vbn

SRIJANGATHA.COM

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच

सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। ग़ज़ल ।।

 

 

हमेशा आईना पूछे है

 

अजब हालात की सूरत सँवारी

वही रातें वही लम्हा-शुमारी

 

थी हमने आरती जिनकी उतारी

वही करने लगे हमपर सवारी

 

गिने हैं क्या वो सब आधे-अधूरे

ज़रा फिर से करो मर्दम-शुमारी

 

थका है बाप से बेटा ज़ियादा

करेगा कौन अब तीमारदारी

 

वहाँ करती भी क्या लछमन की रेखा

जहाँ रावण गया बन कर भिखारी

 

दिए हैं जा ये हाथों में जिसने

वही साक़ी उतारेगा ख़ुमारी

 

हमेशा आईना पूछे है ‘द्विज’से

यही सूरत है क्या अस्ली तुम्हारी?

 

  द्विजेन्द्र द्विज

प्राध्यापक, अँग्रेजी, राजकीय पालीटेक्निक, कांगड़ा

हिमाचल प्रदेश - 176001

◙◙◙

 

ग़ज़लकार

माह के ग़ज़लकार - द्विजेन्द्र द्विज

- ख़ौफ़ आँखों में समंदर..

- शहर से छिन जाएगी..

- इक ऩजर में समंदर...

- बच्चा खो गया...

- हमेशा आईना पूछे...

 

देवमणि पांडेय

- बीच सड़क पर गर्म लहू सा

- और कोई कल जाएगा

- मेरा आसमान मिले

- आना जाना भूल गए

 

प्राण शर्मा

- ये वो पंछी है

- पंछी परों से हीन हो

 

 

 

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

Google