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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-22, मार्च, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। कविता ।।

 

 

एक बूढ़े की ज़िद


कुशेश्वर

 

बच्चा जब तक

समझदार न हो जाए

भूख मिट जाने के बाद

उसकी पहली पसंद हो जाती है - खिलौना

 

आदिकाल से आज तक

प्रकृति ने रचा है खेल

खेल ने जनम दिया - खिलौना

 

कभी लोरी

कभी खिस्सा

कभी नाटक

बनते रहते हैं

खिलौना का हिस्सा

इसीलिए माँ से नानी

बाप से दादा तक

जुड़ता रहता है सिलसिला

खेल-खिलौनों का

 

लोग कहते हैं -

आदमी जब बूढ़ा हो जाता है

बच्चा हो जाता है

अब मैं क्या करूँ

मेरा एक बूढ़ मुझसे ज़िद करता है

वह खेलेगा

उसे कविता का खिलौना लाकर दूँ ।

                      कुशेश्वर

पी-166/ए, मुदिलायली, फ़र्स्ट लेन

               कोलकाता (प.बं.) - 270004

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हिंदी कविता

अशोक गुप्ता

-  केशव शरण

-  हरकिशोर दास

- बद्रीनारायण

- कुशेश्वर

 

 

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