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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। ग़ज़ल ।।

 

पंछी परों से हीन हो

 

ख़ुश कभी हो और कभी ग़मगीन हो

खट्टी-मीठी यादों में क्या लीन हो

 

मिसरी सी बातें तुम्हारी हैं जनाब

दिखने में लेकिन बड़े नमकीन हो

 

ख़्वाब मे तुम आए मेरे चुपके से

जैसे धीमी फ़िल्म का इक सीन हो

 

जादू इसका मन में क्यों उतरे नहीं

घाटियों मे गूँजती जब बीन हो

 

ज़िंदगी तू दुख में मुझको यूँ लगी

जिस तरह पंछी परों से हीन हो

 

क्यों न सोचे हर कोई अपना भला

क्यों न सोचे उसका घर रंगीन हो

 

क्यों किसी पर बेवजह उँगली उठे

क्यों किसी की बेवजह तौहीन हो

 

हाथ जोड़े रहता है वो हर घड़ी

'प्राण' कोई इतना भी क्यों दीन हो  

   प्राण शर्मा

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ग़ज़लकार

माह के ग़ज़लकार - द्विजेन्द्र द्विज

- ख़ौफ़ आँखों में समंदर..

- शहर से छिन जाएगी..

- इक ऩजर में समंदर...

- बच्चा खो गया...

- हमेशा आईना पूछे...

 

देवमणि पांडेय

- बीच सड़क पर गर्म लहू सा

- और कोई कल जाएगा

- मेरा आसमान मिले

- आना जाना भूल गए

 

प्राण शर्मा

- ये वो पंछी है

- पंछी परों से हीन हो

 

 

 

 

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