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यह देखते हुए कि मैं स्कूल में कुछ खास नहीं कर पा रहा हूँ
मेरे पिता ने समझदारी दिखाते हुए मुझे कुछ पहले ही स्कूल से
उठवा लिया और मुझे भाई के साथ एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी भेज दिया
जहाँ पर मैं दो बरस तक रहा।
मेरे भाई अपनी डाक्टरी की पढ़ाई पूरी कर रहे थे। हालांकि मैं
जानता था कि डाक्टरी की प्रैक्टिस करने का उनका कोई इरादा नहीं
था और पिताजी ने मुझे इसलिए भेजा था कि मैं भी डाक्टरी की
पढ़ाई शुरू कर सकूँ। इसी दौरान मुझे कुछेक छोटी मोटी घटनाओं से
यह पता चल चुका था कि मेरे पिताजी मेरे लिए इतनी जायदाद छोड़
जाएँगे कि मैं आराम से ज़िन्दगी बसर कर सकूँ। हालांकि मैंने
कभी सोचा भी नहीं था कि मैं इतना धनवान हूँ लेकिन जब मुझे अपनी
हैसियत का पता चला तो इतना ज़रूर हुआ कि डाक्टरी पढ़ने की
मेहनत के रास्ते में रुकावट आ गयी।
एडिनबर्ग में सारी शिक्षा लैक्चरों के जरिए दी जाती थी। लेकिन
ये लैक्चर इतने उबाऊ और नीरस होते थे कि बस पूछो मत। इनमें अगर
कुछ अपवाद था तो रसायनशास्त्र के बारे में होप के लैक्चर। इस
सबके बावजूद मेरे विचार से पढ़ने की तुलना में लैक्चरों से लाभ
तो कुछ नहीं होता था उल्टे इनके साथ हानियाँ कई एक जुड़ी हुई
थीं। सर्दियों में सवेरे ठीक आठ बजे डॉ डन्कन द्वारा
मैटेरिया मेडिका
पर दिए जाने वाले लैक्चरों की याद आज भी तन को झकझोर देती है।
डॉ मुनरो मानव शरीर शास्त्र पर उतने ही नीरस लैक्चर देते थे
जितने नीरस वे खुद थे और यह विषय मुझे वैसे भी कोफ्त भरा लगता
था। मेरे जीवन में यह तो एक बड़ी दुर्घटना के रूप में तो है ही
कि मैं चीर फाड़ की कला नहीं सीख पाया। यदि सीख लेता तो न केवल
अपनी झुँझलाहट से बच जाता बल्कि यह अभ्यास मुझे भविष्य में
मेरी काफी
मदद करता। इस कमी की तो भरपाई कभी भी नहीं हो पायी। मुझमें एक
और कमी भी थी कि मैं ड्राइंग भी नहीं बना पाता था। मैं अस्पताल
में क्लीनिकल वार्ड में नियमित रूप से जाता था। कुछ मामले तो
ऐसे थे जिन्हें देखकर मैं व्याकुल हो जाता था। कुछ तो ऐसे हैं
जो आज भी मेरे दिलो दिमाग पर गहराई से छाए हुए हैं लेकिन इन
सबसे विचलित होकर मैंने कक्षाओं में अपनी हाजिरी कम नहीं होने
दी। मुझे अभी भी यह समझ में नहीं आया है कि इस विषय की शिक्षा
प्राप्त करने में मुझे रोचकता का अनुभव क्यों नहीं हुआ।
क्योंकि एडिनबर्ग आने से पहले गर्मियों के दौरान श्रूजबेरी में
मैंने कुछ गरीब लोगों का इलाज किया था। खासकर औरतों और बच्चों
का। सभी रोगियों के मामलों में मैंने उनके सभी लक्षणों को
विस्तारपूर्वक लिखा फिर ये सभी पिताजी को सुनाए उन्होंने कुछ
और बातें भी पूछने के लिए कहा और मुझे दवाओं के बारे में भी
बताया। ये दवाएंं भी मैंने खुद ही तैयार कीं। एक बार में मेरे
पास तकरीबन एक दर्जन बीमार आते थे और मुझे इस काम में काफी
रुचि भी थी।
मैं जितने भी लोगों को जानता हूँ उनमें मेरे पिताजी ही ऐसे थे
जो व्यक्तित्व के गहरे पारखी थे और उन्होंने मेरे लिए एक दिन
कहा था कि मैं एक सफल डाक्टर बन सकता हूँ। इसका मतलब तो बस यही
होता था
ऐसा व्यक्ति जिसके पास ढेर सारे मरीज आएँ। दूसरी ओर वे यह भी
मानते थे कि सफलता का मुख्य तत्त्व है
आत्मविश्वास लेकिन मेरी जिस बात ने उन्हें प्रभावित किया था वह
यह कि मैं जो कुछ नहीं भी जानता था उस बात के प्रति भी अपने मन
में आत्मविश्वास पैदा कर लेता था। मैं एडिनबर्ग में दो बार
ऑपरेशन थिएटर में भी गया और बहुत ही दर्दनाक ढंग से किए जा रहे
दो ऑपरेशन भी देखे। इनमें से एक ऑपरेशन तो किसी बच्चे का था
लेकिन ऑपरेशन पूरा होने से पहले ही मैं बाहर निकल आया। इसके
बाद मैं कभी भी ऑपरेशन कक्ष में नहीं गया। यहाँ यह भी बता दूँ
कि उन दिनों क्लोरोफार्म का उपयोग नहीं किया जाता था इसलिए
दोनों ही ऑपरेशन देखकर दिल दहल गया था। मन में एक बलवती इच्छा
तो थी कि एक बार मैं फिर ऑपरेशन देखने जाऊँ लेकिन कभी नहीं
गया। लेकिन दोनों ऑपरेशनों के दृश्य मुझे काफी दिनों तक विचलित
करते रहे।
मेरे भाई यूनिवर्सिटी में सिर्फ एक साल ही मेरे साथ रहे। दूसरे
बरस तो सारे इन्तज़ाम मुझे खुद ही करने पड़े और यह एक तरह से
अच्छा भी रहा क्योंकि इसी दौरान मैं ऐसे युवकों के सानिध्य में
आया जो प्राकृतिक
विज्ञान में रुचि रखते थे। इन्हीं युवाओं में एक थे एन्सवर्थ
बाद में इन्होंने असीरिया की यात्रा का वृत्तांत भी प्रकाशित
कराया। ये सज्जन वर्नेरियन भूविज्ञानी थे और बहुत से विषयों की
थोड़ी बहुत जानकारी रखते थे। डॉ कोल्डस्ट्रीम एक अलग ही तरह के
नवयुवक थे। बड़े ही विनम्र और नफासत पसन्द बहुत ही धार्मिक और
दयालु बाद में इन्होंने प्राणिशास्त्र में कई बेहतरीन लेख
प्रकाशित कराए। मेरा एक और युवा साथी था हार्डी आगे चलकर
वनस्पति शास्त्र बनाए लेकिन भारत प्रवास के दौरान बहुत कम
उम्र में ही उसकी मृत्यु हो गयी थी।
मेरे आखिरी दोस्त थे डॉ ग्रान्ट। वैसे तो वे मुझसे कई बरस
वरिष्ठ थे भी उनके साथ मेरी घनिष्ठता कैसे हुईए मुझे नहीं
मालूम। उन्होंने प्राणिशाó
में अतिश्रेष्ठ लेख प्रकाशित कराए थे। लेकिन यूनिवर्सिटी कॉलेज
में प्रोफेसर के रूप में लन्दन आने के बाद उन्होंने विज्ञान
में कुछ खास नहीं किया। यह बात ऐसी थी जिसे मैं कभी समझ नहीं
पाया। मैं उन्हें अच्छी तरह से जानता था। उनका व्यवहार बड़ा ही
नीरस और औपचारिक था लेकिन इस बाहरी आवरण के भीतर निहायत ही नेक
दिल और उत्साही व्यक्ति छिपा हुआ था। एक दिन हम लोग साथ.साथ
घूम रहे थे कि अचानक ही उन्होंने उद्विकास के बारे में लैमारेक
के दृष्टिकोणों पर अपने विचार प्रकट करने शुरू कर दिए। मैं
चकित होकर मूक श्रोता बना रहा लेकिन जहाँ तक मेरा ख्याल है मुझ
पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इससे पहले मैंने अपने दादाजी की
जूनोमिया पढ़ी थी। उसमें भी इसी प्रकार के विचार व्यक्त किए गए
थे और उनका भी मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा था। इसके बावजूद यह
भी सम्भावना है कि जीवन के आरम्भ में ही इस प्रकार की
विचारधारा को स्वीकार करता और उसकी प्रशंसा करता तो जिस प्रकार
से उन्हीं विचारों को मैंने ओरिजिन
ऑफ
स्पेशीज़ में लिखा है शायद उनका रूप कुछ और ही होता। इस समय
मैं जूनोमिया की काफी प्रशंसा करता हूँ लेकिन दस या पन्दह वर्ष
के अन्तराल के बाद दोबारा वही किताब पढ़ कर मैं काफी असन्तुष्ट
रहा। तथ्यों और परिकल्पनाओं में बहुत ही अन्तर दिखाई दिया।
ड़ॉ ग्रान्ट और ड़ॉ कोल्डस्ट्रीम दोनों ही मैरीन जूलॉजी पर
अधिक ध्यान देते थे। मैं भी यदा कदा ड़ॉ ग्रान्ट के साथ समुद
किनारे चला जाता था और समुद में ज्वार के बाद किनारे रुके हुए
पानी में जीव पकड़ता था। बाद में इन जीवों की मैं चीर.फाड़ भी
करता था। न्यू हैवेन के बहुत से मछुआरों से मेरी दोस्ती हो गयी
थी। जब वे सीपियाँ पकड़ने जाते तो मैं भी कई बार उनके साथ हो
लेता था। इस तरह से मैंने कई नमूने एकत्र कर लिए थे। अब चीर
फाड़ का मुझे अधिक ज्ञान और अभ्यास भी नहीं था और मेरा
सूक्ष्मदर्शी यत्र भी बस कामचलाऊ ही था। इन सब बाधाओं के कारण
मैं इस दिशा में ज्यादा कुछ नहीं कर पाया। इस सबके बावजूद
मैंने छोटा किन्तु रोचक अन्वेषण किया और प्लिनियन सोसायटी के
समक्ष एक छोटा सा लेख भी पढ़ा। यह लेख फ्लस्ट्रा के डिम्बों के
बारे में था। इसमें मैंने बताया था कि सिलिया के माध्यम से
इसमें स्वतत्र गति होती है लेकिन बाद में पता चला कि वास्तव
में ये लारवे थे। एक और लेख में मैंने दर्शाया था कि छोटे छोटे
गोलाकार जीव जिन्हें फ्यूकस लोरेस की आरम्भिक अवस्था कहा जाता
है वस्तुत पोन्टोबडेला म्यूरीकेटा जैसे कृमियों के अण्डों का
खोल थे।
मेरी जानकारी के मुताबिक प्लिनियन सोसायटी की स्थापना प्रोफेसर
जेम्सन ने की थी और वही इसके प्रेरक भी थे। इस सोसायटी में कई
छात्र भी शामिल थे और प्राकृत विज्ञान के बारे में लेख पढ़ने
और विचार विमर्श के लिए यूनिवर्सिटी के एक तहखाने में इसकी
बैठकें होती रहती थीं। मैं इनमें नियमित रूप से शामिल होता था
और मेरे उत्साह को बढ़ाने तथा मुझे नए किस्म की अंदरूनी
नज़दीकी प्रदान करने में इन बैठकों का काफी योगदान रहा। एक शाम
की बात है एक बेचारा युवक बोलने के लिए खड़ा हुआ किन्तु बहुत
देर तक हकलाता रहा। वह भयातुर हो पीला पड़ गया। अन्त में वह
किसी तरह बोला
माननीय अध्यक्ष महोदय मैं जो कुछ कहना चाहता था वह सब भूल गया
हूँ। वह बेचारा पूरी तरह से भयभीत लग रहा था। सभी सदस्य हैरान।
कोई भी यह समझ नहीं पा रहा था कि उस बेचारे की बौखलाहट पर क्या
कहा जाए । हमारी सोसायटी में जो लेख पढ़े जाते थे वे मुदित
नहीं होते थे इसलिए मुझे अपने लेखों को मुदित रूप में देख पाने
का सौभाग्य नहीं मिला लेकिन मुझे मालूम है कि ड़ॉ ग्रान्ट ने
मेरी छोटी सी खोज को फ्लास्ट्रा पर अपने अनुसंधान लेख में
स्थान दिया था।
मैं रॉयल मेडिकल सोसायटी का भी सदस्य था और इसमें भी नियमित
रूप से शामिल होता था। इसके सभी विषय पूरी तरह से मेडिकल से
जुड़े थे इसलिए मेरी रुचि अधिक नहीं रही। यहाँ तो सब ऊल जलूल
ही बातें होती थीं लेकिन इसमें कुछ अच्छे वक्ता भी थे। इनमें
सर ज़े क़े शटलवर्थ सर्वोत्तम थे। ड़ॉ ग्रान्ट मुझे यदा कदा
वर्नेरियन सोसायटी की सभाओं में भी ले जाते थे। वहाँ प्राकृतिक
इतिहास पर विभिन्न आलेखों का वाचन किया जाता था। विचार विमर्श
होता और फिर उन्हें ट्रान्जक्शन्स में प्रकाशित किया जाता था।
मैंने सुना था कि ऑडोबान ने दक्षिण अमरीकी पक्षियों की आदतों
पर रोचक आख्यान दिया था। वाटरटन में बड़े ही अन्यायपूर्वक
तरीके से उसका तिरस्कार हुआ। इस सबके बीच मैं यह भी बताना
चाहूंगा कि एडिनबर्ग में एक नीग्रो रहता था जिसने वाटरटन के
साथ यात्रा की थी। मरे हुए पक्षियों में भुस भर कर वह अपना
जीवन यापन करता था। इस काम में उसे महारथ हासिल थी। कुछ पैसे
लेकर उसने मुझे भी यह काम सिखा दिया। अक्सर मैं उसके पास बैठता
था। वह बड़ा ही खुशमिज़ाज और बुद्धिमान व्यक्ति था।
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सूरज प्रकाश
मुंबई
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