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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। ग़ज़ल ।।

 

 

ख़ौफ़ आँखों में समंदर

 

ज़ेह्न में और कोई डर नहीं रहने देता

शोर अन्दर का हमें घर नहीं रहने देता

 

कोई ख़ुद्दार बचा ले तो बचा ले वर्ना

पेट काँधों पे कोई सर नहीं रहने देता

 

आस्माँ भी वो दिखाता है परिंदों को नए

हाँ, मगर उनपे कोई पर नहीं रहने देता

 

ख़ुश्क आँखों में उमड़ आता है बादल बन कर

दर्द एहसास को बंजर नहीं रहने देता

 

एक पोरस भी तो रहता है हमारे अन्दर

जो सिकन्दर को सिकन्दर नहीं रहने देता

 

उनमें इक रेत के दरिया-सा हर जाता है

ख़ौफ़ आँखों में समंदर नहीं रहने देता

 

हादसों का ही धुँधलकासा द्विज आँखों में मेरी

ख़ूबसूरत कोई मंज़र नहीं रहने देता

  द्विजेन्द्र द्विज

प्राध्यापक, अँग्रेजी, राजकीय पालीटेक्निक, कांगड़ा

हिमाचल प्रदेश - 176001

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ग़ज़लकार

माह के ग़ज़लकार - द्विजेन्द्र द्विज

- ख़ौफ़ आँखों में समंदर..

- शहर से छिन जाएगी..

- इक ऩजर में समंदर...

- बच्चा खो गया...

- हमेशा आईना पूछे...

 

देवमणि पांडेय

- बीच सड़क पर गर्म लहू सा

- और कोई कल जाएगा

- मेरा आसमान मिले

- आना जाना भूल गए

 

प्राण शर्मा

- ये वो पंछी है

- पंछी परों से हीन हो

 

 

 

 

 

 

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