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सृजनगाथा

 

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वर्ष-2, अंक-22, मार्च, 2008

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।। प्रसंगवश ।।

 

 

भारतीय मुसलमानों द्वारा आंतकवाद का विरोध


तनवीर जाफ़री

 

चाहे इसे एक बड़ी अन्तरराष्ट्रीय साज़िश का प्रमाण माना जाए या इसे वास्तविकता समझा जाए परन्तु हक़ीकत तो यही है कि इस समय विश्व में कहीं भी आतंकवादी घटना घटित होती है तो सहसा दुनिया का ध्यान इस्लामिक आतंकवाद की ओर ही जाता है। और जब बात इस्लामी आतंकवाद की हो तो आसानी से इसकी जड़ें इस्लामिक मदरसों से जोड़ दी जाती हैं। यह आरोप लगाया जाता है कि इस्लामी मदरसे कट्टरपंथी विचारधारा की नर्सरी का काम करते हैं। आरोप है कि मदरसों से शिक्षा ग्रहण करने वाले बच्चे बड़े होकर मौलवी अथवा अन्य पदवीधारी धर्मगुरु बनकर अपने अनुयाईयों के मध्य ऐसे विचारों का प्रसार करते हैं तथा उन्हें ऐसी धार्मिक वैचारिक सीमाओं में बाँध देते हैं जिससे कि वह लोग कट्टर विचारों को अपना लेते हैं तथा उनकी नज़र में मात्र इस्लाम ही सबसे बेहतरीन व सच्चा मज़हब रह जाता है तथा मुसलमान ही अल्लाह के सच्चे बंदे। और यही कट्टरपंथी विचारधारा अन्य धर्मों व धर्मावलम्बियों के प्रति नफ़रत का सबब बन जाती है। फिर समय पड़ने पर अथवा राजनैतिक कारणों से वातावरण में साम्प्रदायिकता फैलने पर यही वैमनस्य साम्प्रदायिक आधार पर इन्सान को इन्सान का दुश्मन बना देता है। और यही रास्ता आगे बढ़ता हुआ आतंकवाद, आतंकवादियों तथा आतंकवादी घटनाओं से जा मिलता है।

 

भारत को दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश माना जाता है। इतना ही नहीं बल्कि इस्लाम में मुसलमानों का एक विशेष वर्ग जिसे देवबंदी वर्ग कहा जाता है, उसका दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे प्राचीन केंद्र भी भारत के देवबंद क़स्बे में ही है। दारुल उलूम के नाम से प्रसिद्ध 1866 में स्थापित किया गया यह दुनिया का सबसे प्राचीन तथा सबसे बड़ा मदरसा माना जाता है। आरोप है कि इनहीं मदरसों से पढ़कर निकलने वाले तमाम धर्मगुरु आज दुनिया के कई हिस्सों में कहीं सरेआम तो कहीं लुकछुप कर मुस्लिम युवकों को पथभ्रष्ट कर उन्हें आतंकवाद के रास्ते पर चलाने का काम अंजाम दे रहे हैं। ज़ाहिर है इन परिस्थितियों में दुनिया के इस सबसे बड़े इस्लामिक मदरसे की ओर से अधिकारिक रूप से दुनिया को यह बताना ज़रूरी हो गया था कि वास्तव में दारुल उलूम देवबंद के इस्लामी आतंकवाद के संबंध में क्या विचार हैं तथा इस विषय पर वह अपना क्या नज़रिया रखता है।

 

इसी उद्देश्य से गत् दिनों दारुल उलूम द्वारा पूरे भारत के लगभग 6000 मदरसा प्रतिनिधियों का एक सम्मेलन दारुल उलूम देवबंद में बुलाया गया। इस सम्मेलन में यह घोषणा की गई कि दारुल उलूम तथा उसके अन्तर्गत आने वाले मदरसों का आतंकवाद अथवा आतंकवादियों से कोई लेना-देना नहीं है। सम्मेलन में उपस्थित मुस्लिम विद्वानों व मदरसा शिक्षकों से यह अपील की गई कि इस्लाम विरोधी तथा राष्ट्र विरोधी ताक़तों से न तो प्रभावित हों, न उसे संरक्षण देने का प्रयास करें। बल्कि जिस हद तक हो सके इसका प्रबल विरोध किया जाना चाहिए। उत्तर प्रदेश के देवबंद क़स्बे में आयोजित हुए इस सम्मेलन को भारत का अब तक का सबसे बड़ा इस्लामी सम्मेलन माना जा रहा है। इस सम्मेलन की एक और विशेषता यह भी थी कि इसमें मात्र देवबंदी विचारधारा रखने वाले इस्लामिक वर्ग के लोग ही नहीं बल्कि शिया, सूफ़ी, एहले हदीस सहित और भी कई मुस्लिम वर्गों के प्रतिनिधि आमंत्रित किए गए थे। इस सम्मेलन में पूरी दुनिया में होने वाली सभी आतंकवादी कार्रवाईयों को ग़ैर इस्लामी कार्रवाई घोषित किया गया। समस्त उपस्थित विद्वानों एवं मदरसा शिक्षकों ने हिंसा व आतंकवाद की आलोचना करते हुए एक आतंकवाद विरोधी घोषणापत्र भी पारित किया जिसमें यह घोषित किया गया है कि 'इस्लाम समस्त मानवजाति के प्रति दया दृष्टि रखने वाला धर्म है। इस्लाम में हिंसा, आतंकवाद व अत्याचार की कोई गुंजाईश नहीं है। सम्मेलन आतंकवाद जैसी ग़ैर इस्लामी गतिविधियों की घोर निंदा करता है। दंगा, फ़साद, बेगुनाहों की हत्या, किसी को धोखा देना, कमज़ोर पर अत्याचार करना आदि बातों की इस्लाम में कोई गुंजाईश नहीं है तथा यह सबसे बड़ा पाप है।'     

 

इस विशाल इस्लामिक सम्मेलन में इस्लाम की वास्तविक शिक्षाओं तथा मानवीय पहलुओं पर रौशनी डालते हुए यह बताया गया कि इस्लाम सभी मानव जाति के प्रति दयादृष्टि रखने वाला ऐसा धर्म है जो सभी इन्सानों के बीच समानता, करुणा, प्रेम व सौहार्द्र का संदेश देता है। सम्मेलन में मदरसा शिक्षकों से ऐसी सभी गतिविधियों से दूर रहने, ऐसे असामाजिक तत्वों को पनाह न देने, उन्हें बेनक़ाब करने तथा उनका विरोध करने की सलाह दी गई है। सम्मेलनकर्ता इस बात से व्यथित भी नज़र आए कि इस्लाम, आतंकवाद जैसी घटनाओं को लेकर बदनाम हो रहा है। इस सम्मेलन में अन्य मुस्लिम वर्गों के लोगों का भाग लेना भी एक अत्यन्त सकारात्मक व सराहनीय क़दम था। अनेकों ऐतिहासिक मतभेदों को लेकर अपना अलग-अलग पंथ चलाने वाले विभिन्न इस्लामिक वर्ग के लोग जो अक्सर एक दूसरे के ख़ून के प्यासे नज़र आते हैं, उन सभी मुस्लिमपंथों के प्रतिनिधियों ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने आपसी मतभेद भुलाने व एकजुट होने की भी अपील की। बेशक दारुल उलूम के इस आयोजन की तारीफ़ की जानी चाहिए। दारुल उलूम द्वारा आतंकवाद का विरोध करने के साथ-साथ वैश्विक स्तर पर मुस्लिम एकता स्थापित करने की जो बात कही गई है, वह भी दुनिया में फैले आतंकवाद में कमी लाने में सहायक सिद्ध होगी। परन्तु मदरसे की इस क़ाबिले तारींफ घोषणा व अपील के बावजूद, क्या दुनिया के इस्लामिक मदरसे अपने ऊपर लगे इन आरोपों को नकार सकेंगे कि कट्टरपंथी इस्लामिक शिक्षा का प्रचार व प्रसार अब तक उन्हीं के माध्यम से नहीं किया जाता रहा है? यदि नहीं तो मुशर्रफ़ को क्यों करना पड़ा था इस्लामाबाद में ऑप्रेशन लाल मस्जिद? किस विचारधारा से ग्रसित थे उस मदरसे के बच्चे। कहाँ से और क्यों पहुँचे थे उस मदरसे में इतने ख़तरनाक हथियार? तालिबानी विचारधारा आख़िर किस चीज़ का नाम है। कहाँ से पनपती है यह तालिबानी अथवा कट्टरपंथी इस्लामिक विचारधारा? कौन है मौलाना मसूद अज़हर या उस जैसे और ज़हर उगलने वाले कठमुल्ले? कहाँ से ग्रहण की थी इन्होंने जेहाद के नाम पर आतंकवाद फैलाने की शिक्षा?

 

इस्लाम धर्म की विशेषताओं को मुस्लिम विद्वानों द्वारा प्रचारित करने से कुछ अधिक लाभ नहीं होने वाला है। क्योंकि इसकी समानता, करुणा, दया व सद्भाव जैसी शिक्षाओं से तो मुसलमान ही नहीं बल्कि सारी दुनिया वाक़िफ़ है। परन्तु इस्लामिक विद्वानों को यह स्वीकार करने में कोई गुरेंज हरगिज़ नहीं होना चाहिए कि चाहे वह मदरसे की शिक्षा हो अथवा मदरसे जैसी मां बाप से मिलने वाली घरेलू तालीम। दरअसल इस्लाम धर्म को और वह भी इस्लाम धर्म के भीतर अपने ही पंथ विशेष को सबसे सही मार्ग पर चलने वाला बताना तथा केवल अपने ही पंथ को जन्नती (स्वर्ग का दावेदार) समझने की अवधारणा ही उनमें यह विचार अपने आप पैदा कर देती है कि उनके सिवा दुनिया का शेष समाज न तो अल्लाह वाला है न ही स्वर्ग का अधिकारी। और यही अवधारणा अन्य समुदायों के प्रति नफ़रत व अनेकों अन्य बुराईयों व मतभेदों को जन्म देती है, यहाँ तक कि आतंकवाद को भी।

 

फिर प्रश्न यह है कि क्या आतंकवाद का विरोध करने की घोषणा मात्र से अथवा इससे अपने संबंध न होने की बात कहने भर से मदरसा शिक्षकों अथवा मदरसे में पढ़ने वाले बच्चों में किसी प्रकार का मानसिक परिवर्तन देखने को मिल सकेगा, यह संदेहपूर्ण है। इसके लिए सबसे पहले इस्लाम के सभी पंथों के पंथ प्रमुखों को एकजुट होना होगा। ख़ासतौर पर शिया-सुन्नी, देवबंदी, बरेलवी, वहाबी, अहमदिया, एहले हदीस, सूफ़ी आदि सभी प्रमुखों को केवल अस्थायी रूप से नहीं बल्कि स्थाई रूप से एकजुट होने के असम्भव से लगने वाले प्रयास को सम्भव कर दिखाना होगा। उसके पश्चात क़ुरान शरींफ की उस शिक्षा को अपना मुख्य आधार बनाते हुए मुस्लिम बच्चों के मस्तिष्क में धारण कराना होगा कि जिसमें कि क़ुरान शरीफ़ ने लकुमदीन कुमे वाली दीन अर्थात तुमको तुम्हारा धर्म मुबारक और हमें हमारा जैसी इंसानों को जोड़ने वाली बात कही है।

 

प्रत्येक धर्म के सभी धर्मगुरुओं को यह बात अच्छी तरह अपने ज़ेहन में बसा लेनी चाहिए कि जब तक हम किसी भी दूसरे धर्म का सम्मान नहीं करेंगे तब तक कोई दूसरा भी हमारे धर्म का सम्मान नहीं करेगा। और नैतिक रूप से भी यदि हम किसी को आदर व सम्मान नहीं देते तो हमें आदर व सम्मान पाने का भी कोई अधिकार नहीं है। केवल यही शिक्षा इस्लाम को भविष्य में आतंकवाद के आरोपों से बचा सकती है तथा इस्लाम के सच्चे व वास्तविक स्वरूप को दुनिया के समक्ष पेश कर सकती है। अत: मुस्लिम धर्माधिकारियों का कर्त्तव्य है कि वे अपने अनुयाईयों को आतंकवाद का विरोध करने के साथ-साथ अन्य समुदायों के लोगों से भी प्रेम व सद्भाव से पेश आने उनके साथ मिलजुल कर रहने तथा उनके दु:ख सुख में, एक दूसरे के त्यौहार व उत्सव में भी शरीक होने का सबंक सिखाएं, तभी इस्लाम का मानवीय पक्ष उजागर हो सकेगा।

                           तनवीर जाफ़री

(सदस्य, हरियाणा साहित्य अकादमी, शासी परिषद)

22402, नाहन हाऊस, अम्बाला शहर, हरियाणा

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