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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-24, मई, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

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।। अपनी बात ।।

 

 

 

 ।। पाठकीयता का भविष्य ।।

    ल तक यह संकट नहीं था, पर आज है । अब जब भी पठन-पाठन के परिदृश्य को प्रश्नांकित करते हैं तो निहायत एक नये तरह के प्रश्न से जूझने लगते हैं । ऐसे वक्त हमें सूचना तंत्र और कारक रूप में अंतरजाल या इंटरनेट घेर-घेर लेता है। एकबारगी लगता है जैसे पुस्तक-संस्कृति और सूचना तंत्र अपनी समस्त ऊर्जाओं के साथ एक दूसरे के खिलाफ़ बैरी-भाव से घूर रहे हैं । मन का अर्जुन स्वयं को किसी उहापोह वाली युद्धभूमि में स्वयं को पाता है । कभी मन को आश्वस्ति मिलने लगती है कि अंतरजाल पाठकीय संभावना को विस्तार देता है तो कभी वही मन व्यथित हो उठता है कि वह पुस्तकों के मूल संस्कार को जैसे ख़ारिज करने पर तुला हुआ है । जो भी हो, इन सच्चाईयों के बावजूद, कि दोनों रचनात्मक मनुष्य की उपलब्धियाँ हैं, कि दोनों ही श्रम और विकास-विश्वासी मनुष्य के लिए सौगातें हैं, क्यों ये दोनों सम्यक रूप में विरोधी धरातल पर खड़े दिखाई देती हैं ?

 

अंतरजाल या उसमें प्रवाहित सूचना तंत्र के प्रभावों से उपजे भय और कातरता पारंपरिक मन की उपज हैं जिसके मूल में है - परीक्षित, बहुस्वीकृत और दीर्घकाल से बड़ी सुदृढता से उपस्थित व्यवस्था से कटने और उखड़ने की चिंता । जैसे सब कुछ छूटा जा रहा है । जैसे सब कुछ हमसे छीन लिया जाने वाला है । इस चिंता को प्रोत्साहित करता है हमारा वह कुंठित सामर्थ्य जिसमें हम परिवर्तन को अपनी लाख सदिच्छाओं के बाद भी अधिनियमित और अधिनियंत्रित नहीं कर पाते । इधर नये सदी में हुए परिवर्तन की भयावहता तो जैसे ताल ठोंक कर कह रही है कि लो,  अब तक तो मनुष्य और प्रकृति के मध्य अनैतिक संबंध थे अब तो मनुष्य और यंत्र के मध्य अवैध संबंध स्थापित हो रहे हैं । दरअसल यह अवैध संबंध ज्ञान और सूचना के मध्य है जिसमें मनुष्य परिणाम और परिमाण की अर्थों को पहचान नहीं पा रहा है । इस विरासतीय पाठ को भली-भाँति जानते-समझते हुए भी कि अधिकता और अर्थवत्ता दोनों में अर्थवत्ता का चयन ही मनुष्योचित है । यानी कि इस या ऐसे पाठों वाले पुस्तकों को ही नेतस्तनाबुत करने पर आमादा चीज़ों की विध्वंसात्मकता का सम्यक परीक्षण और निष्कर्ष से अभी मनुष्य कोसों दूर हैं ।

 

यद्यपि हम पुस्तकों को स्मृति, मौखिकता, वाचिकता और विस्तृत स्वरूप में गुफालिपि, ताम्रपत्र, और आगे छापा-खाना तक की सतत् आविष्कार-यात्रा की परिणति या ईजाद के रूप मे भी देखते हैं तथापि उनके साथ हमारा जो संबंध है उसमें पवित्रता और परस्पर हितैषी वाली प्रचुर गंध की अनुभूति होती है । इसके ठीक विपरीत संगणक(Computer) छापा-खाना की उन्नत श्रेणी की उपादेयता की सुविधा के बाद भी वह विश्वास नहीं दिला पाता जैसा कि छापा-खाना और पुस्तकों ने दिया है। जबकि दोनों – छापा-खाना और संगणक मशीन ही हैं । दोनों हमें पुस्तकों की भेंट देती हैं और जबकि संगणक तो पुस्तकों को नये और अधिक आकर्षक कलेवर में प्रस्तुत करने की सक्षमता से लैश है, वह पुस्तकों की मात्रात्मक वैश्विक व्याप्ति में भी अब तक की सबसे कारगर माध्यम है ।

 

पुस्तकें कागज़ में छपे हुए शब्दों का संयोजन मात्र नहीं । पुस्तकों के बगैर मनुष्य या तो खोह-कंदराओं का निवासी आदिजन है या फिर असभ्य । तो पुस्तक सभ्य समय की पहचान बनी । और यही कारण है कि मनुष्य पुस्तक को अपने परम सखा के रूप में मान चुका था । उसके लिए पुस्तकें अतीत, आगत और अनंत की गवाहियाँ थीं । पुस्तकें विपदाओं का हल बन चुकी थीं । वे अप्रत्याशित और दुसह बेला में संघर्ष की नकल सिखाती थीं । तथाकथित अंधश्रद्धा के नाम व ईश्वर की मृत्यु जैसे प्रपंचकारी घोषणाओं के बाद भी हर समाज में वे पूजनीय स्थलों पर विराजित होने की योग्यता अर्जित कर चुकी थीं । वह सिरहाने की औषधि बन चुकी थी जिससे अनिद्रा गायब हो जाती है । पुस्तक ऐसा उदय स्थल थी जहाँ से हर अँधेरे में नया सूरज उग सकता था।  वह हृदय में सभी रसों की प्रेरणा बन चुकी थी । वह प्रेम की लकीरें खेंचती थी । किताब नये अवसरों की इबारत गढ़ती थी । वह अप्रत्यक्षतः मनुष्य होने की शर्तों का कविता सुनाती थीं । वे अनुभव की कहानियाँ निःशुल्क बाँटती थीं । वह कठोर मन में भी अनुभूति की नर्मदा प्रवाहित कर उद्वेलित कर जाती थीं । वह नवरसों की भावभूमि गढ़ती थीं ।

 

अच्छी किताबें सिर्फ़ इसलिए वरेण्य नहीं उनमें स्थापित मूल्यों, ज्ञात सत्यों अज्ञात के प्रति जिज्ञासा या फिर रेडीमेड नारों का लेखा-जोखा होती हैं । वह पाठक के लिए कान जैसा है जो सामान्य ज्ञान सहित सभी प्रकार की शास्त्रीयता की समझ के परे चीज़ों को सुन सकता है । वह पाठक के लिए आँख जैसी भी है जो किसी रटे-रटाये सिद्धांतों की छाया-प्रतिच्छाया से कहीं दूर हटकर भी देख सकता है । पुस्तकें उन्हें टेरती हैं जो गूँगे हैं । उनका नामकरण संस्कार करती हैं जो अनाम हैं। पुस्तकें भाषा, भाव, दृष्टि और कल्पना के लिए सेतु बनती हैं । तारतम्यित मूल्यों का ऐसा संकुल उपहार में देती हैं जो मनुष्य को नैतिक बनाने के साथ-साथ सौंदर्य का उपासक भी बनाती हैं । स्पष्ट ही है कि पुस्तकें पंरपरागत मूल्यों की पुष्टीकरण का प्रचारक मात्र नहीं, बल्कि सही मायनों में दुनिया की तीखी आलोचना भी हैं और दुनिया के प्रति मनुष्य की दृष्टि की आलोचना भी है ।

 

ठीक ऐसे समय में स्वयं इलेक्ट्रानिक माध्यम और उसके चरम कोटि में संगणक(इंटरनेट भी) अपनी चकाचौंध से लबरेज उपस्थिति दर्ज़ कराता है जब मनुष्य के लिए पुस्तकें सम्यक संस्कृति गढ़ रही थीं या उसे गति दे रही थीं। पुस्तकें अपने भौतिक स्वरूप में आवश्यक चीज़ मात्र नहीं थीं, उन्हें सभ्य और सुसंस्कृत मनुष्य होने की अपरिहार्यता के साथ देखा जाने लगा था । सच तो यह भी है कि पाठकों की अत्यल्पता के बीच इधर उभर रही चुनौतियों, नयी दुख-दैन्यताओं से जूझने की तैयारियाँ भी उसी के सहारे हो रही थीं कि ऐसे समय में उसके आने और सारी दुनिया में छा जाने से वह सब कुछ गड्डमड्ड हो चुका है, जिसके हम आदी थे और जिसमें हमारे उचित प्रस्थान का सर्वाधिक विन्यस्त था । जाहिर है यह सब हमारी पुस्तकों में ज्यादा विन्यस्त था । ऐसी स्थितियों की परख अपनी सर्वोचित निष्कर्षों से क्या यह नहीं कहतीं कि मनुष्य या पाठकों का पुस्तकों से आत्मीय रिश्ता था, पूजनीय रिश्ता था, बहुत पुराना रिश्ता था, और एक तरह से इस संबंध को यदि शाश्वत माना जाता रहा ? निष्कर्षतः कहें तो पुस्तक हमारे बोध, सत्य-असत्य और ज्ञान की अकेली वाहिका हैं । वह हमारे स्वत्व की उज्ज्वल निशानी है ।

 

कंप्यूटर या अंतरजाल मात्र माध्यम हैं । तकनीक हैं, साधन हैं । साध्य तो कतई नहीं । अतिभौतिकता के आग्रह की वजह से वैसे हम हर भौतिक जींसों को एक पुलक के साथ देखते रहे हैं जिसका ख़ामियाजा भी व्यक्ति और प्रकारातंर से समाज भुगतता रहा है । द्रव्यवादी मानसकिता द्रव्य के मानवोचित उपयोग को तरजीह नहीं दिया करती, वहाँ प्रदर्शन या मिथ्याअहं केंद्र में होता है और जहाँ ये होते हैं वहाँ मानवता के विकसन की गति ज़रा धीमी होती है । तो इसी आत्ममुग्धता के कारण कंप्यूटर देखते ही देखते सभ्यता की पहली निशानी माना जाने लगा । कंप्यूटर द्वारा संचालित सूचना तंत्र और तकनीक ने मनुष्य के चारों ओर अमूर्त चकाचौंध का ऐसा वातावरण निर्मित कर दिया है जिससे सारी की सारी चीज़ें अब्सट्रेक्ट होने लगी हैं । मनुष्य अमूर्तता के दलदल मे धँसता जा रहा है । चाहें तो आप बहस के लिए तर्क गढ़ सकते हैं कि उसने हमें अधिक त्वरासंपन्न बना दिया है किन्तु यही तो वह विपदा है, संकट है जिससे मनुष्य को सिर्फ़ एक दर्शक होने का अहसास कराया जा रहा है ।

 

क्या ऐसा कहना गलत होगा कि कंप्यूटर जिस संस्कृति (?) को मनुष्य के विकास के नाम पर दिन-प्रतिदिन नये-नये उपमानों के साथ रच रहा है उसमें मनुष्य को उसके बुनियादी रूप से मनुष्य होने से च्युत किया नही किया जा रहा है । आप कह सकते हैं कैसे ? तो वह ऐसे कि कंप्यूटर ने वैश्विकता की आड़ में स्थानीय बोध और उसके प्रति नैतिक उत्तरदायित्व के सवालों और हलों को लेकर सोचने की शक्ति और संघर्ष को भोथरा किया है । इस स्थानीय बोध के नकार में भाषा, अस्मिता, निजी मान्यता, विश्वास और शुचिता भी सम्मिलित है जिसके हताहत होने की चेष्टाओं को नकारा नहीं जा सकता है। मनुष्य के भीतर मनुष्यता की अनुभूति का दायरा छोटा हुआ है । शायद भस्मासुरी प्रवृत्ति इसी का नाम है । उसने चुपके से मनुष्य के समक्ष एक गंभीर चुनौती दे दी है – कि यदि तुम मेरे सह-वासी नहीं तो पिछड़ी दुनिया की निरक्षर आबादी होने के कलंक से मुक्त नहीं हो सकते । इस अमूर्त दबाब से सारे विश्व के सिर पर नये शिक्षण का भूत सवार हो चुका है । जाहिर है यह जो नया शिक्षण है वह पहले एक नये माध्यम का सीखना है न कि किसी ज्ञान को । क्योंकि कंप्यूटर अपने आप मे ज्ञान नहीं सूचना का साधन है । परिणामतः इस तथाकथित ज्ञान के आकर्षण ने समाज में वर्गविभेद और परिवार में पीढ़ी विभेद को भी नये सिरे से उभारा है । मनुष्य के इतिहास में शायद यह पहली बार हो रहा है कि सूचना, जानकारी और संदर्भ (और कुछ हद तक नयी मान्यताओं के अनुसार ज्ञान भी) से ओतप्रोत मनुष्य दूसरे को अज्ञान और अचेतन देखने का दंभ भर रहा है । इतना ही नहीं कंप्यूटर शिक्षण के बहाने अँगरेज़ी समूचे विश्व की भाषाओं को ध्वस्त करके रहस्यात्मक ढंग से पैर पसारने लगी है जो भारत जैसे बहुभाषीय देशों के लिए नये संकट का सबब भी बन सकता है जहाँ भाषाएँ स्वयं में राष्ट्रीयता के खिलाफ़ भी इस्तेमाल हो रही हैं । भविष्य में तंरगीय तकनीक से दक्ष पीढ़ी और पुस्तकीय ज्ञान से दीक्षित पीढ़ी के मध्य रिश्ता और भी गहराने लगे तो कोई आश्चर्य नहीं । विकास के लिए प्रोडक्टिविटी, टाइम, और लेबर के तर्क पर भले ही कंप्यूटर द्वारा विकसित संस्कृति को हम तवज्जो देने को तैयार बनाये जा रहे हैं किन्तु ऐसे वक्त हम भूल जाते हैं कि एक तरह से हम मनुष्य की उत्पादक क्षमता और संघर्ष की शक्ति को भी हतोत्साहित कर रहे हैं । अंतरजाल के संजाल ने भले ही वैमन्यस्यता के विरूद्ध संबंधों के नये द्वार खोंले हैं किन्तु वहाँ सब कुछ अमूर्त और अपुष्ट है जाहिर है कि वहाँ धोखाधड़ी की संपूर्ण संभावनायें भी हैं । (क्रमशः....)

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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