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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-22, मार्च, 2008

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।। संस्कार ।।

 

 

 भाग-7

एक नये समीक्षक को सलाह


जार्ज बर्नार्ड शॉ 

 

(उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में गोल्डिंग ब्राइट नामक एक युवक नाट्य समीक्षा से संबंधित सिद्धांत के विनियोग की व्यावहारिक शिक्षा प्राप्त करने के उद्देश्य से अँगरेज़ी भाषा के विश्वविख्यात नाटककार जार्ज बर्नार्ड शॉ के समक्ष पत्रों के माध्यम से उपस्थित हुए । शॉ ने उनके मनोबल को ऊँचा किया । शॉ को भी ब्राइट की बालसुलभ भावुकता और उत्कंठा ने प्रभावित किया । गोल्डिंग को दी गई सलाहें बाद में 'ऐडवाइस टु ए यंग क्रिटिक' नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुईं । इस पुस्तक का संपादन डॉक्टर ई.जे.वेस्ट ने किया है । इस कृति की भूमिका उन्होंने 5 सितम्बर 1955 को लिखा थी । 14 वर्ष पूर्व पटना में ए.एन.कॉलेज हिंदी विभाग की अध्यक्षा डॉ. सरोज सिन्हा ने इसका अनुवाद किया और अनुदित कृति का नाम दिय़ा - एक नये समीक्षक को सलाह । हम इसे साहित्यिक हित में संपूर्णतः प्रकाशित कर रहे हैं। इस महान कृति को अब धारावाहिक रूप से आगे पढ़ सकते हैं । प्रस्तुत है इस धारावाहिक की सातवीं कड़ी - संपादक)

 

प्रिय व्राइट साहब,

पहले की तरह बहुत सारी चिट्ठियाँ बहुत दनों से बिना जवाब के पड़ी हैं। वस्तुतः मैं इतनी देर करना नहीं चाहता था। अपने पिताजी के कार्यलापों से निर्मित स्थिति का आपने दृढ़तापूर्वक सामना किया । बधाई । सच कहूँ तो मैं यह देखने के लिए उत्सुक था कि इसके लिए आपमें सचमुच कितनी दृढ़ता है, आप इसे हल करने में कितने सक्षम हैं। यद्यपि यह बात आशा लगती है, फिर भी बहुत से महान् व्यक्तियों के साथ-विशेषकर कलात्मक और साहित्यिक प्रवृत्ति वाल मनुष्यों के साथ यह बात विशेष रूप से लागू होती है। संघर्ष का आह्वान ‘पियर गिंट’ के तीसरे अंक के पहले दृश्य की तरह समाप्त हो जाता है, जिसमें पियर उस आदमी को दिखाता है जो सेना की नौकरी से बचने के लिए अपनी ही ऊँगली काट लेता है।
 

“हाँ, इसके विषय में सोचिए । ऐसा हो जाने की कामना कीजिए।
किन्तु ‘यह करें’-यह बात तो मेरी भी समझ के परे है।” आपको मैं इस तथ्य पर बधाई देता हूँ कि आपके सभी मित्र और सम्बन्धी आपको पागल समझते हैं। यह आदरपूर्ण स्वतन्त्र जीवन का अनिवार्य श्रीगणेश है।
 

अपनी पहली चिट्ठी में आपने यह व्यक्त किया है कि मेरे इस कथन से आपको आश्चर्य हुआ कि ‘पौला टैंक्वेरे’ जैसी महिला तीन वर्ष और तैंतीस वर्ष- दोनों में एक जैसी रहती हैं, यह बिल्कुल सच है। रूसी अपनी काम-भावना का प्रारम्भ अपने जन्म से ही मानते हैं, पौला के लिए मैंने जो धारणा निश्चित की, उससे तीन वर्ष पहले से ही पौला के विचारों और मतों के विकृत और अनैतिक होने का तो कोई सवाल ही नहीं है । यह अनैतिकता के तमाम प्रश्नों से परे है । वह एलियन से है; लेकिन वैसे तो कवि भी गणितशास्त्री से भिन्न होते हैं । अगर आप गणितशास्त्रियों की प्रवृत्तियों को आदर्श मान लें तो सचुमच कवि निकम्मा ठहरता है; लेकिन वैसे तो कवि भी गणितशास्त्री से भिन्न होते हैं; लेकिन, ऐसा आप मानें ही क्यों ? अगर आप एलियन को आदर्श मान लें तो पौला निकम्मी ठहरती है। प्रश्न है, फिर पौला को ही क्यों नहीं आदर्श मानकर एलियन को भाव-शून्य अस्वाभिविक और स्वार्थी ठहरा दें (और पौला जैसी महिला निरपवाद रूप से यही ठहरती है। ? किसी समीक्षक को बिना ध्यानपूर्वक सोच-विचार किये किसी का पक्ष नहीं लेना चाहिए, क्योंकि दुनिया में सभी तरह के लोग होते है; अगर आप प्रत्येक नारी को सेष्ट एलिजावेथ बना देना चाहेंगे तो उसका परिणाम वैसा ही अनर्थपूर्ण होगा जैसा कि सभी नारियों को कैथरिन द्वितीय बनाने का।
 

पौला के प्रति आपका समर्थन, मेरे विचार से, जमेना नहीं। चलते-चलाते मैं एक बात याद दिला दूँ। शायद आप भूल गये होंगे। आप कहते हैं “जहाँ तक अपने अध्ययन और पर्यवेक्षण से आप सीख सके हैं (मास्टर रेजिनाल्ड, आपकी कल्पना के शुद्ध प्रयासों के लिए यह बुरा नहीं है), वह एक सुसम्पन्न और सम्मानित व्यक्ति-सम्भावतः किसी चर्च के उच्च पदाधिकारी की कन्या है। अवसर ने उसे तेज़ रफ़्तार की दुनिया में ला दिया और धीरे-धीरे किन्तु, अनिवार्य रूप से नैतिक पतन ने उसका पीछ किया । प्रश्न है कि उसने तेज़ रफ़्तार की ज़िन्दगी में अपने को झोंका ही क्यों ? हम सब धीमी रफ़्तार की ज़िन्दगी, धार्मिक ज़िन्दगी, राजनैतिक ज़िन्दगी, फैशन की ज़िन्दगी, खेल की ज़िन्दगी, जूए की ज़िंन्दगी तथा वीभत्स व्यभिचारिता की ज़िन्दगी में भी जोंक दिये गये हैं, लेकिन इसमें से कोई हम पर हावी नहीं होती और न तो हमें दबाव डालकर अपने में समाहित कर पाती है।

 

इससे पहले कि इनके साथ हम चल सकें, हमें चाहिए कि हम इन्हें खोज निकालें, इन्हें अपनी सहानुभूति दिखलाएँ और अपने को इनका सौहार्द्रपूर्ण साथ बना लें। अगर पौला चर्च के उच्च पदाधिकारी की लड़की थी तो उसके लिए वेश्या ही क्यों बनी.....क्योंकि वह इसी परिवेश में बढ़ती गयी इसका कोई दूसरा कारण हो ही नहीं सकता । मैं यह कहने का साहस करूँ कि आपके पिताजी वेदना के साथ अपने कुछ मित्रों को बतला रहेहोंगे कि ‘आप सत्रह वर्ष की उम्र में यथेष्ट विवेकपूर्ण थे....और आपने सिटी कार्यलय में समुचित ढंग से काम शुरू किया था....लेकिन, दुर्भाग्य से आप ‘प्लेगोअर्स क्लब’ के मंचीय आवारों के बीच फँस गये और उन लोगों ने आपको बहका कर कार्य से अलग कर दिया । धीरे-धीरे सुनियोजित ढंस से उन्होंने आपकी मनःस्थिति को विकृत कर दिया....इत्यादि।” लेकिन, आप जानते हैं कि ‘प्लेगोअर्स क्लब’ आपके पास नहीं गया, आप इसमें गये, क्योंकि इसमें आपकी रचि थी ठीक वैसी ही रुचि जैसी ‘पौला एलियन’ के कन्वेष्ट में जान की अपेक्षा, जो सम्भवतः बराबर उसकी पहुँच के अन्दर था, लेकिन वह श्री जार्मेन की नैया में चली गयी। यह सच है कि सभी औरतें धन के लए ही वेश्यावृत्ति की ओर अग्रसर होती हैं अथवा विवाह (जो वहीं बात है) रचाती है और जो औरत बहुत गरीब होती है, उसके लिए तो इस प्रकार विवाह अनिवार्य रूप से आवश्यक भी है। लेकिन सम्पन्न अथवा विपन्न स्त्रियों के यौन-सम्बन्ध में कोई अन्तर नहीं आता। फिर भी आर्थिक स्थिति पुरुष और स्त्री को मानसिक स्थिति में स्पष्ट अन्तर ला देती है।
 

प्रति सप्ताह छह पेंस की क़ीमत पर ‘सटरडे रिव्यू’ खरीदने में आपने जो कठिनाई बतलाई, उसे मैं समझता हूँ। इससे यह स्पष्ट पता चलता है कि अभी भी आप साम्यवाद के लाभ से पूर्णतः अनभिज्ञ ही हैं। ‘सेण्ड मार्टिन लेन’ के ‘चेयरिंग क्राँस’ वाले छोर पर एक निःशुल्क पुस्तकालय है जिसके तहखाने वाले कमरे में समाचार पत्र रहते हैं। आपको विशेष कुछ नहीं करना है। बस, वहाँ जाएँ और बिना किसी औपचारिकता के सभी अख़बार पढ़ जाएँ । जब यह काम सम्पन्न हो जाए, तब आप ऊपरी तल्ले पर जाकर सभी पत्रिकाएँ पढ़ ले सकते हैं। हम लोग सेण्ट पैंक्रांस से एक पुस्तकालय के लिए प्रयत्न कर रहे हैं। लेकिन, पिछले ‘चुनावों’ में हम हार गये थे। बारह मिनट के रास्ते पर ‘ब्रिटिश म्यूजियम’ का अध्ययन कक्ष शेक्सपियर से पाँच सो वर्ष अधिक वैभव-सम्पन्न है।
 

अपने लेखों के पुनर्मुद्रण के लिए में तैयार नहीं हूँ । जिस सप्ताह वे छपते हैं उस सप्ताह की घटनाओँ के सन्दर्भ में वे बहुत मनोरंजक होते हैं, लेकिन इसलिए कि पत्रकारिता के ही सन्दर्भ में वे अच्छे हैं, साहित्यिक मूल्य में स्थायित्व नहीं रहा। मैं समझता हूँ कि अभिनेत्री संचालिका भी नाटकों में कछ नया रंग ला सकती । इतनी तो स्पष्ट है कि वे वैसे नाटक पसन्द करेंगी जिनमें महिलाओं की भूमिका अच्छी हो और पुरुषों की बुरी । इसलिए यद्यपि एक की अपेक्षा दो तरह के बुरे नाटक देखने को मिलेंगे-थियेटरों की आधी संख्या में अभिनेत्री-संचालिका के नाटक और शेष आधी संख्या मे अभिनेता संचालक के नाटक।यदि सही मनोवृत्ति रही तो हम लोग सही नाटक से बहुत दूर चले जाएँगे । मेरी भूमिका का अर्थ हो रहे परिवर्त्तनों की वकालत नहीं हैं, बल्कि उनके विषय में मेरा एक विचार है।
 

मैं ग्रेन जाऊँगा और आई. टी. में गैलरी को खुला छोड़ देने के सम्बन्ध में बातें करूँगा। अगर वे सचमुच ऐसा करते हैं तो यह निन्दनीय काम है। वास्तविकता तो यह है कि दरवान अपने कार्य की अवहेलना करते हैं और अपनी ड्यूटी की छोड़ भागते हैं।
 

आपका विश्वासी

जी.बर्नार्ड शॉ

(क्रमशः अगले अंकों में )

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संपादकः जयप्रकाश मानस संपादक मंडलः डॉ.बलदेव,गिरीश पंकज, संतोष रंजन, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, कामिनी, प्रगति

तकनीकः प्रशांत रथ

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