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छाती
डॉ. गंगाप्रसाद बरसैंया
मनुष्य
के शरीर में छाती का बड़ा महत्व है । छाती पौरूष का, प्रेम का
प्रतीक है। पुरुष की छाती को लेकर अनेक कहावतें-महवरे जन-जीवन
में प्रचलित हैं। छाती और सीना एक ही है। मुहावरों-कहावतों में
दोनों का प्रयोग है फिर भी छाती शब्द का प्रयोग अपेक्षाकृत
अधिक है। कभी-कभी ऐसा प्रतीत होता है कि जो भाव छाती कहने में
अनुभव होता है वह सीना में नहीं। जैसे- छाती फूलना अधिक सटीक
लगता है बजाय सीना फूलने के। किसी आत्मीय की बड़ी उपलब्धियों
से जो गौरव की अनुभूति होती है। उसे छाती फूलना कहते हैं ।
कारगिल युद्ध में भारत की विजय का समाचार सुनकर छाती फूल गई ।
मज़दूर दिन भर छाती मारकर कठोर श्रम करते हैं और अहंकारवश
अहंकारी छाती फुलाकर चलते हैं। पुलिस की भरती में छाती फुलाकर
नापी जाती है परन्तु दुख का अप्रत्याशित समाचार मिलने पर यही
छाती फट जाती है। असहनीय शोक से छाती का फटना स्वाभाविक है। यहाँ
फटने का आशय पीड़ा से ही है। वस्तुतः छाती फटती नहीं। ईर्ष्या
द्वेष के कारण भी छाती फटती, दरकती और जलती है तथा बदला लेने
पर शांत या ठंडी हो जाती है।
अनचाहे दायित्व को निर्वाह करना पड़े तो लोग उसे छाती का बोझ
कहते हैं। दूर के रिश्तेदार को कुछ दिन घर में जगह क्या दे दी
अब वही हमारी छाती का बोझ बन गया है। किसी की अवांछनीय करतूतों
के कारण जब परेशानी हो और मुक्ति का कोई उपाय न दिखे तो उसे
छाती का पीपर होना कहा जाता है। अपने पुराने मित्र को पड़ोस
में इसलिये बसाया कि सहयोगी बनेगा लेकिन अब वही हमारी छाती का
पीपर हो गया। प्रायः लोग पीपर का वृक्ष घर में नहीं लगाते।
अनायास आयी पीड़ा या विपत्ति को लोग छाती पर पत्थर रखकर सहते
हैं क्योंकि पीड़ा को सहने के सिवाय रास्ता ही क्या है। शोक
में जो छाती पीटी जाती है वही चुनौती देते समय ठोंकी जाती है।
मुहर्रम के समय मुसलमान भाई शोक में छाती पीटते हैं। पुत्र-शोक
में बहुतों को छाती पीटकर रोते देखा गया है, परन्तु रावण ने
छाती ठोंककर राम को युद्ध की चुनौती दी थी। अपनी बात पर ज़ोर
देने के लिए भी लोग छाती ठोंककर कहते हैं। दुश्मन के बार छाती
पर ही झेलना पड़ता है।सच्चा शत्रु ललकारकर छाती पर सामने से
प्रहार करता है लेकिन धोखेबाज लोग पीछे से पीठ पर वार करते
हैं। तभी तो किसी कवि ने लिखा है-
जितने घाव मिले छाती पर, वे सब घाव दुश्मनों के हैं।
जितने घाव पीठ पर पाये, वे सबके सब अपनों के हैं।
मौक़ा मिलते ही दुश्मन छाती कुचलने से नहीं चुकता। विश्वास के
लिये छाती फाड़कर दिखाने की बात भी कही जाती है। हनुमान ने अपनी
राम-भक्ति का प्रमाण छाती फाड़कर दिया था । कभी लोग सामने वाले
को ललकारते समय भी कहते हैं-किसकी छाती में बाल हैं जो हमारा
मुकाबला करे। वीरों और दमदार लोगों की छाती चौड़ी मानी जाती
है। भइया ! वह तो चौड़ी छाती का जवान है। अथवा जिसकी छाती चौड़ी
होगी वही यह कार्य कर सकता है। जिसमें शक्ति और साहस है वही
चौड़ी छाती वाला है। गोलियों के प्रहार से तो छाती छलनी होती
ही है, कटु बातों होती हैं कि वे आप-पार होकर छाती को चीर ही
देती हैं। छाती का छलनी होना या छाती चीरना इसी समय प्रयोग किया
जाता है। हर स्थिति में अविचलित रहने को बज्र की छाती कहते हैं
और मुकाबले के लिए डटने को छाती अड़ाना कहा जाता है। ज़रूरत
पड़ने पर मैं छाती अड़ा दूँगा
दुष्ट लोग अपनी कुचालों से सज्जनों की छाती पर मूँग दल कर उन्हें
परेशान करते रहते हैं लेकिन जब माँ बच्चे को अपनी छाती से
चिपकाती है या कोई आत्मीय हमें अपनी छाती से लगाता है तो असीम
सुख की अनुभूति है। यह वात्सल्य, स्नेह और आत्मीयता का द्योतक
है। बुखार या किसी गंभीर बीमारी में यही छाती धौंकनी सी चलने
लगती है।किसी प्रसंग में घबड़ाहट होने पर छाती धक-धक करने लगती।
कहने का आशय यही है कि जीवन के तमाम प्रसंगों में छाती को अनेक
भाव-रूपों के साथ उपस्थित होना पड़ता है।
डॉ. गंगाप्रसाद
बरसैया
के 30 आपीआईए
रोड
नं. 1,
कोटा (राज.) -
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