|
युएसए
का प्रवासी साहित्य
रेणु से
रेणु की मुलाक़ात
रेणुका
भटनागर
पलट
कर जब देखती हूँ तो इतिहास-सा ही लगता
है - यादों के झरोखे से मरकत मणि-सी
झांकती, देदिप्यमान वह घटना स्वतः एक हास्य मिश्रित मुस्कान
बिखेर जाती है अधरों पर। कुछ भी लिखने से पहले यह लिखना अति
आवश्यक है कि यह सब कुछ लालू जी (लालू प्रसाद यादव) के गाँव
(पटना, बिहार) में तकरीबन पैंतीस साल पहले घटित हुआ था। जो
'बिहारी सभ्यता' को जानते हैं वे यह भी अवश्य जानते होंगे कि
आज से पैंतीस साल पहले 'बिहार' में पुत्रियों/लड़कियों को कितना
पोहा-पोहा (सम्हाल-२) कर रक्खा जाता था। घर के बाहर की धूप/हवा
सबसे बचा कर! मुझे अब भी याद है पहली बार कॉलेज (हज़ारीबाग के
कोलम्बस कॉलेज, जो को-एजुकेशन था) जाते समय, मेरे बड़े भाई जो
सम्प्रति ऑस्ट्रेलिया में हैं; बाकायदा मेरे साथ गये थे कौलेज
पहुँचाने और वहाँ से लाने भी। यह सब विस्तार से जान कर ही
"घटित घटना" को ठीक से समझा जा सकता है । हाँ, तो वापिस इतिहास
के पन्नों को पलटें –
पटना विश्वविद्यालय से एम. ए. हिन्दी में करते समय एक बार
नहीं, न जाने कितनी बार 'मैला आँचल' के लेखक श्री 'फ़णिश्वर नाथ
रेणु' को पढ़ा था, इस उपन्यास पर अति प्रसिद्ध फ़िल्म तीसरी कसम
भी बनी थी और परीक्षा में भी पंक्तियों की सप्रसंग व्याख्या भी
करती रही थी। बार-बार 'रेणु जी' की जीवनी पढ़ते समय यह भी पढ़ा
था कि डाक बँगला रोड पर स्थित 'भारत कॉफ़ी हाउस' साहित्यकारों
की गोष्ठी के लिये प्रसिद्ध था। 'रेणु' जी के लिये भी साहित्य
चर्चा का यह सहज-सामान्य स्थल हुआ करता था। पढ़ाई पूरी की और
विवाह अगला क़दम तो होता ही है। इस तरह मैं दिल्ली पहुँच गयी।
मेरी शादी के दो साल बाद, मेरी छोटी बहिन की, जो आज गंगा देवी
कौलेज में हिन्दी कि विभागाध्यक्ष है, शादी हुई। जिसमें शरीक़
होने मैं पटना आई थी। यद्यपि बहनोई छोटे थे लेकिन छोटे हुए तो
क्या। बहनॊई तो बहनोई होते हैं। तुलसी के पत्ते में बड़ा क्या
और छोटा क्या! हर दिन उन्हे परेशान करने की, उनकी खिचाई करने
के नये-नये तरीके ढूँढे जाने लगे।
वीणा (मेरी छोटी बहन) द्विरागमन के बाद अपने पति, हमारे नये-२
बहनोई के साथ पीहर आई थी। शाम का समय था, सु्बोध जी (मेरे
बहनोई) ने बतालाया कि शाम को उनके मित्रों ने पति-पत्नी को
खाने पर बुलाया है। मैं और मेरी चचेरी छोटी बहन मन्जू ने छूटते
ही कहा-अरे क्या आप अकेले जायेंगे ? हमें नहीं बुलाया ? बेचारे
नये-नये दामाद कहें भी तो क्या कहें? जी..जी, नही-नही आप भी
चलिये। हम दोनों तो जैसे ताक मे ही बैठे थे, कैसे उन्हे फिर से
बेवकूफ़ बनाया जाए। बस फिर क्या था, आगे-आगे नवदम्पति का रिक्शा
चला और पीछे-पीछे हम दोनो का। वे बेचारे हतबुद्धि से रह-रहकर
पलट कर स्थिति का अंदाज़ा करते जा रहे थे कि कब पीछा करना बन्द
हो। मगर वे सालियाँ ही क्या जो मैदान छोड दें!
इधर हम दोनों बहनें ख़ुद अपनी जाल में आ फँसे थे। अब क्या किया
जाये जो साँप भी मर जाये और लाठी भी ना टूटे। इस समय हमारा
रिक्शा "भारत कॉफ़ी हाउस" के करीब पहुँच रहा था और उन दोनों का
डाकबँगला रोड से फ़्रेज़र रोड पर मुड चुका था। मैंने झटपट रिक्शे
से तकरीबन कूदते हुए मन्जू से कहा- जल्दी उतरो, इसके पहले कि
वे लोग हमें देख लें; और बिना आगा-पीछा सोचे-विचारे हम सामने
की इमारत में, जो इत्तेफ़ाक से भारत कॉफ़ी हाऊस" था, घुस गये।
शायद तब तक की जिंदगी में वह पहला मौका था कि हम दो लडकियाँ,
बिना किसी पु्रुष सदस्य के, होटल या कैफ़े में पहुँचे थे। मन्जू
तो निश्चिंत थी- दीदी साथ थीं, पर अपने तो छक्के छूट रहे थे।
सबसे पहले तो यह टटोला कि पर्स में चाय-कौफ़ी के लायक पैसे भी
हैं या नहीं, फिर दूसरा प्रश्न था ठसाठस भरे इस स्थल में बैठा
कहाँ जाये? खैर; एक मेज़ पर एक अधेड़ से सज्जन को देख कुछ हिम्मत
बढ़ी, सोचा-बुज़ुर्ग की मेज़ पर बैठना अपेक्षाकृत सुरक्षित रहेगा।
पूछ्कर हम बैठ तो गये मगर घबराहट से बुरा हाल था। उस ज़माने
में दो अकेली जवान लड़कियों को अगर अकेले बैठे देख लिया जाये तो
बातें बनते देर नहीं लगती।
अब औपचारिकतावश जो सज्जन बैठे थे, उनसे अभिवादन का आदान-प्रदान
हुआ। कुछेक बातों के बाद वे कहने लगे-आपकी हिन्दी तो बहुत
अच्छी है, क्या सहित्य-रचना के क्षेत्र में भी कुछ करती हैं?
उनका आशय था कहीं कुछ छ्पा भी है ? मैंने बौखलाहट में कहा- जी,
इस भाई-भतीजेवाद के युग में "सधन्यवाद वापिस" के अलावा कुछ भी
हाथ नहीं लगता!
उन्होंने आग्रह किया-अगर याद हो कुछ; तो सुनायें। आज सोचती हूँ
तो अविश्वसनीय-सा ही लगता है- न जाने कैसे मैने धडाधड तीन चार
कवितायें सुना दीं। मैं इसे नर्वसनेस की पराकाष्ठा में किया
गया विचित्र व्यवहार ही कहूँगी। बहरहाल सुनने के बाद उन्होंने
एक पता दिया और कहा- "अगर चाहें तो इस पते पर कुछ भेजिए शायद
कोई बात बन जाये। "मैंने पता ले तो लिया मगर व्यंग्यमिश्रित
मुस्कान चेहरे पर न आने देने के लिये प्रयास करना पडा। क्यों
नहीं, धर्मयुग के पब्लिशर तो आप ही हैं न!
अबतक हमलोग कुछ सहज हो चले थे- नाम पूछने पर जब मैंने अपना नाम
बताया तो बडे तपाक से बोले-"तब तो हम ’मीता’ हुए"। जो पहला
विचार मन में आया वह था - ’जान न पहचान खाला बीबी सलाम’; किसके
मीता काहे के मीता ? फिर पूछा- आपने "तीसरी कसम" फ़िल्म देखी है
? मुझे याद नहीं मैंने क्या जवाब दिया, शायद हाँ ही कहा था। वे
थोडी देर तक उस फ़िल्म के बारे में बताते रहे। उस फ़िल्म के गाने
बहुत मशहूर हुए थे, अब भी हैं "सजन रे झूठ मत बोलो"। आदि-आदि।
हम श्रोता बने रहे। हमने जब पैसे देने की कोशिश की तो यह कहकर
रोक दिया कि आप हमारी मेहमान हैं, आप भला पैसे कैसे देंगी?
उनका आशय था कि मैं दिल्ली से आने के कारण पटनावासियों के लिए
’मेहमान’तो हो ही गई न! हम दोनो को घर भागने की ऐसी जल्दी थी
कि फ़टाफट धन्यवाद-नमस्कार आदि की औपचारिकता पूरी की और छूटे!
रिक्शे पर बैठते-बैठते मन्जू ने कहा-" रेणु जी जितने प्रसिद्ध
हैं, उतने ही विनम्र भी हैं न! मैं चौंकी! कौन रेणु ?
आश्चर्यमिश्रित हैरानी से वह बोली-फणिश्वर नाथ ’रेणु’ और कौन!
उनसे इतनी बातें करके तो हम आ रहे हैं।
मैं कह नहीं सकती मुझे कैसा लगा! हर्ष ज़्यादा या विषाद! इतने
सुनहरे अवसर को करीब-करीब खो देने का सा एहसास ! कितनी मूर्खता
हुई! भारत कौफी हाउस...रेणु जी की वहाँ नियमित गोष्ठी..मैला
आँचल..तीसरी कसम..सब जैसे तीव्र गति से मेरे सामने से भाग रहे
थे और मैं हतबुद्धि-सी मुँह बाए उन्हें बस घूर रही थी बाद में
मैंने अपनी कवितायें उनके बताये पते पर भेजीं और भूल भी गई इस
घटना को। दिल्ली लौटकर अपने सामान्य जीवन में व्यस्त हो गई। एक
दिन इसी बीच "प्रस्थान" नामक पत्रिका डाक में आई, जिसमें ’पहली
बार’ मेरी तीन कविताएं छपीं थीं। "रिश्ते""भीष्म का अवसाद" और
"एक बार फिर" (सम्पादक-रामबचन राय)
आज अगर रेणु जी होते तो इस संसमरण को पढ़कर क्या कहते ? शायद
इस बार हास्य व्यंग्यमिश्रित मुस्कान के अधरों पर आने की बारी
शायद उनकी होती।
पटना के उसी ट्रिप में मैंने रेणु जी के पद्म्श्री एवं
सम्मानोपाधि लौटाने का समाचार (19th Oct74) केवल सुना ही नही
था, बल्कि उस सभा में भी मैं उपस्थित थी। उस अखबार की कटिंग आज
भी म्रेरे पास एक यादगार की तरह सुरक्षित है। आज तो बस यही
कहने को जी चाहता है-
"मिलते रहतें हैं, मुलाकात नहीं होती है।
बात करते हैं मगर बात नहीं होती है।"
रेणुका भटनागर
यू.एस.ए
◙◙◙
|