....एक विधेयक-आँखों ने

 

 

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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