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सृजनगाथा

 

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वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-22, मार्च, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। कविता ।।

 

 

दो कविताएं


केशव शरण

 

न आता इधर तो

 

न आता इधर तो

कैसे देख पाता

दूर-दूर तक फैली हरी-भरी धरती

और गायें दूब चरतीं

 

न आता इधर तो

कैसे जुड़ाते ये नयन

कैसे नहाता

दूध से मन ।

 

पास जा कर

 

कनेर के फूलों जितनी बड़ी ही चिड़िया है

कनेर के फूलों के रंग की ही चिड़िया है

इसलिए लगता है कि कनेर का फूल

एक डाल से दूसरे डाल पर फुदक रहा है

 

चमत्कृत आँखों का

सत्य से सामना होता है पास जा कर

जब कुछ फूल उड़ चलते हैं पंख फड़फड़ा कर

                      ेशव शरण

एस 2 / 564, सिकरौल

                  वाणारासी (उ.प्र.) - 2

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हिंदी कविता

अशोक गुप्ता

-  केशव शरण

- हरकिशोर दास

- बद्रीनारायण

- कुशेश्वर

 

 

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