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सृजनगाथा

 

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वर्ष-2, अंक-22, मार्च, 2008

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।।ललितनिबंध।।

 

 

मेरी पहली कविता


अज्ञेय

 

क खिलौना होता है जिसे फिरकी या फिरकनी या भँवरी कहते हैं। यह लट्टू की ही जाति का होता है-अन्तर इतना कि लट्टू लत्ती से घुमाया जाता है और यह चुटकी से। पंजाब की तरफ इसे भमीरी या भुमीरी कहते हैं। भँवरी की तरह ही ये शब्द भी भ्रम् धातु से निकले हुए है। अब तो विलायती गाने वाले लट्टुओं और प्लास्टिक की चकई ने इस का स्थान ले लिया, लेकिन मेरे बचपन में शहरों में भी फिरकनियों का अपना स्थान था। लकड़ी के रंगीन गेंद-बल्ले से कुछ ही कम महत्त्व पीली या लाल रंगी हुई, खराद की लकड़ी की फिरकनी का होता था-और उस पर बने हुए फूलों की डिजाइन पसन्द करने में बच्चों का बड़ा समय और मनोयोग ख़र्च होता था !
 

यहाँ तक पढ़ते-पढ़ते पाठक सोचने लगेगा कि इस पारिभाषिक ऊहापोह और संस्मरण का मेरी पहली कविता से क्या सम्बन्ध है ? बड़ा घनिष्ठ सम्बन्ध है, जैसा कि अभी प्रकट हो जाएगा ! लेकिन वह बताने से पहले मेरे अपने मन में जो सन्देह होता है उसी का पहले निवेदन कर देना चाहिए स्वयं कविता का ही कविता से क्या सम्बन्ध है ? क्योंकि बिना इस का निबटारा किये यह कैसे बताया जा सकता है कि मेरी आरम्भ की तुकबन्दियों में से या बिना तुक की लयमुक्त पंक्तियों में से-किसे कविता माना जाय ? और ऐसी भी तो अनेक रचनाएँ होंगी, जिन्हें कविता मानने की मूर्खता की थी और जिन का अब स्मरण करते भी झेंप लगती है ? इसी लिए बात को मैं यहाँ से आरम्भ करना चाहता हूँ कि कविता के सम्बन्ध में मेरी क्या धारणा कैसे बनी-शब्द का सार्थक, साभिप्राय, रसात्मक प्रयोग किया जा सकता है, यह सम्भावना कैसे मेरे मन में उदित हुई, और इसी बात का भँवरी से-या उस के पंजाबी नाम भुमीरी से-गहरा सम्बन्ध है।
 

मैं तब शायद चार साल का था-कम से कम पाँच साल से अधिक का तो नहीं था जब की बात है-क्योंकि लखनऊ की बात है जो मैं ने पाँच वर्ष की आयु में छोड़ दिया था। कोई सम्बन्धी बाहर से आ कर हमारे यहाँ ठहरे थे। हम बहन-भाइयों के लिए खिलौने लाये थे। मुझे एक फिरकनी मिली। उस का नाम मैं नहीं जानता था, उन्होंने बताया-भुमीरी। मैं उसे बरामदे में ले गया और चुटकी से जैसे उन्होंने बताया था उसे घुमाने लगा। दो एक बार तो वह दो-चार चक्कर काट कर ही लुढ़क गयी। पर इतने में उस का गुर मैंने पहचान लिया, और फिर तो वह झूमती हुई देर तक घूमने लगी। कौन बच्चा ऐसी विजय पर प्रसन्न न होगा ? मैं भी उस के चारों ओर नाचने लगा।
 

लेकिन नाचना भी काफी नहीं मालूम हुआ-तब मैंने ताली दे-दे कर चिल्लाना शुरु किया-नाचत है भूमिरी ! छन्द की गति के कारण अनायास ही भुमीरी को भूमिरी बन जाना पड़ा। लेकिन दो-तीन बार पुकार कर ही मैं सहसा रुक गया। चौंक कर मैंने जाना कि जो बात मैं कह रहा हूँ उस से वास्तव में अधिक कुछ कह रहा हूँ-नाचत है भूमिरी-मेरी भुमीरी नाचती है। सो तो ठीक लेकिन अरी, भूमि भी तो नाचती है-नाचत है भूमि री, ! मन ही मन इस द्वयर्थक वाक्य को मैंने फिर दुहराया। सच तो ! वह मेरी भूल नहीं है- वाक्य सचमुच दो अर्थ देता है-उस में चमत्कार है ! और फिर मैंने दूने जोर से चिल्लाकर और नाचकर, ताली दे कर गाना शुरू किया-नाचत है भूमिरी, नाचत हैं भूमि री ! इस से आगे शब्द नहीं मिले, पर उस समय मैंने जाना कि मेरी भँवरी ही नहीं, भूमि भी नाचती है-सारा विश्व ब्रह्माण्ड नाच रहा है-मैं आविष्कारक हूँ स्रष्टा हूँ !

 

मैंने शब्द की शक्ति को पहचान लिया है, पहचान ही नहीं स्वायत्त कर लिया है-और शब्द ही तो आद्या है। इन द बिगिनिंग वाज़ द वर्ड, एण्ड द वर्ड वाज़ गॉड (आदि में शब्द था और शब्द ही ईश्वर था)....
 

पाठक हँस सकता है। आज मैं भी हँस सकता हूँ। लेकिन इस बोध से उस दिन जो रोमांच हो आया था, उस की छाप आज भी मुझ पर है-और उस दिन से मैं कभी नहीं भूला हूँ कि शब्द शक्ति का रूप है, कि शब्द का सार्थक प्रयोग सिद्धि है। इस लिए, मेरी पहली कविता कौन-सी थी, इस प्रश्न के उत्तर में यह बाल्यकालीन अनुभव प्रांसगिक तो है ही, भले ही वह वाक्य कविता न रहा हो इसीलिए मैंने जिज्ञासा की थी कि कविता का ही कविता से सम्बन्ध है !
 

अनुप्रास और लय-इन की पहचान अपेक्षया सहल भी होती है, सहज भीः अबोध शिशु लोरियाँ सुन कर ही इन तत्त्वों को पहचानने लगता है। और इन के बोध में अभिभूत करनेवाला वह तत्त्व नहीं होता जो शब्द की अर्थ-बोधन क्षमता को पहचानने से होता है-वह एक दूसरी ही कोटि का बौद्धिक आनन्द है..
 

कुलपरम्परानुकूल मेरी पढ़ाई रटन्त से आरम्भ हुईः गायत्री-मन्त्र और अष्टाध्यायी के साथ-साथ मुझे अपने वयोवृद्ध गुरु की स्नेहभरी पण्डिताऊ गालियाँ भी अभी तक याद हैं। लेकिन प्रबुद्ध-चेता पिता नेस्वौजसमौट्छष्टाभ्यांभ्यस्...ङसोसाम्ङिओस्सुप् की रटाई के साथ-साथ अँगरेजी की मौखिक शिक्षा भी आरम्भ करवा दी थी, और अक्षर ज्ञान से पहले ही मैं दो-ढाई सौ अँग्रेजी शब्द सीख कर वह भाषा वैसे बोलने लगा था जिसे फर्र-फर्र अँग्रेजी कहते हैं। हमारा दुर्भाग्य था कि हिन्दी में बाल-साहित्य तब लगभग नहीं थी-अब भी कुछ बहुत या अच्छा हो ऐसा नहीं है। तो अँग्रेज़ी तुक से प्रेरणा पा कर अँग्रेज़ी के सहारे ही लोगों को चिढ़ानेवाली कुछ तुकबन्दियाँ भी की थीं-और एक-आध बार बड़ों की इस अवमानना के कारण दण्ड भी पाया था। स्पष्ट है कि इन्हें कविता नहीं कहा जा सकता-लेकिनवागर्थसम्पृक्ति के ज्ञान के बाद अगला कदम तो छन्द : परिचय ही है !
 

यह छठे वर्ष की बात है। इस के बाद न जाने क्यों कई वर्षों का अन्तराल है, जिसमें और बहुत-कुछ जाना-सीखा बहुत-सी दिशाओं में आगे बढ़ा, पर कविता से कुछ परिचय बढ़ा हो ऐसा याद नहीं पड़ता। ग्यारहवें वर्ष में एक ओर टैनिसन की कविता से परिचय हुआ, तो दूसरी ओर असहयोग के पहले दौर से और तत्कालीन प्रिंस ऑफ वेल्स को भारत-यात्रा के बहिष्कार के आन्दोलन से। इसी समय दयानन्द की गंगा को लक्ष्य कर के लिखी हुई उदबोधनात्मक कविता भी पढ़ी...

 

गंगा उठो कि नींद में सदियाँ गुज़र गयीं,
देखो तो सोते-सोते ही बरसें किधर गयीं।

 

इन सब की सम्मिलित प्रेरणा से मैंने भी गंगा की एक स्तुति लिखी थी जो अनन्तर गंगा मैया को ही भेंट चढ़ गयी। वह मुझे स्मरण होती तो पहली कविता के नाम पर कदाचित् उसी का उल्लेख उचित होता-किन्तु एक तो यह अँग्रेज़ी में थी, दूसरे कविता याद न होने पर भी इतना तो याद है कि इस के छन्द पर, भाषा पर, शैली पर, टेनीसन की गहरी छाप थी !
 

इन्हीं दिनों पिता के साथ उटकमंड चला गया। मैं स्वभाव से भी एकान्तप्रिय था, और परिस्थितियाँ भी अकेला रखती आयी थीं-पर उटकमंड से तीन मील दूर फर्नहिल नामक स्थान के एक बँगले में रहकर तो मानो एकान्त में डूब ही गया-यद्यपि प्रकृति के स्पन्दन-भरे एकांत काल में मैंने पहले चित्र संग्रह करना शुरू किया अवनीन्द्रनाथ ठाकुर और उन के नव-बंग सम्प्रदाय की शिष्य परम्परा के चित्र-और उन के एलबम बनाये। यहीं एक दिन सहसा पाया कि मैंने एक हस्तलिखित पत्रिका निकाल दी-आनन्द बन्धु’ ! और इस पत्रिका में पहले पृष्ठ पर कविता से ले कर अन्त में सम्पादकीय के बाद चित्र-परिचय तक सब-कुछ था-जैसा कि उस से पहले के वर्षों की सरस्वती में हुआ करता था-स्वर्गीय महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पादकत्व में ! पहले अंक में तो कविता के नाम पर गुप्तजी की

 

नीलाम्बर-परिधान हरित पट पर सुन्दर है।

 

वाली स्वदेश-वन्दना दी गयी थी, पर दूसरे अंक में समझ में आने लगा कि इस प्रकार उद्धृत सामग्री देना सम्पादन कला के विरुद्ध है। दूसरे अंक में बड़े भाइयों से भी सामाग्री प्राप्त की : एक ने तो ड्यूमा के काउंट ऑफ मांटेक्रिस्टो के आधार पर हिन्दीं धारावाही कथा की पहली किस्त दी, दूसरे ने उस समय याद नहीं क्या। पर कविता उस अंक में मेरी हो गयी। यह भी मुझे याद नहीं है; पर उन्हीं दिनों शिव प्रसाद गुप्त की पृथ्वी-प्रदक्षिणा निकली थी, जिस में अमरीका के न्यागरा प्रपात को दी गयी कन्या-बलि का उल्लेख थाउसी कहानी से प्रभावित होकर उसी पर कविता लिखी गयी थी....आनन्द बन्धु का पहला अंक तो बहन-भाइयों ने ही देखा था, दूसरा पिताजी ने भी : उन से इस कविता पर मुझे पाँच रुपये पुरस्कार मिले थे। इस पूँजी पर अगले चार वर्ष तक आनन्द-बन्धु चल सका...मेरे सम्पादन के अनुभव में कदाचित् यही सब प्रीतिकर है, उसके बाद न तो कभी...मेरे सम्पादन के अनुभव में कदाचित् यही सब प्रीतिकर है, उसके बाद न तो कभी इतना कम खर्च हुआ, न इतनी बालानशीनी नसीब हुई !
 

इन्ही दिनों गुप्त जी की कविता के अतिरिक्त मुकुटधर पाण्डेय, श्रीधर पाठक, ‘हरिऔध’, रामचरित उपाध्याय और आरा के प्रेमयोगी देवेन्द्र की कविता से परिचय हुआ। इन सबसे छन्दों के बारे में कौतूहल बढ़ा। रोला और वीर तो हिन्दी के अति परिचित छन्द हैं, जिनसे कौन हिन्दी कवि बचा होगा; और गुप्तजी की कृपा से हरिगीतिका और गीतिका पर भी हाथ साफ करने का साहस हुआ। लेकिन कुछ संस्कृत छन्दों ने भी आकृष्ट किया। हरिऔध की यशोदा का विलाप पढ़ कर मैंने मालिनी छन्द में कई एक विलाप लिखे थे राधा का, प्रवत्स्यत्पतिका वीर-वधू का इत्यादि। मन्द्रकान्ता तब इतना अच्छा नहीं लगा था जितना बाद में लगने लगा, पर शिखरिणी पर मैं मुग्ध थाविशेष कर पिता जी के पढ़े हुए महिम्नस्तोत्र के कारण। लेकिन ये छन्द कभी मुझसे सधे नहीं, और पीछे बरवै के आकर्षण में अपनी असफलता का दुख भी फूल गया।
 

आनन्द-बन्धु के कुछ अंक अभी मेरे पास हैं। जब कॉलेज आया तो कालेजी विद्यार्थी की नयी अहंमन्यता के कारण मैंने कई अंक नष्ट कर दिये, केवल कुछ एक रखे जो अच्छे समझे। बाद में कई वर्ष बाद उन्हें फिर देखा तो कुछ ऐसे कौतूहलप्रद लगे कि फिर रख ही छोड़े इन में एक और अंक में एक रचना पर पिताजी के बन्धु रायबहादुर हीरापाल से पुरस्कार मिला था-लेकिन यह रचना गद्य-पद्यमयी थी, और इस में अपने ही परिवार के सब लोगों का कौतुकपूर्ण परिचय दिया गया था। आनन्द-बन्धु का पाठक-वृत्त पीछे काफी बढ़ गया था-और वह दो भाषाओं में निकलने लगा था-अँग्रेज़ी अंश तो टाइप भी हो जाता था, इन पाठकों में पिताजी के कुछ मित्र और सहयोगी भी थे, जिन की समालोचनाओं से मुझे बड़ी सहायता मिली।
 

कहानी तो इन दिनों तक एक छप भी चुकी थीइलाहाबाद की एक बालचर-पत्रिका सेवा में, पर कविता पहले-पहल लाहौर में अपने कॉलेज की पत्रिका में छपी। यह जिस समय लिखी गयी, उस समय मैं अंगरेज़ी गीतांजलि के प्रभाव में उसी ढंग के रहस्यवादी गद्य-गीत भी लिखने लगी थाजौ दैव-कृपा से कभी छपे नहीं और मेरे जेल प्रवास के दिनों न जाने कहाँ खो-खो गये। लेकिन तुक-तालयुक्त कविताएँ उन्हीं दिनों छपी थीं। पहली कविता अब चिन्ता में संग्रहीत है, और मन होता है कि स्वयं न बता कर लोगों से पूछा करूँ, ‘बताइए, वह कौन-सी होगी ? जैसे टेनिसन मॉड कविता की पँक्तियाँ

 

वर्ड्स इन द हाइ हॉल गार्डन
वेयर क्राइंग एण्ड कालिंग
मॉड, मॉड, मॉड, मॉड,’
दे वेयर क्राइंग एण्ड कालिंग

 

सुना कर पूछा करते थे—‘बताइए तो कौन पक्षी थे वह ?’...लेकिन बता ही दूँ