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ख़ौफ़ आँखों में समंदर
ज़ेह्न में और कोई डर नहीं रहने देता
शोर अन्दर का हमें घर नहीं रहने देता
कोई ख़ुद्दार बचा ले तो बचा ले वर्ना
पेट काँधों पे कोई सर नहीं रहने देता
आस्माँ भी वो दिखाता है परिंदों को नए
हाँ, मगर
उनपे कोई
‘पर’
नहीं रहने देता
ख़ुश्क आँखों में उमड़ आता है बादल बन कर
दर्द एहसास को बंजर नहीं रहने देता
एक पोरस भी तो रहता है हमारे अन्दर
जो सिकन्दर को सिकन्दर नहीं रहने देता
उनमें इक रेत के दरिया-सा
ठहर
जाता है
ख़ौफ़ आँखों में समंदर नहीं रहने देता
हादसों का ही धुँधलका—सा
‘द्विज’
आँखों में मेरी
ख़ूबसूरत कोई मंज़र नहीं रहने देता
द्विजेन्द्र
द्विज
प्राध्यापक, अँग्रेजी,
राजकीय पालीटेक्निक,
कांगड़ा
हिमाचल प्रदेश
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176001
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