vbn

SRIJANGATHA.COM

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अंतर्राष्ट्रीय मंच

सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-22, मार्च, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

मूल्याँकन हस्ताक्षर पुस्तकायन विचार-वीथी प्रसंगवश इनदिनों हिंदी-विश्व लोक-आलोक व्याकरण तकनीक

बचपन शेष-विशेष हलचल विशेषांक सृजनधर्मी लेखकों से संपादक बनें चतुर्दिक पुरातनअंकअभिमतमुख्यपृष्ठ

 

।। संस्कार ।।

 

 

सृजन का परिवेश

मनुष्यत्व से साक्षात्कार


निर्मल वर्मा

 

त्ता का सत्य उतना ही चिरंतन है, जितना सत्य की सत्ता का अनुभव। हर सत्ता के पीछे एक तरह की शक्ति क्रियाशील रहती है; वह परिवार हो, धर्म प्रतिष्ठान हो या राज्य-सत्ता हो, वे समस्त संस्थाएँ जो मनुष्य और मनुष्य, या मनुष्य और मनुष्येतर सत्ताओं के बीच संबंध निर्धारित करती हैं, इसी कोटि में आती हैं। मानव संसार में जहाँ भी मनुष्य अपनी भौतिक और आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पू्र्ति के लिए अपने से बाहर किसी अन्य सत्ता पर निर्भर करता है, उसे अनिवार्यत: उसका मूल्य चुकाना पड़ता है। वह अब पूर्णत: अपना स्वामी नहीं रहता, स्वाधीनता का अंश उन सत्ताओं को अर्पित करना पड़ता है, जो धरती पर उसका जीवन संभव बनाती हैं। बदले में ये सत्ताएँ उसके लिए पूरा एक नीति-विधान और नियम संहिता बनाती हैं, जो उसके जीवन के समस्त पक्षों को प्रभावित करती हैं। मनुष्य वह अब भी रहता है, किंतु अब उसका मनुष्यत्व सामाजिक, आर्थिक, ऐतिहासिक इकाइयों में विभाजित होने लगता है। यह कहना भी कठिन लगता है कि उसकी अपनी एक अखंडित अस्मिता है-उसके भीतर उसकी अस्मिताएँ कभी एक-दूसरे से अनजान, कभी आपस में टकराती हुई कायम रहती हैं।
 

इन सबके बीच साहित्य का स्थान कहाँ है-यह एक प्रश्न है; शायद इससे अधिक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि वह क्यों है, क्या प्रयोजन है उसके होने का ? साहित्य के बारे में यह जिज्ञासा इसलिए जगती है, क्योंकि अन्य सामाजिक सत्ताओं की तरह वह कोई प्रयोजन पूरा नहीं करता। मनुष्य का कोई ऐसा पक्ष नहीं, जो उसके बिना सूखा या अतृप्त बचा रहे। उसकी समस्त भौतिक, सांसारिक इच्छाओं को दूसरी सत्ताएँ न्यूनाधिक मात्रा में तुष्ट कर देती हैं। और जहाँ तक उसकी आध्यात्मिक तृष्णा का प्रश्न है, शताब्दियों से विभिन्न धर्म-प्रतिष्ठान, ईश्वर की अवधारणाएँ, देवी-देवताओं का अस्तित्व किसी-न-किसी रूप में उसके जीवन और मृत्यु को अर्थ देते रहे हैं। इन सबके बावजूद अवश्य ही मनुष्य के भीतर कोई ऐसा रिक्त स्थान, कोई सूखापन, कोई तड़प बची रहती होगी जिसे कोई सत्ता अपने हिसाब-खाते में दर्ज नहीं करती, लेकिन जिसकी छाया में हर अनलिखे पन्ने पर मँडराती है। क्या है वह छाया, जिसका सत्ता केवल साहित्य में मूर्तिमान होती है ?
 

इसका एक सीधा-सा उत्तर होगा-मनुष्य के भीतर मनुष्यत्व पाने की आकांक्षा। यह ऊपर से थोड़ा विरोधाभास जान पड़ेगा। वह जो पहले से ही मनुष्य है, भला उसे मनुष्यत्व पाने का स्वप्न क्यों देखना चाहिए ? यह इसलिए कि जिन सामाजिक-राजनीतिक सत्ताओं के बीच मनुष्य रहता है, वहाँ उसका केवल एक अंश उद्घाटित होता है, केवल उतना अंश जो इतिहास द्वारा परिचालित होता है। किन्तु मनुष्य सिर्फ ऐतिहासिक प्राणी नहीं है। इतिहास में वह जीता जरूर है (उसका कोई विकल्प नहीं है), लेकिन वह उसका घर नहीं है। वह उसमें एक निर्वासित व्यक्ति की तरह जीता है। वह उसमें होकर भी कहीं और है, जिसकी कल्पना तो वह कर सकता है, किंतु जिसे वह परिभाषित नहीं कर सकता। इतिहास और समाज की सत्ताएँ उसे बाँधती हैं-कल्पना में वह हर दिए हुए बंधन, कानून, नियम संहिताओं से मुक्त हो जाता है। दो शब्दों में कहें, तो वह पहली बार सामाजिक, ऐतिहासिक प्राणी होने के बजाय सिर्फ एक मनुष्य होने की परिकल्पना करता है।
 

साहित्य वह घर है-बिना दीवारों का घर- जहाँ वह पहली बार अपने मनुष्यत्व से साक्षात्कार करता है। यह सत्य का अनुभव है, सुख का नहीं। यदि हमें सुख की सुरक्षा चाहिए, तो हमें साहित्य के पास नहीं जाना चाहिए, घर शब्द से जो सुरक्षा की सुगंध आती है, वह साहित्य में नहीं है। घर वह सिर्फ इस अर्थ में है कि वहाँ हम समस्त बाहरी सत्ताओं से छुटकारा पाकर अपने सत्य के पास लौटते हैं। अपना सत्य यानी समूची मनुष्यता का अखंडित, अविभाजित सत्य। सत्ता हमेशा मनुष्य सापेक्ष होती है-साहित्य की विशेषता इसमें है कि वह मनुष्य द्वारा सृजित होने पर भी मनुष्येतर शक्तियों से नाता जोड़ता है, अपने को केवल मानव समाज तक सीमित नहीं रखता। साहित्य का संबंध प्रकृति और ब्रह्मांड की उन समस्त अंधकारपूर्ण, रहस्यमय शक्तियों से है, जो मनुष्य के बाहर होते हुए भी उसकी नियति में दखल देती हैं। सत्ता का क्षेत्र मनुष्य जगत् है, किंतु शक्ति का साम्राज्य समूचे प्राकृतिक परिवेश को घेरता है। मनुष्य जब अपने में लौटता है तो यहीं, इसी घर में जिसकी विराटता, असीमता और अज्ञेयता आदिम मनुष्य को इतना आतंकित और सम्मोहित करती थी। साहित्य की सत्ता’- यदि उसे सत्ता कहा जा सके-उस वैदिक वृक्ष की याद दिलाती है, जिसकी जड़ें अंतरिक्ष की ओर उठी हैं और शाखाएँ नीचे धरती की ओर झुकी हैं।
 

साहित्य का यह एक दूसरा विरोधाभास है कि उसमें मनुष्य अपनी औसत औकात से हटकर अपने अतिरेक में जीता है-और इस अतिरेक के माध्यम से हम उसके मनुष्यत्व के असली मर्म की तह में जा पाते हैं। महाकाव्यों के चरित्र अतिरेक के कारण ही नायक या हीरो बनने का गौरव प्राप्त करते हैं-क्योंकि वे जीवन की औसत सीमाओं का उल्लंघन करने का जोखिम उठाते हैं-अर्जुन अपनी वीरता में, दुर्योधन अपनी लिप्सा में, कर्ण अपनी दानशीलता में, युधिष्ठिर अपनी धर्म मर्यादा में, द्रौपदी अपने प्रतिशोध में लगी-बँधी लीकों को तोड़कर हमारे सामने मानव-प्रकृति के चरम रहस्यों को उद्घाटित करते हैं। साहित्य की उत्कृष्ट कृतियाँ वे नहीं हैं जहाँ मनुष्य समाज के आईने में अपने प्रतिबिंब को देखता है, बल्कि वे हैं जिनमें वह आईने को तोड़कर अपने से परे जाता है, अपनी संभावना के अंतिम छोर पर, जो उसके चरित्र की परिणित है-वह छोर है, जहाँ समसा नाम का एक ट्रैवलिंग सेल्समैन एक सुबह अपनी औसत जिंदगी में अपने को एक कीड़े की तरह रेंगता पाता है और अन्ना कैरेनिना जैसी नायिका का प्रेम रेल की पटरी पर अपनी लहूलुहान लोथ में संपूर्ति पाता है। व्यास, टॉल्स्टॉय, काफ़्का के ये पात्र हमसे क्या कहते हैं ? वे मानव जीवन के एक मूल सत्य को उद्घाटित करते हैं-वह यह कि मनुष्य का मनुष्यत्व उसकी यथास्थिति में नहीं, उसके अतिक्रमण में; उसकी औसत अवस्था में नहीं, उसके उल्लंघन में प्रगट होता है। अतिरेक का क्षेत्र प्रकृति का क्षेत्र है, सामाजिक नियमों का क्षेत्र नहीं। इन पात्रों में मनुष्य अपनी छद्म मर्यादाओं की ओढ़-बिछावन फेंफकर प्रकृति के नग्न बीहड़ क्षेत्र में प्रवेश करता है।
 

इसी अर्थ में साहित्य के पात्र और स्थितियाँ मिथकीय आकार प्राप्त करती हैं। मिथक का प्रकृति से वही संबंध है, जो मनुष्य का अपने आभ्यंतरिक जगत् से। दोनों में एक ऐसी विराट अतिमानवीय शक्ति प्रवाहित होती है, जो झंझावत की तरह समाज के किसी नियम-कानून की परवाह किए बिना अपनी रौ में चलती है। कृष्ण जिस धर्म-मर्यादा की बात दुर्योधन से करते हैं, वह दुर्योधन के क्रोध, आवेश, विजय-लालसा के सामने क्या कुछ भी अर्थ रखते हैं, क्या कुंती के आँसू कर्ण की आक्रोश-अग्नि को थोड़ा भी बुझा पाते हैं ? इलेक्ट्रा अपने भाई का दाह-संस्कार करने की आकांक्षा में क्या राजनियमों की जरा भी चिंता करती है ? नहीं, क्योंक वे इन क्षणों में सामाजिक सत्ताओं के ऊपर किसी और शक्ति के नियंत्रण में हैं। सत्ता हमेशा मनुष्य सापेक्ष होती है, जबकि शक्ति एक मनुष्येतर दुनिया में प्रवाहित होती है। वह अपने होने के लिए समाज की स्वीकृति और सैक्शन पर निर्भर नहीं होती। सत्ता का क्षेत्र मनुष्य जगत् है। वहीं से वह अपनी वैधता प्राप्त करती है। शक्ति का क्षेत्र समूचा ब्रह्मांड और मनुष्य की आंतरिक प्रकृति है-दोनों जिस विस्फोटनीय स्थल पर मिलते हैं, वहाँ मिथकीय चरित्रों का जन्म होता है। साहित्य का स्रोत और कविता का उद्गम स्थल भी वही है।
 

यही कारण है कि साहित्य और सामाजिक सत्ताओं के बीच का संबंध इतना पेचीदा, दुविधाजनक और पीड़ायुक्त होता है। साहित्यकार भले ही जीने के लिए सत्ताओं के आगे घुटने टेकता रहे-साहित्य या वह साहित्य, जिसका उल्लेख हम यहाँ कर रहे हैं, हमेशा सत्ताओं की वैधता पर प्रश्नचिह्न लगाता है। समाज, विशेषकर राज्य सत्ता अपने सदस्यों को एक खास लीक पर चलने के लिए बाध्य कर सकती है, विरोध करनेवालों को दंडित कर सकती है। बहुत समय नहीं गुजरा जब राज्यों के नरेश अपनी सत्ता को दैवी अधिकार’ (डिवाइन राइट) मानते आए थे। बीसवीं शताब्दी ऐसी निरंकुश शासक-सत्ताओं से अटी पड़ी है जिनकी तानाशाही का आतंक हर नीति-नियम, हर संविधान की सीमाओं के बाहर था। सत्ता की यह लिप्सा केवल सेक्यूलर राज्य-संस्थाओं तक सीमित नहीं थी। उनके धर्म-प्रतिष्ठान आज भी इतने शक्तिशाली हैं कि उनके आदेश का उल्लंघन ही एक अक्षम्य अपराध हो जाता है-और यह केवल मध्ययुग में ही नहीं था, जब लूथर और यान हुस को कैथलिक चर्च के हाथों अपनी हैरेसी के लिए दंड भोगना पड़ा था, हमारे समय में सलमान रुश्दी और तसलीमा नसरीन को स्वयं अपनी अंतश्चेतना की आवाज सुनने की सज़ा भुगतनी पड़ी है।
 

इसके विपरीत साहित्य के पीछे न राज्य सत्ता का बल है, किसी धार्मिक संस्थान का आतंक। लेखकों को कारागृह में डाला जा सकता है, पुस्तकों को गली-चौराहों पर जलाया जा सकता है। ये हादसे कोई प्रिमिटिव समाज की बर्बर सत्ताओं तले नहीं, ऐसे सभ्य समाजों में होते थे जहाँ एक तरफ गोएटे और टॉल्स्टॉय की पूजा होती थी, दूसरी तरफ टॉमस मान और मेंडलश्टाम की पुस्तकों को पढ़ना निषिद्ध था। लिखा हुआ शब्द हमारे आधुनिक समाजों में जितना निरीह और निष्कवच रहा है, उतना शायद कभी नहीं। फिर क्या कारण है कि आततायी सत्ताओं को हमेशा वह एक खतरे भरा अंदेशा जान पड़ता है ? कहाँ छिपा है उसकी शक्ति का स्रोत ? यह स्रोत किसी बाहरी सत्ता में न होकर स्वयं शब्द के भीतर विद्यमान है। जो शब्द राजनीतिक सत्ताओं के समक्ष इतना निरीह और अवश दिखाई देता है, वही साहित्य में प्रवेश करते ही एक तरह की अज्ञात, असीमित ऊर्जा प्राप्त कर लेता है। बिना शब्द के साहित्य की परिकल्पना असंभव है-इस दृष्टि से वह अन्य कलाओं से इतना भिन्न है। एक साहित्यिक कृति अपनी ऊर्जा उस भाषा से प्राप्त करती है, जिसमें वह अपने को रूपायित करती है। भाषा का सामाजिक पहलू उसके संप्रेषण में है, वहाँ वह एक माध्यम के रूप में प्रयुक्त होती है। किंतु साहित्य के सृजन क्षेत्र में वह महज माध्यम बनकर नहीं रह पाती, बल्कि एक स्वायत्त शक्ति के रूप में प्रकट होती है। वह अपने प्रयोजन में समाजोन्मुख भले ही हो, अपने होने के लिए समाज पर आश्रित नहीं है। शब्द वही रहते हैं, लेकिन एक कविता, नाटक, उपन्यास में आते ही वे अपनी स्मृतियों, संस्कारों, संदर्भों को उजागर करते हैं, वे सामाजिक संप्रेषण की व्यावहारिक शब्दावली से कहीं अधिक अस्तित्ववान होते हैं-अस्तित्ववान इस अर्थ में कि वे सामाजिक उपादेयता से ऊपर उठकर स्वयं मनुष्य को अपने अस्तित्व की मूलगामी स्थिति की ओर आकृष्ट करते हैं। साहित्य में प्रवेश करते ही शब्द एक अतिरिक्त शक्ति प्राप्त कर लेता है।