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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। ग़ज़ल ।।

 

 

बच्चा खो गया दुनिया की भीड़ में

 

मैं ज़िन्दगी में कभी इस क़दर न भटका था

कि जब ज़मीर मुझे रास्ता दिखाता था

 

मशीन बन तो चुका हूँ मगर नहीं भूला

कि मेरे जिस्म में दिल भी कभी धड़कता था

 

वो बच्चा खो गया दुनिया की भीड़ में कब का

हसीन ख़्वाबों की जो तितलियाँ पकड़ता था

 

मेरा वजूद भी शामिल था उसकी मिट्टी में

मेरा भी खेत की फ़स्लों में कोई हिस्सा था

 

हमारी ज़िन्दगी थी इक तलाश पानी की

जहान रेत का द्विज’! इक चमकता दरिया था

  द्विजेन्द्र द्विज

प्राध्यापक, अँग्रेजी, राजकीय पालीटेक्निक, कांगड़ा

हिमाचल प्रदेश - 176001

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ग़ज़लकार

माह के ग़ज़लकार - द्विजेन्द्र द्विज

- ख़ौफ़ आँखों में समंदर..

- शहर से छिन जाएगी..

- इक ऩजर में समंदर...

- बच्चा खो गया...

- हमेशा आईना पूछे...

 

देवमणि पांडेय

- बीच सड़क पर गर्म लहू सा

- और कोई कल जाएगा

- मेरा आसमान मिले

- आना जाना भूल गए

 

प्राण शर्मा

- ये वो पंछी है

- पंछी परों से हीन हो

 

 

 

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