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घर की दीवार में एक सम्मानित खिड़की
मोहन राणा
लंदन
पहुँचने की हाँ तो कर दी पर फिर एक
ऊहापोह
की गाड़ी मन
में
चल पड़ी,
जब-तब रूक जाती फिर चल पड़ती,
दूबे जी बोले आप बस
आ जाइये,
पर कुछ बोलना किसी पुरस्कार को ग्रहण करने के बाद,
मुझे इसका कोई अनुभव
नहीं...क्या कहा जाय,
खुशी हुई इसे पाकर,
धन्यवाद... या कोई गंभीर सी बात,
जिसे
तुरंत हर कोई भूल जाय।
मन में जो हल्की झिझक थी । शायद दिल्ली के साहित्य समाज के
विशेष वर्ग की विदेशों में हिन्दी से जुड़े लोगों के शंका
दृष्टि के प्रति मेरी
बची खुची संवेदना,
पर फिर मैंने सोचा कि मैं इस वर्ग की भ्रामक राय को महत्व
क्यों
दूँ।
तो टालते-टूलते रेलगाड़ी का टिकट भी कर लिया,
बुकिंग कहीं भारत में कोई
लड़का कर रहा था,
लंदन और बाथ के बीच की दूरी के हिसाब से शायद यह इंग्लैंड के
सबसे
महँगे रूट में से एक है,
तो हम दोनों लग गए फोन पर समय और सस्ते टिकट की पड़ताल में
।
खैर, कुछ खोज-बीन करके एक समय और टिकट तय हो गया। समय और
तकनालॉजी का कमाल की दो दिन
जो यात्रा मुझे करनी है उसकी बुकिंग दक्षिण भारत में हो रही
थी।
नए साल में
टिकटों की क़ीमत में भारी बढ़ोतरी के विरोध में यात्रियों के
स्थानीय संगठन में
पिछले दिनों इसके विरोध में फर्जी यात्रा टिकट जारी किए।
शनिवार
16
फरवरी भी
आ गया,
ट्रेन
30
मिनट देर से लंदन पहुँची । भागते-भागते ऑलडविच में स्थित
भारतीय
उच्चायोग पहुँच गया । कार्यक्रम
10
मिनट लेट था पर श्री राकेश दूबे दक्षता से
कार्यक्रम को संचालित कर रहे थे । हिन्दी दिवस के अवसर पर
आयोजित इस कार्यक्रम में
ब्रिटेन
में रह रहे हिन्दी लेखक और हिन्दी विद्वान सम्मानित किए गए तथा
भारतीय
उच्चायोग के कर्मचारियों के बच्चों को उनकी हिन्दी उपलब्धियों
के लिये पुरस्कार
प्रदान किये।
यू.के. में हिन्दी लेखकों को पुस्तकें प्रकाशित करवाने में
सहायता
प्रदान करने के लिये पिछले वर्ष डा. लक्ष्मीमल सिंघवी यू.के.
हिन्दी प्रकाशन सहायता
योजना की घोषणा की गई थी। अब इस योजना को विदेश मंत्रालय का भी
समर्थन प्राप्त हो
गया है तो वर्ष
2008
के लिए मुझे कविता संग्रह "धूप के अँधेरे में" के लिए और
बर्मिंघम में रहने वाली श्रीमती स्वर्ण तलवाड़ को उनके काव्य
संग्रह " कविता तुम
कौन हो?"
के लिए चुना गया । मैंने पहले टाइप की हुई तीन चार पंक्तियाँ
वक्तव्य के
रूप में पढ़ी
। कार्यक्रम के दौरान यूके में हिन्दी लेखक संगठन की स्थापना
की
घोषणा भी की गई। उसके बाद वहाँ फ़्रैंचेस्का ऑरसीनी मिल गईं वे
हिन्दी सम्मान ग्रहण
करने आईं थी। वे बोली आपका नाम तो सुना है अपने बारे में
बताइये!
मैं सोच रहा
था उन्होंने क्या सुना है मेरे बारे में...हम टूटी-फूटी बातों
की अटकलों में कोई
बातचीत करते रहे।
उच्चायोग से निकल कर चेरिंगक्रास रोड पर फॉयल्स नामक
किताबों की दुकान की ओर बढ़ गया,
वहाँ ली पाए और बोर्खेस के संग्रह चुने और तत्परता
के साथ स्टेशन की ओर बढ़ गया,
दुनिया की प्रमुख भाषाओं से कविताओं के अँग्रेज़ी
अनुवाद यहाँ मिल सकते हैं पर किसी भारतीय भाषा से समकालीन
कविता की कोई संग्रह उस
दुकान में नहीं था ।
कुछ दिनों पहले दैनिक जागरण में पढ़ा आज हिंदी प्रकाशन का
सालाना टर्न ओवर
100
करोड रुपये हो चुका है। हिंदी के छोटे-बडे लगभग
800
प्रकाशक
हैं। उनके द्वारा प्रकाशित कोई कविता की किताब विदेशी
अनुवादकों को अनुवाद के लायक
नहीं लगी । अगर कोई हुई भी तो फॉयल्स जैसी दुकानों में तो नज़र
नहीं आती...क्या व़जह
होगी - क्या हम डीगें ही तो नहीं हाँकते । जब हम विदेश का
अनुभव प्राप्त एक वरिष्ट कवि
की टिप्पणी पढ़ते हैं जिसमें वे यह दावा करते हैं कि "हमारे
यहाँ हिंदी के कम से कम
ऐसे
20
लेखक हैं जो नोबल पुरस्कार पाने योग्य हैं। इसके लिए दुनिया के
दूसरे देशों
में हिंदी को सही रूप में पेश किए जाने की ज़रूरत है। "
सही रूप में पेश किए जाने
का दायित्व किसका है,
लेखकों का,
प्रकाशकों को,
आलोचकों का नौकरशाहों
का!सारी
दुनिया से हज़ारों की संख्या में लोग भारत की यात्रा करते हैं
उनके मन
में क्या यह इच्छा नहीं होती कि किसी भारतीय भाषा के लेखक को
पढ़ें,
रूश्दी,
नॉयपाल
विक्रम सेठ,
अरुँधती रॉय और यात्रा गाइडों को पढ़ने के बाद ही सही..
यही सोचता
मैं चेरिंगक्रास रोड में भीड़ के बीच अपना रास्ता खोजता टॉटनहम
कोर्ट रोड के
भूमिगत स्टेशन में घुस गया। स्टेशन के कर्मचारी किसी लड़की को
सहारा दे कर सीढ़ियों
से नीचे हॉल में ले जा रहे थे,
उसने शाम होने से पहले ही कुछ ज्यादा पी ली
थी।
रेलगाड़ी ने ठंडे अँधेरे में लंदन से निकलते ही पश्चिमी दिशा
में गति
पकड़ ली। झोले में एक फ़्रेम किया हुआ सम्मान पत्र है,
मैंने सोचा,
मेरे घर में यूँ
तो कई खिड़कियाँ है पर उनके बीच किस एक दीवार पर यह सम्मानित
खिड़की लगाऊँगा।
इस
घर की दीवार में एक सम्मानित खिड़की, जिसके कपाट अभी खुले नहीं
हैं।
मोहन राणा
221, Wellsway, Bath BA2 4RZ
England, UK
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