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पंछी परों से हीन हो
ख़ुश कभी हो और कभी ग़मगीन हो
खट्टी-मीठी यादों में क्या लीन हो
मिसरी सी बातें तुम्हारी हैं जनाब
दिखने में लेकिन बड़े नमकीन हो
ख़्वाब मे तुम आए मेरे चुपके से
जैसे धीमी फ़िल्म का इक सीन हो
जादू इसका मन में क्यों उतरे नहीं
घाटियों मे गूँजती जब बीन हो
ज़िंदगी तू दुख में मुझको यूँ लगी
जिस तरह पंछी परों से हीन हो
क्यों न सोचे हर कोई अपना भला
क्यों न सोचे उसका घर रंगीन हो
क्यों किसी पर बेवजह उँगली उठे
क्यों किसी की बेवजह तौहीन हो
हाथ जोड़े रहता है वो हर घड़ी
'प्राण' कोई इतना भी
क्यों दीन हो
प्राण शर्मा
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CRAKSTON CLOSE
COVENTRY CV2 53B
UK
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