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बाल-कहानी
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घर में उसका बर्थडे सेलीब्रेट करने की पूरी तैयारी हो चुकी थी
और मनु उधर अपने दोस्तों
और दादी
माँ
के साथ अपना जन्मदिन मना रहा था। वह सुबह घर से निकलकर स्कूल
जाने के बजाए सीधे दादी
माँ
के पास
पहुँच
गया। उनके पैर छुए और आशीर्वाद लेकर बोला,-''दादी,
मैने फैसला कर लिया है कि अब मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा।
तुम्हारी सेवा करूँगा।
मम्मी पापा के पास नहीं
जाऊँगा।''
''नहीं
बेटा,
ऐसा नहीं कहते। वे तेरे माता-पिता हैं।''
दादी माँ ने उसे समझाना चाहा।
''और
तुम''
-
मनु का जवाब सुनते ही दादीमाँ चुप हो गई।
''और
तुम उनकी माँ हो,
दादी माँ। जब वे तुम्हें इस उम्र में अकेला छोड़ सकते हैं तो
मैं क्यों नहीं। जब वे तुम्हारे बिना रह सकते हैं तो मैं क्यों
नहीं। कुछ भी हो दादी माँ,
मैं अब तुम्हें अकेला नहीं छोड़ सकता। क्योंकि तुम्हें सहारे की
ज्यादा ज़रूरत है,
उन्हें नहीं। और मैं तुम्हारा सहारा,
तुम्हारी लाठी बनूँगा।''
कहते हुए मनु की आँखों में आँसू उतर आए। दादी माँ भी द्रवित हो
गईं। उसके इस प्यार,
लगाव के आगे वह हार गई। उन्होंने उसे गले से लगा लिया। फिर मनु
काफी देर तक यूँ ही उनके आँचल में ममता की छाँव में पड़ा रहा।
और दादी माँ उसे ढ़ेरों आशीर्वाद देती रहीं। इसी बीच मनु के
दोस्त वहाँ पहुँच गए। सबने उसके जन्म दिन पर खूब हो-हल्ला किया,
नाच गाना किया। दादी माँ ने सबको गरम-गरम हलुवा बनाकर खिलाया।
शाम को सारे दोस्त चले गए तो दादीमाँ ने मनु को समझाया,-''बेटा,
जाओ अब घर जाओ वहाँ पर तुम्हारे मम्मी पापा इंतजार कर रहे
होंगे।''
''नहीं
दादी,
अब मैं उस घर में नहीं जाऊँगा। चाहे कुछ भी हो,
मैं तुम्हारे साथ ही रहूँगा।''-
मनु ने दादी माँ के पैर दबाते हुए कहा तो वह चुप हो गई।
उधर,
मनु के घर में बर्थडे सेलीब्रेट करने की सभी तैयारियाँ
पूरी हो चुकी थीं। रंग-बिरंगी झालरो से पूरा घर रोशन हो रहा
था। डीजे की
तेज़
धुनों पर लोग झूम रहे थे। सारे नाते-रिश्तेदार
पहुँच
चुके थे। केक की टेबिल भी सज चुकी थी। कमी थी तो
सिर्फ़
मनु की। वह किसी को दिखाई नहीं दे रहा था। मम्मी-पापा का चेहरा
उतरा हुआ था।
'मनु
कहाँ
है?'
लोगों के इस सवाल ने उन्हें परेशान कर दिया था। कुछ समझ में
नहीं आ रहा था करें तो क्या करें। दोनों दादीमाँ
को बुरा भला कह रहे थे,-''अम्मा
ने तो आज मेरी नाक कटवा कर रख दी। उन्होंने ही मनु को जान
बूझकर अपने पास रोका होगा।''
''हाँ,
ठीक कह रहो हो तुम,
वो तो चाहती ही यह हैं कि हम कभी चैन से न रहें। हमारी खुशियाँ
उनसे देखी न हीं जातीं।''
मम्मी ने नाक भौ सिकौड़ते हुए उन्होंने कहा,
''जो
होना था हो गया। पड़ा रहने दो मनु को वहीं पर। जब पेट की भूख
सताएगी और अम्मा उसे कुछ बनाकर नहीं खिला पाएँगी तो अपने आप
भागा हुआ आएगा यहाँ।''
रात गहरा चुकी थी। सारे लोग जा चुके थे। कैक वेसा का वैसा ही
रखा था।
मम्मी-पापा दोनों को नींद नहीं आ रही थी। दोनों इधर से उधर
करवटें बदल रहे थे। मनु की यादों ने उन्हें बैचेन कर रखा था।
खासकर मम्मी का तो कुछ ज्यादा ही बुरा हाल था। पापा की तरफ पीठ
करके वह
आँसू
बहा रहीं थी। मनु के दूर जाने मात्र की कल्पना से वह सिहर उठी
थी। बचपन से लेकर अब तक की मनु की शैतानियाँ-
उसकी बातें उनकी स्मृति में उछल कूद करने लगी। अचानक पापा उठ
बैठे तो मम्मी उनसे अपने आसुंओं को छुपा न सकी।
''अरे,
तुम रो रही हो?''
''हाँ,
मनु की याद आ रही है। उसके बिना घर कितना सूना लग रहा है।''
मम्मी ने आसुँओं को पोछते हुए कहा।
''उसके
बिना नींद तो मुझे भी नहीं आ रही।''
कहकर पापा चुप हो गये। दोनों एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे। फिर
पापा बोले,
''
ऐसा करते हैं कल सुबह उसे अम्मा के पास से बुला लाते हैं। वह
आएगा कैसे नहीं,
हमारा बेटा है।''
कहते हुए पापा की आँखों की कोरों पर अश्रुबिंदु उतर आए। फिर
दोनों की रात यूँ ही सुबह होने के इंतजार में गुज़र गई।
सुबह हुई। मनु दादीमाँ
के पास बैठा बतिया रहा था। अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई। दादीमाँ
ने
दरवाज़ा
खोल दिया। सामने उनका पुत्र सलिल और बहू कामिनी खड़े थे,
मनु के मम्मी-पापा। दादीमाँ
ने दोनों को एक नजर निहारा। वे भी उन्हें अपलक देखते रहे। इससे
पहले कि वे कुछ कहते दादीमाँ
ही बोल पड़ी,-''आ
जाओ बेटा,
अंदर आ जाओ। मैं तो कल से ही मनु से कह रहीं थी कि बेटा घर लौट
जाओ लेकिन उसने मेरी बात सुनी ही नहीं।''
कहते हुए दादीमाँ
ने मनु को
आवाज़
लगा दी,-''देखो
मनु,
कौन आया है?''
और अगले ही पल मनु दौड़कर वहाँ
पहुच गया। सामने मम्मी-पापा को देख उसके पाँव
ठिठक गए। मम्मी ने सीने से लगाने के लिए दोनों बाहें उसकी तरफ
फैला दी लेकिन मनु दादी
माँ
के पीछे दुबक सा गया। तब पापा आगे बढ़े,-''चलो
मनु,
घर चलो। यहाँ
कब तक रहोगे।''
कहते हुए वह उसका हाथ पकड़कर खींचने लगे।
''जब
तक दादी माँ हैं,
मैं यहाँ से कहीं नहीं जाऊँगा।''
कहते हुए मनु ने पापा का हाथ झिड़क दिया। तब मम्मी आगे बढ़ी,-''क्या
तुझे इस बात का जरा भी ख्याल नहीं कि तेरे बिना हम लोगों का
क्या होगा। तेरी याद में हम दोनों रातभर सो नहीं सके। मनु मान
जाओ अब और घर चलो। मेरी बांहें तुझे सीने से लगाने का तरस रही
हैं।''
मम्मी ने पुचकारते हुए कहा। उनकी आँखें फिर भीग चुकी थीं।
''मम्मी,
एक ही रात में तुम्हें बेटे से दूर होने के गम का एहसास हो
गया। जरा सोचो,
जब तुम पापा को उनकी माँ से दूर लेकर गईं थी तब तुमने नहीं
सोचा कि मेरी दादी के दिल पर क्या गुज़रेगी। तुम्हें संभालने
के लिए तो पापा भी थे और मेरी दादीमाँ को संभालने के लिए कोई
भी नहीं। जब तुम्हारा एक ही रात में यह हाल है तो सोचो दादी
माँ ने पापा को याद करके कितने आँसू बहाए होंगे। कितना दिल
रोया होगा।''
मनु का यह जवाब सुनकर मम्मी पापा एकदम जड़ से हो गए। मनु को
मनाने के लिए अब उनके पास शायद कोई और शब्द शेष न बचे थे। मनु
कहने लगा,-''पापा,
अगर मैं अगर कुछ गलत कह या कर रहा हूँ तो मुझे माफ कर देना।
लेकिन अब मैने फैसला किया है कि अगर आप मुझे अपने साथ रखना
चाहते हो तो आपको अब यहीं आना होगा,
दादीमाँ के घर में दादी माँ के पास। मै उस घर में दादीमाँ से
दूर नहीं जाऊँगा। अगर आप अपनी माँ को अकेला छोड़ सकते हो तो मैं
भी आप दोनों को छोड़ने को तैयार हूँ।''
मनु की इस बात में दृढ़ निश्चय साफ झलक रहा था। पापा कुछ पल तो
उसकी बात सुनकर बिल्कुल शांत ही खड़े रहे गए। समझ में नहीं आया
कि क्या कहें और क्या करें। यही हाल मम्मी का भी था। फिर अचानक
उनकी आँखों की कोरों पर आँसू उतर आए। दिल में दादीमाँ और मनु
के प्रति दबा हुआ प्रेम हिचकोले लेने लगा था। उनकी आत्मा अपनी
माँ को अकेला छोड़ने के निर्णय पर ख़ुद को धिक्कार रही थी और
मनु ने जो बिखरे हुए परिवार को जोड़ने का निर्णय सुनाया था उससे
मनु पर उन्हें नाज हो रहा था। अचानक पापा दादीमाँ के पैरों में
बैठकर फफककर रो पड़े। अंदर भरा सारा दर्द बाहर आ गया।
''माँ,
मुझे अफसोस है कि मैं अपने स्वार्थ के चलते अपने कर्तव्य के
रास्ते से भटक गया था। भूल गया था कि जो आज मैं तुम्हारे साथ
कर रहा हूँ कल को मेरे और तुम्हारी बहू के साथ भी हो सकता है।
मुझे गर्व है मेरे बेटे पर कि उसने मेरी आँखें खोल दीं। अब मैं
तुम्हारे साथ ही रहूँगा,
तुम्हारी सेवा करूँगा।''-कहते
हुए पापा दादीमाँ के सीने से लगकर आँसू बहाने लगे। मम्मी भी
अपने किए पर शर्मिंदा हो रही थीं। उन्होंने भी दादीमाँ के पैर
छूकर माफी माँग ली। दादीमाँ ने दोनों को माफ कर दिया। मनु बहुत
खुश हो गया। फिर चारों लोग दादीमाँ के उसी पुराने में मकान में
मिलजुलकर रहने लगे।
1-2
सौरभ शर्मा
'निर्भय'
296,
प्रभात नगर
मेरठ, उत्तरप्रदेश
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