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जीवन क्या जीया
मनु
शर्मा
सुबह
से ही बधाई के टेलिफ़ोन आ रहे हैं। आज मैंने जन्म की
पचहत्तरवीं
मंजिल छू ली। व़क्त के कैलेंडर का एक पन्ना और झड़ गया। जब
जीवन की पूँजी धीरे-धीरे
चुकती चली जा रही है तब बधाई किस बात की
?
इस बात की कि जीवन के पचहत्तर वर्ष मैंने
पूरे कर लिये,
बहुत से लोग यहाँ तक भी नहीं पहुँच पाए और काल-कवलित हो गए।
सचमुच यह
प्रसन्नता की बात है,
कम-से-कम उस देश में तो अवश्य ही जहाँ औसत उम्र सिर्फ उनसठ
वर्ष है। अवश्य मैं दूसरों की उम्र छीनकर जीया हूँ। दूसरों की
पूँजी पर डाका डाला
है।
और इस प्रदूषण के युग में,
जहाँ हवा-पानी,
नीति-राजनीति,
नैतिकता-सामाजिकता सबकुछ प्रदूषित है;
जहाँ खाने-पीने की हर वस्तु मिलावटी हो;
जहाँ
दूध भी सिंथेटिक मिलता हो।...मेरे एक मित्र ने एक दिन इस बात
की शिकायत की कि आज
रात मैं सो नहीं पाया। इस संदर्भ में उन्होंने बताया कि पूरी
रात पड़ोस में कुहराम
मचा रहा। किसी बात पर सुमेर के मझले बेटे ने ज़हर खा लिया। ऐसा
रोना-पीटना शुरू हुआ
जो भोर तक चलता रहा। डॉक्टर के आते ही एकदम स्थिति बदल गई।
उसने ज़हर की शीशी देखकर
कहा,
‘अरे,
यह तो बड़ा तेज़ ज़हर है। इसके पेट में जाते ही इसे मर जाना
चाहिए था;
पर
यह अभी भी जीवित है। दाल में कुछ काला ज़रुर है।’
बाद में पता चला कि ज़हर में
मिलावट थी,
इसीलिए वह सीली हुई आतिशबाज़ी की तरह
‘फुर्र’
से करके रह गया। उसके घर के
लोग इस मिलावट पर प्रसन्न हैं। विषहीन सर्प और अमंत्रित
ब्रह्मास्त्र उनके लिए
अवश्य ही अभिनंदित होंगे जिन पर वे आक्रमण किए जाने वाले हों।
हो सकता है,
मेरे
मित्र द्वारा बताई इस घटना का यथार्थ भी मिलावटी हो;
पर इससे तो इतना स्पष्ट हो ही
जाता है कि इस देश में अब ऐसा कवि शायद ही पैदा हो,
जो यह लिख सके कि
‘अमिय
सराहहि
अमरता गरल सराहहि मीचु।’
ऐसी स्थिति में भी मैंने जीवन के चौहत्तर वर्ष पूरे कर
लिये। मेरे मित्रों का प्रसन्न होना लाज़िमी है। पर इसी शहर
में ऐसे लोग भी हैं,
जो
जिंदगी की सड़क पर मुझसे काफी आगे निकल गए हैं। कांग्रेस के
भूतपूर्व मेयर कुंजू
बाबू तो शतक बनाने के करीब हैं। या तो हममें जिजीविषा अधिक है
या फिर बेहयाई,
जो
हममें मौत की मार खाते हुए भी ज़िंदगी का तमाशा घुसकर देखने
की ललक बनाए रखती है।
शायद इसी ललक का दूसरा नाम जिजीविषा हो।
याद आता है,
‘गीता’
में कृष्ण ने
स्वयं को
‘पीपल’
कहा है-‘अश्वत्थः
सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां नारदः।’
अर्थात्-मैं
वृक्षों में अश्वत्थ हूँ और देवर्षियों में नारद। आखिर
उन्होंने अपने लिए वृक्षों
में पीपल को ही क्यों चुना
?
वे इससे और भी गौरववाली तथा उपयोगी वृक्षों को चुन
सकते थे। वे कदंब को चुन सकते थे,
बहुतों का चीर-हरण करके उसकी डाल का आश्रय लिया
था। वे करील का नाम ले सकते थे,
उसके कुंजों में उन्होंने कैसी-कैसी रास-लीलाएँ की
थीं और स्वयं
‘कुंज-बिहारी’
की संज्ञा पाई थी। वे रसाल का नाम ले सकते थे,
जिसका फल
एक बार मुँह लग जाए तो मुँह से छूटता ही नहीं। वे देवदारु का
नाम ले सकते थे,
वह तो
देवताओं का वृक्ष ही है। फिर उन्होंने मुँडेरों पर भी उग
आनेवाले पीपल को ही अपना
प्रतिनिधि क्यों चुना
?
शायद इसीलिए कि पीपल में अद्भुत जिजीविषा है। जहाँ पड़ा
वहीं जम गया। मिट्टी अनुकूल नहीं,
परवाह नहीं। जो है उसी को अनुकूल बना लेगा,
पत्थर
को भी मिट्टी कर देगा। पानी नहीं मिला तो भी कोई फ़र्क नहीं।
जब मिलेगा तब ही लेगा।
धूप नहीं मिली तो भी चिंता नहीं। भूली-भटकी दो-एक किरणें भी आ
जाएँगी तो वही काफी
होंगी। नहीं कुछ मिलेगा तो पर्यावरण से मिलेगा ही,
उसी का स्तनपान कर वह जी
लेगा।
आप एकदम उखाड़कर फेंक दीजिए तो दो-चार दिनों बाद ही उखाड़ी हुई
दरार से
शातिर चोर की तरह झाँकता दिखाई देगा,
और जहाँ उखाड़कर फेंक दीजिए वहीं जम जाएगा।
परिस्थितियों द्वारा कृष्ण मथुरा से उखाड़कर फेंके गए तो
समुद्र के किनारे जम गए।
एक द्वारका ही बसा ली।
आज का विज्ञान कहता है कि पीपल सभी वृक्षों की अपेक्षा
अधिक ऑक्सीजन देता है। एक तो स्वयं जीने की उसकी अद्भुत शक्ति
तथा दूसरों को जीवन
प्रदान करने की उसकी क्षमता। शायद इन्हीं गुणों के कारण उसमें
कृष्ण को अपना रुप
दिखाई दिया हो।
पर मैं कृष्ण नहीं हूँ,
शायद उनका शतांश भी नहीं। फिर
मुझमें ऐसी जिजीविषा कहाँ ! जरा सा रक्तचाप बढ़ा कि घबराने
लगा। मेरी घबराहट भी
अजीब,
जिसमें मृत्यु का भय नहीं। उस कृष्ण का अनुचर मैं,
जिसने मृत्यु की
वास्तविकता बताई,
जिसने लोगों को मरना सिखाया,
मृत्यु से क्यों डरूँ। फिर भी मेरी
घबराहट में भय है जीवन की अपंगुता का।
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ और दृष्टि
जीवन के आंरभिक छोर पर पड़ती है तब एक घटना याद आती है। उन
दिनों मैं पंचगंगा घाट
के पास ही छासी टोले में रहता था। माँ पूरे कार्तिक मास गंगा
नहाती थी;
इसलिए भी कि
यह स्नानपर्व मेरे जन्म के दिन से आरंभ होता था। स्नान के लिए
मुझे भी साथ ले जाती
थी। मैं उसका प्यारा बेटा था,
चौथा या पाँचवाँ। मुझसे पहले के उसके सभी बेटे मर गए
थे। उम्र यही छह सात की रही होगी। लौटते समय पंचगंगा घाट की
ऊँची-ऊँची सीढ़ियाँ
मुझे अँगुली पकड़कर चढ़ाती थी। छह सीढ़ी चढ़ते-चढ़ते मैं थक
जाता था,
फिर वह गोद
में उठा लेती थी। एक दिन मैं बड़ा उत्साहित हुआ और छह के बाद
सातवीं सीढ़ी भी चढ़
गया। उस दिन मेरी माँ बहुत प्रसन्न हुई थी। उसने सबसे कहा था,
‘आज
मेरा बेटा एक
सीढ़ी और चढ़ गया !’...आज
जब लोग मुझे जन्मदिन की बधाई दे रहे हैं तब मुझे लगता है,
मणिकर्णिका घाट की एक सीढ़ी और उतर गया। अब कितनी सीढ़ियाँ
बाकी हैं,
पता नहीं। इस
अज्ञान के ही कारण तो अभी जीवन में रस है।
अज्ञान का सुख भी अपने ढंग का सुख है।
उसे
‘भव-भुजंग
का भय’
नहीं। वह जानता ही नहीं कि
‘भव-भुजंग’
क्या होता है,
वह कैसे
डसता है;
क्योंकि उसने
‘आदम
के ज्ञान’
का फल नहीं चखा है। जग के प्रपंच में रहते
हुए भी उससे दूर है।
‘सबसे
भल वे मूढ़ जिन्हें न ब्यापै जगत गति।’
जीवन की एक
अवस्था यह भी है। यही प्रकृत अवस्था है। इसकी वृत्ति पशु
प्रवृत्ति है,
जिसमें
इच्छाएँ सीमित हैं। भूख लगी,
जो मिला उसी पर मुँह मारा। भोग जगा मिल लिये। अपने
बिहारी लाल इसी स्थिति पर प्रसन्न हैं-
खाने को कंकड़ी भली सदा
परेवी संग।
सुखी परेवा जगत में तू ही एक विहंग।।
आप सोचते होंगे
कि मैं किस पचड़े में पड़ा। बेव़क्त की शहनाई छेड़ दी। मूसल के
ब्याह में हँसुए का
गीत गाने लगा। दरअसल मुझ पर एच.जी. गार्डनर के लेख-‘इनडिफेंस
ऑफ इग्नोरेंस’
की छाया
पड़ गई थी और मैं यह नहीं देख पाया कि यह सुख तो पशुओं का सुख
है। आदमी पशु नहीं
है। पशु से आदमी तक की विकास-यात्रा से ज्ञान की विकास-यात्रा
है। अज्ञात से ज्ञात
की यात्रा है,
प्रकृति से संस्कृति की यात्रा है-और यह संस्कृति हमारे
संस्कारों का
परिणाम है। हमारे सारे संस्कार उस गंगा से जुड़े हैं जिसकी
सीढ़ियों की अभी मैं बात
कर रहा था।
मेरे जन्म के बाद भी माँ गंगा-पूजन करने आई होगी। कर्ण-छेदन और
मुंडन के बाद भी मुझे गंगा आराधना के लिए लाया गया था। उपनयन
और विवाह के बाद भी
मेरी
‘गंगा
पुजइया’
इसी गंगा तट पर आई थी और जब अंत्येष्टि के लिए मणिकर्णिका की
अग्रिम सीढ़ी पर लाया जाऊँगा तब यही गंगा मुक्तिदायिनी होगी।
यह गंगा-धारा हमारे
सभी संस्कारों की चश्मदीद गवाह है। गंगा ही हमारी संस्कृति की
जीवन रेखा है-आज से
नहीं,
भगीरथ के समय से ही। कहते हैं,
राजा सगर के पुत्रों को तारने के लिए भगीरथ ने
घोर तपस्या की थी,
तब कहीं,
किसी तरह गंगा धरती पर आई थीं।
भगीरथ का यह प्रयत्न
निजी था,
अपने परिवार को तारने के लिए था। यह निजी कार्य आज सामाजिक हो
गया। तुलसी
का
‘स्वांतःसुखाय
परांतःसुखाय’
बन गया। इसकी मोक्षदायिनी प्रकृति के प्रति विश्वास
बढ़ता गया। राजा हरिश्चंद्र भी बिके तो इसी के किनारे एक डोम
के हाथ।... पर हमारा
ज्ञान इस अवधारणा के विपरीत पड़ता है। शोध बताता है कि राजा
हरिश्चंद्र की
ग्यारहवीं पीढ़ी में राजा भगीरथ हुए थे। जब भागीरथ ही नहीं रहे
होंगे तो कहाँ रही
होगी गंगा;
फिर राजा हरिश्चंद्र के बिकने का तो सवाल ही नहीं।
बात अटपटी
अवश्य लगती है,
पर अब तो यह
‘मिथ’
है।
‘मिथ’
तर्कातीत होता है। वह यथार्थ नहीं पर
‘यथार्थ
का भ्रम है।
‘मिथ’
मिथ्या के करीब होकर भी सत्य से अधिक
शक्तिशाली होता है,
क्योंकि विश्वास ही उसका आधार है,
उसका जीवन है।
‘मिथ’
में इतिहास को खोजना अंधे
कुएँ में पानी तलाश करना है। अरे,
कुआँ तो कुआँ है,
चाहे अंधा हो या पानीदार।
वैज्ञानिक की नज़र दूसरी है। उसका निष्कर्ष है कि आज गंगा काफी
प्रदूषित हो चुकी
है। उसका जल पीने के योग्य क्या,
स्नान करने लायक भी नहीं रहा। क्या यह प्रदूषित
गंगा मोक्षदायिनी हो सकती है
?
यदि मोक्षदायिनी होगी भी तो उसका मोक्ष भी प्रदूषित
होगा। पर यथार्थ कुछ और है और सत्य कुछ और। मोक्षदायिनी गंगा
वह नहीं जो हमें दिखाई
देती है,
वरन् वह है जो हमारे भीतर आस्था के धरातल पर बहती है,
जिसका उद्गम
गंगोत्तरी नहीं वरन किसी भगीरथ का अपराजेय तप है। उसकी धारा एक
लंबी परंपरा है,
जो
हमारे पूर्वजों से हम तक चली आई और हमारे बाद भी बहती रहेगी।
रामेश्वरम् के
समुद्र-तट पर डुबकी लगाते हुए लोगों को
‘जय
माँ गंगे’
कहते मैंने सुना है। यह इस
बात का प्रमाण है कि बाहर का पानी खारा हो या प्रदूषित,
पर हमारे भीतर की गंगा कभी
प्रदूषित नहीं होती। वह तभी प्रदूषित होगी जब हमारी आस्था
प्रदूषित होगी या उसे
सँजोकर रखनेवाला हमारा मन प्रदूषित होगा। इसी से तो रैदास कहते
हैं-‘जब
मन चंगा तो
कठौती में गंगा।’
मैं गंगा-लाभ की बात क्यों सोचने लगा,
जब टेलिफ़ोन पर लोग जीवन
की जय बोल रहे हों,
‘जीवेम
शरदः शतम्’
की कामना कर रहे हों। कुछ लोगों ने सौ वसंतों
तक जीने की भी बात कही है;
जबकि पूरा वैदिक वाङ्मय शरत् की बात करता है। लगता है,
वैदिक युग में
‘शरत्’
से ही वर्ष आरंभ होता था। बाद में इस कृषि-प्रधान देश में
वर्षा से वर्ष का आरंभ होने लगा। वर्षा से आरंभ होने के कारण
ही इस कालावधि को
‘वर्ष’
की संज्ञा मिली। विक्रम संवत् चैत्र मास से अवश्य आरंभ होता है,
पर वसंत से
उसका कोई संबंध नहीं।
यों वसंत और शरत् दोनों संधि ऋतुएँ हैं। वसंत शिशिर
की हिमानी शीत से ठिठुरी प्रकृति के मुक्ति का उल्लास है,
जो फूलों में विहँस पड़ता
है तो शरद वर्षा से उद्वेलित और गदराई वारि-धाराओं को पागलपन
तथा कीचड़ व गँदलेपन
से धरती की मुक्ति की उज्ज्वलता है,
जो आकाश से लेकर घर-आँगन तक दिखाई देती है।
किसी युग में जब आवागमन के आज जैसे साधन नहीं थे तब चौमासे की
समाप्ति पर यात्राएँ
आरंभ हो जाती थीं,
जीवन गतिशील हो जाता था। हम शक्ति की आराधना में लग जाते हैं।
बँगला के
‘कीर्तिवासी
रामायण’
के अनुसार राम ने भी शक्ति की आराधना की थी और उसी
अपराजेय शक्ति से उन्होंने रावण का वध किया था। यही कथा निराला
की
‘राम
की शक्ति की
पूजा’
का आधार बनी।
वसंत में काम भस्म हुआ था और शरत् में रावण। काम भस्म होने
के बाद अनंग होकर हममें जीवित है। लगता है,
रावण भी अनंग होकर हममें जीवित है और आज
भी सज्जनों को त्रासित करता है। मेरे एक मित्र कवि की यही
मुख्य चिंता है-‘घर-घर
रावण,
घर-घर लंका,
इतने राम कहाँ से लाऊँ
?’
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