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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-22, मार्च, 2008

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।। मित्र-प्रसंग ।।

 

 

कामरेड त्रिलोक सिंह - कर्मयोगी कृष्ण सा उनका व्यक्तित्व


गिरीश बिल्लोरे"मुकुल"

 

क व्यक्तित्व जो अंतस तक छू गया है । उनसे मेरा कोई खून का नाता तो नहीं किंतु नाता ज़रूर था । कमबख्त डिबेटिंग गज़ब चीज है बोलने को मिलते थे पाँच मिनट पढ़ना खूब पड़ता था । लगातार बक-बकाने के लिए कुछ भी मत पढिए, एक घंटे बोलने के लिए चार किताबें, चार दिन तक पढिए, पाँच मिनट बोलने के लिए सदा ही पढिए, ये किसी प्रोफ़ेसर ने बताया था याद नहीं शायद वे राम दयाल कोष्टा जी थे, सो मैं भी कभी जिज्ञासा बुक डिपो तो कभी पीपुल्स बुक सेंटर,  जाया करता था। पीपुल्स बुक सेंटर में अक्सर तलाश ख़त्म हों जाती थी, वो दादा जो दूकान चलाते थे मेरी बात समझ झट ही किताब निकाल देते थे। मुझे नहीं पता था कि उन्होंनें जबलपुर को एक सूत्र में बाँध लिया है। नाम चीन लेखकों को कच्चा माल वही सौंपते है इस बात का पता मुझे तब चला जब पोस्टिंग वापस जबलपुर हुई। दादा का अड्डा प्रोफेसर हनुमान वर्मा जी का बंगला था। वहीं से दादा का दिन शुरू होता सायकल, एक दो झोले किताबों से भरे,  कैरियर में दबी कुछ पत्रिकाएँ,  जेब में डायरी, अतरे दूसरे दिन आने लगे मलय जी के बेटे हिसाब बनवाने, आते या जाते समय मुझ से मिलना न भूलने वाले व्यक्तित्व...को मैंने एक बार बड़ी सूक्ष्मता से देखा तो पता चला दादा के दिल में भी उतने ही घाव हें जितने किसी युद्धरत सैनिक के शरीर पे हुआ करते हैं।

 

कर्मयोगी कृष्ण-सा उनका व्यक्तित्व, मुझे मोहित करने में सदा हे सफल होता...ठाकुर दादा, इरफान, मलय जी, अरुण पांडे, जगदीश जटिया, रमेश सैनी के अलावा, ढेर सारे साहित्यकार के घर जाकर किताबें पढ़वाना तिरलोक जी का पेशा था। पैसे की फ़िक्र कभी नहीं की जिसने दिया उसे पढ़वाया,  जिसके पास पैसा नहीं था या जिसने नही दिया उसे भी पढवाया ।

 

कामरेड की मास्को यात्रा, संस्कार धानी के साहित्यिक आरोह अवरोहों , संस्थाओं की जुड़्न-टूटन को खूब करीब से देख कर भी दादा ने इस के उसे नहीं कही। जो दादा के पसीने को पी गए उसे भी कामरेड ने कभी नहीं लताडा कभी मुझे ज़रूर फर्जी उन साहित्यकारों से कोफ्त हुई जिनने दादा का पैसा दबाया ।

 

कई बार कहा " दादा अमुक जी से बात करूँ...?

 

रहने दो ...?

 

यानी गज़ब का धीरज ।

 

सूरज राय "सूरज" ने अपने ग़ज़ल संग्रह के विमोचन के लिए अपनी मान के अलावा मंच पे अगर किसी से आशीष पाया तो वो थे :"तिरलोक सिंह जी "। इधर मेरी सहचरी ने भी कर्मयोगी के पाँव पखार ही लिए। हुआ यूँ कि सुबह सबेरे दादा मुझसे मिलने आए किताब लेकर आँखों में दिखना कम हों गया था,फ़िर भी आए पैदल । सड़क को शौचालय बनाकर गंदगी फैलाने वाले का मल उनके सेंडिल में....मेन गेट से सीढियों तक गंदगी के निशान छपाते ऊपर आ गए दादा। अपने आप को अपराधी ठहरा रहे थे जैसे कोई बच्चा गलती करके सामने खडा हो। इधर मेरा मन रो रहा था कि इतना अपनापन क्यों हो गया कि शरीर को कष्ट देकर आना पड़ा दादा को । संयुक्त परिवार के कुछ सदस्यों को आपत्ति हुयी की गंदगी से सना बूढा आदमी गंदगी परोस गया गेट से सीडी तक । सुलभा के मन में करूणा ने जोर मारा । उनके पैर धुलाने लगी । मानव धर्म के आधार में करुणा का महत्त्व सुलभा से बेहतर कौन समझ पाया होगा तब।   

 

  तिरलोक जी का आशीर्वाद लेकर सुलभा ने जाने कितना कुछ हासिल किया मुझे नहीं मालूम ।  मेरे और अन्य साहित्यकारों के बीच के सेतु तिरलोक जी फिर एकाध बार ही आए अब तो बस  आतीं हैं उनकी यादें दस्तक देने मन के दरवाज़े तक ऐसा सभी साथी महसूस करते हैं।

गिरीश बिल्लोरे"मुकुल"

 जबलपुर, मध्यप्रदेश

 

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