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हमेशा आईना पूछे है
अजब
हालात की सूरत सँवारी
वही रातें
वही लम्हा-शुमारी
थी हमने
आरती जिनकी उतारी
वही करने
लगे हमपर सवारी
गिने
हैं क्या वो सब आधे-अधूरे
ज़रा फिर
से करो मर्दम-शुमारी
थका है
बाप से बेटा ज़ियादा
करेगा
कौन अब तीमारदारी
वहाँ
करती भी क्या लछमन की रेखा
जहाँ
रावण गया बन कर भिखारी
दिए हैं
जाम ये
हाथों में जिसने
वही साक़ी
उतारेगा ख़ुमारी
हमेशा
आईना पूछे है ‘द्विज’से
यही
सूरत है क्या अस्ली तुम्हारी?
द्विजेन्द्र
द्विज
प्राध्यापक, अँग्रेजी,
राजकीय पालीटेक्निक,
कांगड़ा
हिमाचल प्रदेश
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176001
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