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दो कविताएं
केशव
शरण
न
आता इधर तो
न आता इधर तो
कैसे देख पाता
दूर-दूर तक फैली हरी-भरी धरती
और गायें दूब चरतीं
न आता इधर तो
कैसे जुड़ाते ये नयन
कैसे नहाता
दूध से मन ।
पास जा कर
कनेर के फूलों जितनी बड़ी ही चिड़िया है
कनेर के फूलों के रंग की ही चिड़िया है
इसलिए लगता है कि कनेर का फूल
एक डाल से दूसरे डाल पर फुदक रहा है
चमत्कृत आँखों का
सत्य से सामना होता है पास जा कर
जब कुछ फूल उड़ चलते हैं पंख फड़फड़ा कर
केशव
शरण
एस 2
/ 564,
सिकरौल
वाणारासी
(उ.प्र.) -
2

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