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तीन कविताएं
अशोक
गुप्ता
रेल्वे स्टेशन पर
मैं कंपार्टमॅन्ट के अन्दर हूँ
एक कोहनी खिडक़ी पर टिकाए
तुम बाहर प्लॅटफॉर्म पर खडी हो
मेरी पसंद
की नीली साड़ी
पहने
लगता है मैं फिर बारह साल का हूँ
बोर्डिंग
स्कूल की ट्रेन में
डरा हुआ,
गले में दुखती गाँठ
लिए
एक भयानक दुःस्वप्न की जकड़
में
तुम ट्रेन चलने का इंतजार कर रही हो
अपनी घड़ी
दो बार देख चुकी हो
मैं नज़र
बचाकर आँसू
पोंछता हूँ
वह तुम्हारा इंतजार कर रहा होगा
स्टेशन के बाहर
कि तुम कार में बैठो
और चैन की साँस
ले कर कहो
''वह
चला गया आखिरकार''
पागल भिखारी
बाहर शोर हो रहा था
भीड ज़मा हो गई थी
सडक़ पर एक भिखारी
या एक पागल,चिथडों
में
पडा था
क्या हुआ
?
सब पूछ रहे
थे
कैसे मरा
?
क्या कार से टक्कर हुई
?
किसी बदमाश ने मारा
?
या ड्रग की बहुतायत
?
क्या प्यार मे पागल हो गया
?
''नहीं
नहीं
! “
उसका साथी बोला
''वह
ख़ामोशी थी''
वह अंत
तक चीखता रहा
“कुछ
कहो
!
भगवान के लिए
कुछ कहो
!
कुछ भी
!”
भाग अमीना भाग
(गुजरात
2002 नरसंहार जब
2000 लोगो मारे गए 300
महिलाओं का बलात्कार किया गया और
22000 लोग बेघर हुए
)
मरे हुए लोगों को कभी भी आराम नहीं,
खासकर रात को
कभी मैं ऊपरी मंज़िल
पर उनको चलते सुनती हूँ
दरवाज़ों
के कुंडे लगाते,
फर्नीचर
खिसकाकर
दरवाज़े
पर बैरिकेड बनाते
मैं सो नही पाती हूँ
कभी-कभी
गहरी ख़ामोशी
होती है
नारंगी रंग की सन्नाहट
सिर्फ़
चरमराहट की आवाज़
और जलने की बदबू
एकाएक वे चिल्लाने लगते हैं
''भाग
अमीना भाग
!“
मैं उनको समझाती हूँ
कि भीड क़ई सालों पहले चली गई
मुझे अब दर्द भी नहीं होता
और वे मर चुके हैं
पर वे चीखते जाते हैं
''वो
आ रहे हैं
भाग अमीना भाग
!
“
अशोक गुप्ता
7, केवल
अपार्टमेंट्स, शुभनापुरा
बड़ोदरा,
गुजरात - 390023
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