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युएसए
का प्रवासी साहित्य
संस्कृतिः
विकास या विनाश
?
राहुल उपाध्याय
नौकरी करते-करते
बच्चे
'डिलीवर'
करती है माँ
जैसे एक
'प्रोजेक्ट
डिलिवर'
होता है
वैसे ही बच्चे भी
'डिलिवर'
करती है माँ
उसकी भी एक
होती
है
इसकी भी एक ड्यू डेट
होती
है
सारा जिम्मा होता है अस्पताल पर
सारी रस्में रख दी जाती हैं ताक पर
जिस दिन घर आता है नवजात शिशु
न होता है जश्न,
न बजता है ढोल,
न चढ़ती है प्रसाद,
न बंटती है मिठाई
न होता है स्वागत,
न घर आता है कोई देने बधाई
न होती है पूजा,
न खुशी की लहर
बस चिंता रहती है चलेगा कैसे घर?
कहीं ज्यादा,
तो कहीं कम,
छुट्टी मिलती है नपी-नपाई
तुरंत लौट जाते हैं काम पर ताकि कटे एक भी न पाई
कभी घंटो में तो कभी हफ़्तों
में ज़िंदगी बिताते है हिस्सों में
8
घंटे बिस्तर,
8
घंटे दफ़्तर
बाकी भागदौड़ में इधर-उधर
ज़िंदगी हो गई जैसे कोई सोप सीरियल
सब कुछ है वर्चुअल,
नहीं कुछ भी रीअल
डिस्कवरी चैनल
के
जरिए जैसे होती है बच्चों की हाथी से भेंट
वैसे ही वेब-कैम
की
बदौलत होती है बच्चों की दादा-दादी
से भेंट
'बैटरी'
झूला झुलाती है
'सी-डी'
सुनाती हैं लोरियां
मां-बाप
भटकते हैं सड़को पर और
'टी-वी'
सुनाता है कहानियां
जब कभी बचपन याद आएगा
तो बच्चे को क्या याद आएगा?
वो
'डबल-ए'
की
'बैटरी',
जिसने झूला झुलाया उसे?
वो चमचमाती
'सी-डी',
जिसने लोरी सुना सुलाया उसे?
या वो
'टी-वी'
पर सुनी हुई
'एल्मो'
या
'बार्नी'
की नसीहतें?
या वो
'विडियो'
पर देखी हुई
'टाँम'
और
'जैरी'
की शरारतें?
जहां नौकरी करते करते माँ
'डिलिवर'
करती हैं बच्चे
वहां ईमान-धरम,
मान-मर्यादा
बचे भी तो कैसे बचे?
जहां दही जमाने के लिए भी नहीं
'कल्चर'
मयस्सर
उस ज़माने में किसी को संस्कृति की हो क्यो फ़िकर?
जिस समाज में हर एक ज़रुरत की
'सर्विस'
है
वह समाज समाज नहीं महज एक दरविश है
आज यहां है तो कल वहां
घर पर नहीं रहता कोई यहां
हज़ारों मील दूर रहते हैं अपने
एक दूसरे से मिलने के पालते हैं सपने
घर से भागे दौलत के पीछे भाषा त्यागी संगत के डर से
कपड़े बदले मौसम के डर से, आभूषण उतारे चोरी के डर से
ग्रंथ छोड़े कट्टरता के डर से, दीप बंद हुए आग के डर से
शंख-घंटिया
बंद हुई पड़ोसी के डर से, भोजन पकाना छोड़ा बदबू के डर से
रस्मे दफ़ा हुई सहूलियत के नाम पर
बचा ही क्या फिर संस्कृति के नाम पर?
जिन पर होना चाहिए हमें नाज़ आज
उन सब पर क्यूं हमें आती हैं लाज?
पहनते हैं कपड़े मगर किसी और के
खाते हैं खाना मगर किसी और का
बोलते हैं भाषा मगर किसी और की
करते हैं काम मगर किसी और का
आखिर क्या है अपना जो है इस दौर का?
क्या दे जाएगे हम बच्चों को धरोहर?
प्रदूषण की कालिख में नहाए ये महानगर?
या कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग की कुछ वो किताबें
जो चार साल में ही हो जाए अब्सोलेट?
या फिर 6 शून्य का बैंक बैलेंस
जो एक घर में ही हो जाए डीप्लेट?
जिन पर होना चाहिए हमें नाज़ आज
उन सब पर क्यूं हमें आती हैं लाज?
न चोटी न तिलक न जनेउ है
न सिंदूर न बिछुए न मंगलसूत्र है
मां-बाप,
सास-ससुर
के चरण स्पर्श
न करती है बहू न करता पुत्र है
गणेश की मूर्ति,
नटराज की मूर्ति
मात्र साज-सजावट
की वस्तु है
बचा ही क्या फिर संस्कृति के नाम पर?
होटल जा कर खा लेना छौला-समोसा?
कभी इडली-सांभर,
तो कभी सांभर-डोसा?
कभी आलू पराठा तो कभी मटर-पनीर?
गाजर का हलवा या चावल की खीर?
'डाँयटिंग'
और
'डाँयबिटिज़'
के बीच ये भी एक दिन खो जाएगे
संस्कृति के नाम पर हम बच्चों को अंत में क्या दे जाएगे?
भला हो
'बाँलीवुड'
की फ़िल्मों का
कि होली-दीवाली
के त्योहार हैं अब भी जीवित
भले ही हो सिर्फ़ सलवार-कमीज़-साड़ी-कुर्ते
और फ़िल्मी गानों पर नाचने तक सीमित
एक समय हम समृद्ध थे,
संस्कृति की पहचान थे
आद्यात्म,
दर्शन,
कला और नीति की हम खान थे
आयुर्वेद और औषधविज्ञान थे
ब्रह्मास्त्र और पुष्पक विमान थे
नालंदा विश्वविद्यालय विश्वविख्यात था
दूर दूर से ज्ञान पाने आते जहां विद्वान थे
नालंदा क्यूं रह गया बस एक खंडहर?
विलीन क्यूं हुए इंद्रप्रस्थ जैसे नगर?
कब और कैसे क्या हो गया?
सारा ऐश्वर्य हवा क्यूं हो गया?
जिस देश-समाज ने विश्व को शून्य दिया
वो किस तरह हर क्षेत्र में शून्य हो गया?
असली कारण तो सही ज्ञात नहीं
पर शायद हुआ ये अकस्मात नहीं
बची-खुची
संस्कृति भी
हमारे सामने ही विलुप्त हो रही आज है
शायद उस समय वो भी इस सच्चाई से बेखबर थे
जिस तरह से बेखबर हम आज हैं
परिवर्तन है प्रकृति की प्रवृत्ति
और संस्कृति भी अवश्य है बदलती
मगर क्या ये आवश्यक है कि
शून्य ही हो इसकी नियति?
राहुल उपाध्याय
सिएटल,
यू.एस.ए
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