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युएसए
का प्रवासी साहित्य
भाषा-शिक्षण हो जीवंत, जागृत और प्रचलित
सुषम
बेदी
अंतरराष्ट्रीय
स्तर पर हिंदी का ज्ञानोदय करने के लिए प्रज्ञावान प्रतिभाओं
और हिंदीसेवियों की ज़रूरत होती है। साधारण मनःस्थितिवाले
व्यक्तित्व के लिए यह देशसेवा-भाषासेवा का कार्य दुष्कर हो
सकता है क्योंकि इसके लिए धैर्य और स्वभाषा प्रेम की अनिवार्य
अपेक्षाएं हो सकती हैं। मनोकल्पना से दूर, कर्म की खुरदुरी
भूमि पर हिंदी शिक्षण का कार्य कितनी कड़ी चुनौतियां पेश करता
है, इसका प्रमाण है हिंदी की भावप्रवण बरिष्ठ लेखिका सुषम बेदी
का प्रस्तुत संरमरण-आलेख।
यह सच है कि भाषा सिखाने की कोई भी एक रीति अपने आपमें संपूर्ण
नहीं है। जब से भाषा, एक विदेशी भाषा के रूप में सिखायी जाने
लगी है, पश्चिम में उसके सिखाने के अनेकों सिद्धांत भी विकसित
हो गए हैं। एक पूरा क्षेत्र
‘लैंग्वेज
पैडागाजी’
का तैयार हो गया है जो भाषा पढ़ाने के नित नये तरीकों की
नयी-नयी सोच निकालता रहता है। इसके साथ ही यह भी सच है कि भाषा
सिखाने का कोई भी तरीका आप इस्तेमाल कर लीजिए, विद्यार्थी भाषा
सीखेंगे ही । यानी कि हर तरीका अपने में चाहे संपूर्ण न हो पर
भाषा सिखाने की पूरी संभावनाएं रखता है। जिन पुराने तरीकों को
ख़ारिज कर दिया गया है (जैसे कि विदेशी भाषा के व्याकरण की
शिक्षा और वाक्यों के मातृभाषा में अनुवाद के माध्यम) वह भी
अपने आपमें कारगर रहा ही है। अगर व्याकरण की समझ न हो तो वाक्य
रचना रटी-रटायी ही हो सकती है।
मैंने जब पहली बार हिंदी भाषा को एक
‘विदेशी’
भाषा के रूप में पढ़ाना शुरू किया तो मेरे पास भाषा शिक्षण की
कोई पद्धति नहीं थी। इससे पहले मैं एक-दो महीने
‘अलीयांस
फ्रांसेस’
मे फ्रेंच भाषा सीखने की शुरुआत कर चुकी थी और हिंदी साहित्य,
दिल्ली यूनिवर्सिटी के कॉलेज और पंजाब विश्ववविद्यालय में कुछ
मिलाकर सात साल तक पढ़ा चुकी थी। विदेशी भाषा जब तक कि विदेश
जाने का कोई मक़सद न हो, कोई सीखता नहीं। मेरी तब कोई ऐसा
मक़सद था नहीं। फिर अँगरेज़ी भाषा भी बचपन या किशोरावस्था से
ही सीखी जाती थी इसलिए विदेशी भाषा सीखने का वैसा ज्ञान नहीं
होता कि आप सहज भी भाषा सिखाने के काबिल हो जाएं। बहरहाल, जब
मैं विदेश (ब्रसल्स) पहुँची और मुझे हिंदी भाषा पढ़ाने को कहा
गया तो मेरे पास ले-देकर कुछ हफ़्तों की सीखी फ्रेंच थी। यूं
भी मेरे लिए हिंदी की जानकारी होने पर संस्कृत मूल की भाषा
सीखना उसी तरह है जैसे अँगरेज़ी सीखे लोगों के लिए फ्रेंच,
स्पेनिश इत्यादि सीखना। थोड़े व्याकरण के हेरफेर से भाषा जल्दी
पकड़ में आ जाती है क्योंकि उनकी शब्दावली बहुधा एक-सी होती
है।
ब्रेसल्स के सीखनेवाले पुरातत्त्वविद् और भारत के दूसरे
क्षेत्रों में रुचि रखनेवाले लोग थे जिनको हिंदी किसी परीक्षा
पास करने के लिए नहीं सीखनी थी बल्कि भारत में जाकर
बोलने-समझने के लिए सीखनी थी। मैंने
‘अलीयांस
फ्रांसेस’
के तरीके से ही पाठ तैयार किए और भाषा सिखानी शुरु की।
‘ये
क्या है’,
‘वह
क्या है’
- आसपास के वस्तुगत विषयों का पहले परिचय, फिर व्याकरण । सीखी
ज़रूर उन्होंने और एक भाषा शिक्षिका के रूप मे मेरी प्रशंसा भी
की पर वह सब इसलिए हुआ था कि मुझमें
सिखाने
का उत्साह और ऊर्जा बहुत थी और उनमें सीखने की। क्लास भी छोटी
थी-छह-सात विद्यार्थी। उत्साह और ऊर्जा तो किसी भी शिक्षण के
मूल में होना बेहद ज़रूरी होता ही है। लेकिन बड़े पैमाने पर
पढ़ाना हो और वर्षो पढ़ाना हो तो क्या इन्ही के बूते नैया पार
हो सकती है ?
क्या क्या कोई व्यवस्था, कोई नियमावली, कोई रचनात्म कार्यक्रम
ज़रूरी नहीं होगा ?
न्यूयॉर्क आने के बाद मुझे भाषा शिक्षण के और अवसर मिले तथा
साथ ही भाषा शिक्षण के सिद्धांतों की एक कक्षा में बैठने का
मौक़ा भी। पढ़ानेवाले एक जर्मन भाषाविद् थे। उनकी क्लास में कई
अतिथि बुलाए जाते थे। तभी संगीत द्वारा भाषा शिक्षण, दृश्य
उपकरणों द्वारा शिक्षण और गटैनो की पद्धति से भी मेरा परिचय
हुआ।
इसी दौरान मुझे डॉक्टरेट की उपाधि मिल गयी और मैं यूनिवर्सिटी
के स्तर पर नौकरी तलाशने लगी। यूं मेरी उपाधि हिंदी साहित्य
में थी और साहित्य ही मैंने अब तक भारत में पढ़ाया था। देखा
जाए तो यहाँ आकर भाषा पढ़ाना एक तरह से अपने स्तर से नीचे
उतरनेवाली बात थी। पर उसमें एक चुनौती थी विश्वविद्यालय के
स्तर पर भाषा सिखाने की। 1985 में जब मैंने कोलंबिया
विश्ववद्यालय में पढ़ाना शुरू किया तो अपने सीखे हुए सभी तरह
के आडियो-विजुअल, गटैनो इत्यादि तरीकों से पढा़ने लगी।
विद्यार्थी भाषा के व्याकरण में रुचि रखते थे और मैंने उस
व्याकरण-अनुवाद पद्धति को भी अपने तरीकों में शामिल कर लिया।
उन दिनों भाषा शिक्षण के क्षेत्र में
‘कम्युनिकेटिव’
शिक्षण पद्धति का विशेष जोर था। वर्ष 1986 में मैडिसन में
विस्कांसन विश्वविद्यालय में होनेवाली सालाना दक्षिण एशियाई
कांफ़्रेस में एक कार्यशाला में मेरा परिचय अमेरिकी काउंसल आन
द टीचिंग आफ फ़ारेन लैंग्वेजेस की पद्धति से हुआ। यह कार्यशाला
यूनिवर्सिटी ऑफ पैनसिलवेनिया में पढ़ानेवाले पति-पत्नी विजय और
सुरेन्द्र गंभीर दे रहे थे। इस प्रणाली का सारा ज़ोर इस बात पर
था कि भाषा को संप्रेषण के लिए बनाया जाए यानी कि उसका
इस्तेमाल संप्रेषण के लिए हो न कि छात्र मात्र भाषा का
निष्क्रिय या पुस्तकीय ज्ञान ही पाए और बिना इस्तेमाल के ही
भाषा यूं ही भुला दी जाए। विश्वविद्यालय की भाषा शिक्षा से
सबकी शिकायत यह थी कि लोग जब उन भाषाभाषी देशों में जाते हैं,
उनको बोलने में बहुत दिक्कत होती है। इसलिए यहीं पर भाषा को इस
तरह क्यों न सिखाया जाए कि लोग उसका सही संदर्भों में इस्तेमाल
कर सकें। इसीलिए सबसे पहले विकसित किए जा रहे थे
‘ओरल
प्राफिशयेंसी इंटरव्यू’
अर्थात् बातचीत के जरिए मौखिक योग्यता का स्तर निर्णीत करता ।
उसके बाद कोलंबिया यूनिवर्सिटी की ओर से ही मुझे इस विधि के
प्रशिक्षण के लिए भेज गया । मेरे सामने सवाल सिर्फ़ परीक्षाओं
में उत्तीर्ण होने का ही नहीं था बल्कि इस विधि से अपने
विश्वविद्यालयों में एक सफल भाषा कार्यक्रम की नींव रखना भी
था। अब तक के हमारे कार्यक्रम में व्याकरण की नींव प्रोफ़ेसर
फांसिस प्रिचेट रखती थीं और मैं छात्रों के अभिव्यक्ति पक्ष पर
ध्यान देती थी। पर धीरे-धीरे ऐसे छात्रों की संख्या बढ़ने लगी
जिन्हें मेरी पद्धति से ज़्यादा लाभ दीखने लगा। भारतीय मूल के
अधिकतर छात्र भाषा के व्यावहारिक ज्ञान की प्राप्ति के लिए ही
हिंदी
का कोर्स लेते थे। खासतौर से इसलिए भी कि भाषा के अकादमिक
ज्ञान में अब उनकी रुचि कम थी और उसके सही इस्तेमाल और मौखिक
प्रवीणता में ज़्यादा । उनको अपनी नानी-दादी से बातचीत करनी
होती थी, पत्र-व्यवहार करना होता था, या फिल्में देखनी-समझनी
होती थीं।
हिंदी कार्यक्रम नवें दशक में विस्तार पा गया। जहाँ तीन स्तरों
(प्राथमिक, माध्यमिक और साहित्य) की एक क्लास को हम दो लोग
मिलकर पढ़ाते थे, वहाँ अब प्राथमिक क्लासें बड़ी हो जाने की
व़जह से हमें दो सेक्शन बनाने पड़े। पर जहाँ मौखिक प्रवीणता को
आधार बनाकर उससे जुड़े विषयों को मैंने पढ़ाना शुरु किया वहीं
यह सवाल उठा कि प्रौफिशैंसी ओरियेंटेड सामग्री की बहत ज़रूरत
है। ज़ाहिर है कि यह सामग्री अब तक की बनायी गयी किताबों में
मौज़ूद नहीं थी क्योंकि ज़्यादातर किताबें व्याकरण को ही
केंद्र में रखकर लिखी गयी थीं। या अगर बातचीतवाली सामग्री
उपलब्ध थी तो वह भारत में रहनेवाले अँगरेज़ों की बातचीत की
ज़रूरतों को ध्यान में रखकर लिखी गयी थी जिसमे सिर्फ़ बाज़ार
की बातचीत थी या धोबी, रिक्शवाले आदि से। योजना के तहत जो
पाठ्यसामग्री तैयार की गयी उसकी दृष्टि बाक़ी पाठ्यपुस्तकों से
अलग थी। उदाहरण के लिए हमने पढ़ने की प्रामाणिक सामग्री को
चुना जिसमें प्राथमिक स्तर के लिए बहुत ही छोटे-छोटे टुकड़े
थे, सुनने से लिए टेलीविजन-फ़िल्मों से एक दो-दो मिनट के
हिस्से चुने। इस विधि की एक बहुत मौलिक ज़रूरत थी कि भाषा को
जीवन के संदर्भों के साथ जोड़ा जाए। बजाय कि यह कहें कि
‘राम
जाता है,’
सीता जाती है, सब जाते हैं,
‘विद्यार्थी
अपनी वह बात कह पाए जो वे सचमुच महसूस करके कहना चाहते हैं। अब
छात्रों को ऐसी भाषा देनी थी कि वे उन व्यक्तिगत सवालों का सही
उत्तर देने की भाषा को भी जानें। यहाँ उनको कुछेक एक गुर
सिखाने थे कि वे उसी तरह भाषा का इस्तेमाल करें जैसा कि उसके
भाषाभाषी करते हैं । ‘रीडिंग
स्ट्रेटजीज़’
को लेकर विल्गा रिर्व्स की नयी खोज में उसी तरह के तरीकों की
खोजकर बताया गया है किजिस तरह नेटिव स्पीकर हर शब्द को न जानकर
भी मतलब समझ लेता है, उसी तरह का स्ट्रेटेजीज़
की ज़रूरत विदेशी भाषा सीखनेवालों को भी है। कुछ विद्यार्थियों
को इससे बहुत तकलीफ़ हुई। उनको इस बात का आश्वासन चाहिए था कि
सामग्री ऐसी होनी चाहिए जिसे क्लास से बाहर भी वे अपने-आप
पढ़कर तैयार कर सकें। यूं प्रामाणिक पाठ तो उनके पास था ही
लेकिन उनमें अकसर शब्द ऐसे थे कि शब्दकोश में नहीं होते और
भाषा के प्रचलन में होते हैं।
मुझे ख़ुद पर हैरानी हुई - इतने सालों के अनुभव के बाद भी
शिक्षक में कुछ न कुछ धागे ढीले रह ही जाते हैं। क्या इसे
शिक्षण प्रणाली की कमियाँ कहा जाए या कि इस सच का सामना किया
जाए कि कोई भी दो सीखनेवाले एक-से नहीं होते। अब फिर से मुझे
खोजने थे नये तरीके। यह भी सच मसझ में आ गया था कि हर छात्र के
सीखने का तरीका अलग होता है। किसी को किसी तरीके से भाषा पल्ले
पड़ती है तो किसी को दूसरे से। हमारी क्लासों में छात्रों के
स्तर में भी बहुत वैविध्य था। कुछ भारतीय मूल के छात्रों को
थोड़ा-बहुत हिंदी का ज्ञान था तो उनके स्तरों में भी जितने
छात्र, उतने ही स्तर। किसी के माँ-बाप घर पर बोलते हैं तो वह
सारी बात समझ लेता है और कोई दक्षिण भारत से है तो उसने भाषा
कभी घर पर नहीं सुनी । पर कुछ फ़िल्मों की समझ है। तो वहीं
शून्य स्तर के अमेरिकी जिनको शून्य ज्ञान है या अपनी
भारत-यात्रा के दौरान कुछेक शब्द सुन आए हैं। मुझे हर स्तर के
और छात्र को ही भाषा सिखानी थी। यह मेरे लिए चुनौती बनी। और
बात सिर्फ़ भाषा सिखाने की ही नहीं होती। छात्रों की प्रवीणता
का मूल्याँकन और उनको सही ग्रेड्स वगैरह देना उसे और दूभर बना
देते हैं। इस मामले में आप चाहते हैं कि उनके साथ पूरा न्याय
हो।
इस समस्या के हल में भाषा लेख का मानदंड बहुत काम आया । बोलना
चाहे किसी को आता भी हो पर लिखना-पढ़ना आमतौर पर इन क्लासों
में किसी को नहीं आता। इसलिए इस बिंदु पर सबका स्तर समान हो
जाता है। जो छात्र मेहनत करता है, उसकी मेहनत लिखने में दीखने
लगती है जो नहीं करता वह यहीं कमजोर पड़ जाता है। जिनकी भाषा
में कुछ पृष्ठभूमि होती है वे बहुत जल्दी तरक्की करने लगते हैं
और उनकी ग्रेडिंग के मापदंड उनसे अलग होते हैं जिन्होंने शून्य
से शुरु किया होता है। इस तरह हर छात्र के विकास का अलग-अलग
लेखा-जोखा रखना होता है। एक तरह से उनकी होड़ दूसरे छात्रों से
न होकर अपने आपसे होती है। विविध स्तर के छात्रों को एक ही
क्लास में साथ पढ़ाते हुए ग्रेडिंग के लिए मुझे सबसे ज़्यादा
न्यायोचित यही तरीका लगता है। छात्रों की सारी विविधता को
समेटने और साथ ही यह कोशिश कि हर छात्र की इस क्लास से ज़्यादा
से ज़्यादा अपेक्षाएं पूरी हों, और उनकी भाषा के सभी पक्ष-
बोलना, पढ़ना, सुनना,लिखना और व्याकरण मजबूत हों, मैं अपने
प्रोग्राम में इन सबकी शिक्षा का संतुलन करने का भरपूर प्रयास
करती हूँ।
एक नयी चुनौती अब मेरे सामने है कि इतना कुछ नया जो तकनीकी
क्षेत्र में भाषा प्रशिक्षण की दिशा में किया जा रहा है, कहीं
उससे हम बंचित न रह जाएं। भावी छात्र ज़्यादा से ज़्यादा
कंप्यूटर से परिचित हैं। आजकल इस तरह की सामग्री भी उपलब्ध
होने लगी है। कछ सामग्री का हम इस्तेमाल करते हैं। प्रयास करना
चाहती हूँ कि उनको अगले कार्यक्रम में शामिल करूँ क्योंकि इस
इस्तेमाल से छात्र काफी स्वतंत्र हो जाएँगे और क्लास से बाहर
भी हिंदी सीखने का काम करते रहेंगे। यूं अभी भी वे हर हफ्ते एक
घंटा लैब में काम करते हैं। कई तरह की टैकनालोजिकल सामग्री
पहले से उपलब्ध है। वीडियो, रेडियो तथा कंप्यूटर पर भी। जिस
तरह से स्पेनिश, जर्मन आदि में वैब सामग्री है, उतना होने में
तो देर लगेगी। लेकिन भाषा शिक्षम में काफी हद तक भविष्य की
दिशा यही है। भाषा सीकनेवाले इंटरनेट के माध्यम से बहुत करीब
होते जा रहे हैं। आजकल के बच्चे जब कंप्यूटर से इतनी जल्दी
परिचित होते जा रहे हैं किहर घर में वह एक साथी की तरह मौजूद
होने लगा है तो भाषा सिखलाने में, उसे सीखनेवालों तक भलीभाँति
पहुँचाने में, हमें भी इस दोस्त की मदद लेनी होगी।
दरअसल भाषा पढ़ाना एक कला है और विज्ञान भी। कला इसलिए कि
उसमें लगातार सर्जनात्मकता की ज़रूरत है और विज्ञान इसलिए कि
उसमें व्यवस्था और नियमों का पूरा-पूरा ध्यान रखना पड़ता है।
ऊर्जा, उत्साह, सर्जनात्मकता और परिणाम जहाँ भाषाशिक्षण को एक
कला का रूप प्रदान करते हैं, वही पाठन-पद्धतियों का सही
इस्तेमाल विज्ञान का । दोनों का संतुलन ही श्रेष्ठ भाषाशिक्षण
की नींव है।
(चेतना का आत्मसंघर्ष से,
हिंदी की इक्कीसवीं सदी, हिंदी उत्सव ग्रंथ से)
सुषम बेदी
यू.एस.ए
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