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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-22, मार्च, 2008

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।। कविता ।।

 

 

तीन कविताएं


अशोक गुप्ता

रेल्वे स्टेशन पर

 

मैं कंपार्टमॅन्ट के अन्दर हू

एक कोहनी खिडक़ी पर टिकाए

तुम बाहर प्लॅटफॉर्म पर खडी हो

मेरी पसंद की नीली साड़ी पहने

 

लगता है मैं फिर बारह साल का हू

बोर्डिंग स्कूल की ट्रेन में

डरा हुआ, गले में दुखती गाठ लिए

एक भयानक दुःस्वप्न की जकड में

 

तुम ट्रेन चलने का इंतजार कर रही हो

अपनी घड़ी दो बार देख चुकी हो

मैं नजर बचाकर आसू पोंछता हू

वह तुम्हारा  इंतजार कर रहा होगा

 

स्टेशन के बाहर

कि तुम कार में बैठो

और चैन की सास ले कर कहो

''वह चला गया आखिरकार''

 

पागल  भिखारी

 

बाहर शोर हो रहा था

भीड ज़मा हो गई थी

सडक़ पर एक भिखारी

या एक पागल,चिथडों में

 

पडा था

क्या हुआ ? सब पूछ रहे थे

कैसे मरा ?

 

क्या कार से टक्कर हुई ?

किसी बदमाश ने मारा ?

या ड्रग की बहुतायत ?

क्या प्यार मे पागल हो गया ?

''नहीं नहीं ! “ उसका साथी बोला

''वह ख़ामोशी थी''

वह अंत तक चीखता रहा

कुछ कहो ! भगवान के लिए कुछ कहो !

कुछ भी !”

 

भाग अमीना भाग

(गुजरात 2002 नरसंहार जब 2000 लोगो मारे गए 300 महिलाओं का बलात्कार किया गया और 22000 लोग बेघर हुए  )

 

मरे हुए लोगों को कभी भी आराम नहीं, खासकर रात को

कभी मैं ऊपरी मंज़िल पर उनको चलते सुनती हूँ

दरवाज़ों के कुंडे लगाते, फर्नीचर खिसकाकर

दरवाज़े पर बैरिकेड बनाते

मैं सो नही पाती हू

 

कभी-कभी गहरी ख़ामोशी होती है

नारंगी रंग की सन्नाहट

सिर्फ़ चरमराहट की आवाज़

और जलने की बदबू

एकाएक वे चिल्लाने लगते हैं

''भाग अमीना भाग !

 

मैं उनको समझाती हू

कि भीड क़ई सालों पहले चली गई

मुझे अब दर्द भी नहीं होता

और वे मर चुके हैं

पर वे चीखते जाते हैं

''वो आ रहे हैं

भाग अमीना भाग !

    अशोक गुप्ता

7,  केवल अपार्टमेंट्स, शुभनापुरा

                                 बड़ोदरा, गुजरात - 390023

                           ◙◙◙

 

हिंदी कविता

- अशोक गुप्ता

केशव शरण

- हरकिशोर दास

- बद्रीनारायण

- कुशेश्वर

 

 

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