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बाल-कहानी
लौट आओ मनु
सौरभ शर्मा
'निर्भय'
दोपहर
का दो बजने को आया था। यह भरोसा होने पर भी मनु
कहाँ
गया होगा?-
मम्मी के माथे पर चिंता की लकीरें उभरने लगी थी। स्कूल की
छुटटी होने का समय तो साढ़े बारह बजे है। किचिन में सब्जी काटती
मम्मी बडबड़ा रही थी,-''गया
कहाँ
होगा,
अपनी दादी
माँ
के पास
पहुँच
गया होगा। हम तो कुछ हैं ही नहीं उसके। सब कुछ वह उसकी दादीमाँ
है। घर छोड़ देने के बाद भी उनसे पीछा नहीं छूटा। पता नहीं
भगवान उन्हें इस दुनिया---''
''हाँ-हाँ,
तुम तो चाहती ही हो कि दादी माँ मर जाए।''
मम्मी की बात पूरी होने से पहले ही अचानक पीछे से आवाज़ सुनाई
दी। मम्मी ने पलटकर देखा तो किचिन के दरवाजे पर मनु खड़ा था।
उसे देखकर मम्मी मुस्करा दी,-''आ
गया बेटा तू,
देर कैसे हो गई। मैं कब से तेरा इंतजार कर रही थी--- अपनी दादी
माँ के पास तो नहीं गया था।''
उन्होंने थोड़ा रूककर पूछा।
''नहीं
दादी माँ के पास नही गया था। साइकिल में पंचर हो गया था उसी को
जुड़वाने में इतनी देर हो गई।''
मनु ने देर होने का करण बताया तो मम्मी जोर से भड़क उठीं,-''अच्छा
तो तू अब अपनी दादी के पास जा-जाकर झूठ भी बोलना सीख गया।
सच-सच क्यों नहीं बताता कि तू उनके पास से ही आ रहा है।''
मम्मी की बात सुनकर मनु के मन में आया कि कह दे जब तुम उसे
उनसे मिलने नहीं भेजोगी तो वह चोरी से ही उनसे मिलने जाएगा और
झूठ बोलेगा। लेकिन सच आज वह दादी माँ से मिलने नहीं गया था।
जाना चाहता था लेकिन उसकी साइकिल में पंक्चर हो गया। पर मम्मी
इस बात को मानने को तैयार नहीं थीं। बड़बड़ाए जा रहीं थीं,-''आने
दे तेरे पापा को,
शाम को सब बता दूँगी उन्हें कि तू किस कदर झूठ बोलने लगा है।''
''हाँ-हाँ,
बता देना। लेकिन सच यही है कि मैं आज दादी से मिलने नहीं गया
था।''
मनु भी थोड़ा तैश में आ गया। और फिर वह अपने कमरे में चला गया।
कुछ देर बाद मम्मी उसके कमरे में खाना रख आईं लेकिन उसने उसे
छुआ तक नहीं। वह आज तक समझ नही पाया था कि मम्मी उसे दादीमाँ
से मिलने क्यों नहीं देना चाहती। क्यों उनके पास जाने से रोकती
है। जबकि उसकी दादी माँ तो कितनी अच्छी हैं। कितना ख्याल रखती
हैं उसका। बेचारी अकेली बीमार रहती हैं। मैं क्या बुरा करता
हूँ जो थोड़ी देर के लिए उनके पास चला जाता हूँ। उनके कुछ काम
कर आता हूँ। उनकी खैर-खबर ले लेता हूँ। उन्हें दवा बगैरह
खरीदकर दे आता हूँ।
पूरा
दिन गुजर गया लेकिन मनु कमरे से बाहर नहीं निकला। वहीं
मुँह
फुलाए पड़ा रहा। शाम को पापा
ऑफ़िस
से घर
पहुँचे
तो मम्मी ने उनके कान भरने शुरू कर दिए,-''तुम्हारा
ये मनु तो अब मेरे काबू में नहीं रहा। तुम्हारी अम्मा जी के
पास जा-जाकर झूठ बोलने लगा है। इसे अभी से काबू में नहीं किया
तो बिगड़ जाएगा। आज मैने
ऑफ़िस
से छुटटी ले ली तो इसकी चोरी पकड़ी गई।''
इसके बाद मम्मी ने पापा को नमक मिर्च लगाकर पूरी बात कह सुनाई।
उनकी बात खत्म होते ही क्रोध से तमतमाए पापा दहाड़ते हुए मनु के
कमरे में जा
पहुँचे,-''तुझसे
हज़ार
बार मना किया है कि तू अम्मा के पास नहीं जाएगा। फिरभी तू गया
और आज झूठ भी बोला।''
''मैं
न तो आज उनसे मिलने गया और न ही झूठ बोला। हाँ,
मुझे एक बात यह ज़रूर बता दी जाए कि मुझे दादीमाँ से मिलने से
रोका क्यों जा रहा है। एक तो आप लोग उन्हें अकेला छोड़कर चले आए
और अब मुझे भी उनके पास जाने से रोकते हैं।''
मनु ने बड़ी ही मासूमियत से पूछा।
''हम
जो कह रहे हैं बस उसे ही सुनो।''-पापा
फिर गरजे,-''तू
उनसे मिलने नहीं जाएगा तो बस नहीं जाएगा। यह मेरा आदेश है।''
''मैं
जाऊँगा तो बस जाऊँगा। मैं उन्हें अकेला नहीं छोड़ सकता। यह मेरा
फैसला है।''
पापा को उम्मीद नहीं थी कि मनु इस तरह से भी उनके सामने बोल
सकता है। गुस्से के मारे उनका पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया।
और
'तड़ाक'-अगले
ही पल पापा का एक जोरदार चाँटा मनु के गाल पर जा पड़ा। मनु रोने
लगा और पापा पैर पटकते हुए कमरे से बाहर निकल गए। उसके बाद
पापा मम्मी के पास जाकर बैठ गए। दोनों बातचीत में बहुत देर तक
दादी को बुरा-भला कहते रहे।
उधर,
कमरे में मनु रोता रहा। उसकी समझ में नही आ रहा था कि क्या
करे। पापा-मम्मी की बात माने या दादीमाँ
के पास जाए। वह दादी
माँ,
जो उसके मम्मी-पापा को कभी भी बुरा नहीं कहती। हमेशा उसे यही
सिखाती है -अच्छे बच्चे हमेशा अपने मम्मी-पापा की बात मानते
हैं। वह दादी
माँ,
जो उम्र के इस पड़ाव में भी अपने काम
ख़ुद
करती है,
खाना
ख़ुद
बनाती है। कितनी बदनसीब है वह कि उसके इकलौते पुत्र ने ही उसे
ख़ुद
से अलग कर दिया। मनु को पिछले दिन याद आने लगे। उसने जब होश
संभाला तो अपनी दादीमाँ
को ही अपने सबसे
क़रीब
पाया। मम्मी-पापा
ऑफ़िस
चले जाते तो दादीमाँ
ही उसे दिन भर आंचल में दुबकाकर रखती। उसे नहलाती,
खिलाती,
धुलाती। सब कुछ वहीं तो करती थी। और मम्मी दादी
माँ
के इतना कुछ करने के बाद भी शाम को
ऑफ़िस
से घर लौटते ही बड़बड़ाना शुरू कर देती। वह दादीमाँ
को बुरा-भला कहती। वह उनके साथ रहना नहीं चाहती थी। वजह,
मम्मी हर वो काम करती थी जो दादीमाँ
को पसंद नहीं था। दादीमाँ
अगर उसके लिए टोकती तो घर में क्लेश होता था। पहले तो पापा
दादीमाँ
की तरफ से बोलते थे। लेकिन फिर बाद में पता नहीं मम्मी ने
उन्हें कौन सा पाठ पढ़ाया कि धीरे-धीरे वह भी दादीमाँ
को अनाप-शनाप कहने लगे। दिन यूँ
ही क्लेश में बीतने लगे। और इस सबके बीच एक दिन पापा ने फैसला
सुना दिया,-''वह
यह घर छोड़कर जा रहे हैं। रोज-रोज का क्लेश उन्हें बर्दाश्त
नहीं। अब वे किराए के मकान में रहेंगे लेकिन सुकून के साथ।''
इसे सुनते ही दादीमाँ
एकदम शांत हो गई। बाद में उन्होंने मम्मी से कुछ भी कहना,
टोकना,
रोकना सब बंद कर दिया। शायद वह
ख़ुद
भी नहीं चाहती थीं कि घर में क्लेश हो और उनका बेटा उनसे दूर
जाए।
लेकिन एक दिन पापा अपना सारा सामान एक
ट्रक
में लादकर उस घर से हम लोगों को साथ लेकर निकल गए। वह घर छोड़ते
वक्त दादीमाँ
से मिले भी नहीं और उधर दादीमाँ
फूट फूटकर रोती रही। दादीमाँ
मम्मी के सामने उसी घर में रूक जाने के लिए गिड़गिड़ाई भी। लेकिन
मम्मी
कहाँ
रूकने वाली थी। जाते-जाते बोली,-''अब
आपकी समझ में आ जाएगा कि आपको हमारे साथ कितने सुख थे। अब जब
सारे काम अकेले करोगी न तो हम ही याद आएंगे। अब कुछ नहीं हो
सकता। हम जा रहे हैं और अब आप अकेले रहना।''
कहती हुई मम्मी भी मनु का हाथ पकड़कर घर से बाहर निकल गई। मनु
मुड़-मुड़कर अपनी रोती-बिलखती दादीमाँ
को देखता- देखता उनकी
आँखों
से ओझल हो गया। बस उसी समय से मनु परेशान था। पहले वह छोटा था
तो दादी
माँ
के पास जा नहीं पाता था। लेकिन जबसे उसका बड़े स्कूल में दाखिला
हुआ है उसने चोरी-छुपे दादी
माँ
की खैर खबर लेनी शुरू कर दी। और एक दिन यह सब उसके मम्मी पापा
को पता चल गया। बस तभी से उसकी जान को क्लेश होने लगा।
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''मनु,
ओ मनु,
चल अब गुस्सा थूक और चलकर खाना खा।''-पापा
ने पीछे से आकर कहा। बोलने के अंदाज से लग रहा था कि अब उनका
गुस्सा शांत हो चुका है। उन्होंने उसके सिर पर हाथ फहराते हुए
कहा,-''बेटा,
अच्छे बच्चे गुस्सा नहीं करते। चला उठो और खाना खाओ।''
''तो
क्या अच्छे बच्चे वे होते हैं जो झूठ बोलते हैं,
जो अपने दादी-बाबा की सेवा नहीं करते,
जो अपने मम्मी-पापा की गलत बात को भी सही मानते हैं।''-कहता
हुआ मनु फूटकर रो पड़ा,-''पापा,
आपने बचपन में मुझे वो संस्कार क्यों दिए जो आज मुझे रूला रहे
हैं। मैं दादी माँ को कैसे छोड़ दूँ। बस,
मुझे इसका तरीका बतला दो।''
''बेटा
वह दमे की मरीज हैं। तू उनके पास जाएगा तो तुझे भी यह रोग लग
सकता है।''
पापा ने उसे समझाते हुए कहा।
''तो
पापा,
इसका यह मतलब तो नहीं कि हम उन्हें बिल्कुल अकेला छोड़ दें।
उनका इलाज भी तो करा सकते हैं।''
मनु ने आसुँओं को पोछते हुए कहा,-''क्या
आपने कभी सोचा है कि वह कैसे अपने सारे काम करती होंगी। कैसे
खाना बनाती होंगी। कैसे कपड़े धोती होंगी। बेचारी को लठिया के
बिना चल भी नहीं मिलता।''
''तू
फिर बकवास करने लगा। मैं तुझे यहाँ खाना खाने चलने के लिए
बुलाने आया हूँ तेरी बकवास सुनने नहीं। भूख लगे तो खाना खाने आ
जाना। वरना पड़ा रहे यहीं पर।''
पापा फिर तैश में आ गए और बड़बड़ाते हुए वहाँ से चले गए। लेकिन
मनु खाना खाने नहीं गया तो नहीं गया। वहीं कमरे में पड़ा रात भर
दादी माँ के बारे में सोचता रहा।
दो दिन बाद उसका जन्म दिन आने वाला था। पापा ने इस बार घर पर
ही पार्टी का इंतजाम किया था। तमाम रिश्तेदारों-परिचितों को
बुला रखा था। अगले दो दिन मनु स्कूल गया और समय से लौट भी आया।
मम्मी -पापा दोनों खुश,
चलो अब उसने दादी
माँ
के पास जाना छोड़ दिया। लेकिन अपने जन्मदिन की सुबह वह जो गया
तो फिर वह नहीं लौटा।
(क्रमश...)
1-2
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