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जैसी प्रकृति होगी, वैसा ही वह अपनी परंपरा से ग्रहण करेगा
ललित
निबंधकार रंजना अरगडे से सृजनगाथा की बातचीत
प्रश्न-1 आपकी
रचनाधर्मिता का प्रेरक तत्व क्या है?
ललित निबंध के
साथ कई विडंबनाएँ रही हैं- अल्पसंख्यक पाठक,
प्रकाशन हेतु
पत्रिका संपादक का अपना पूर्वाग्रह,
समीक्षकों एवं
कतिपय महापुरुष साहित्यकारों की घनघोर उपेक्षा । इतनी सारी
चुनौतियों के बावजूद आप ललित निबंध से कैसे जुड़े ?
उत्तर
-कोई
बात, कोई विचार-श्रृंखला जिसका संबंध या तो दिल में कहीं गहरे
कोई बात बार-बार कोंच रही हो उसके साथ हो, कोई ऐसी सामाजिक,
राजनैतिक कारणों से बनी स्थितियाँ, कुछ भी रचनाधर्मिता का
प्रेरक तत्व हो सकता है। मेरी रचनाधर्मिता के के प्रेरक तत्व
भी यही हैं। जिस बात को आप दिल से कुबूल कर लेते हैं उनके लिए
अगर चुनौतियों का सामना भी करना पड़े तो चुनौतियां आसान हो
जाती हैं। यह एक हक़ीकत है कि रचनात्मक साहित्य, समीक्षा के
कारण जीवित नहीं है। कोई भी रचना अपने आंतरिक कारणों से ही
टिकती है। हाँ, इस दौर में जब सब कुछ बाज़ार के पैमाने से ही
मापा जा रहा है, तब हमें ऐसा लग सकता है कि हमारे साथ न्याय
नहीं हो रहा है। जब इस बात को मैं, रंजना अरगड़े, जानती हूँ
और समझ चुकी हूँ कि मेरी रचनात्मक अभिव्यक्ति की विधा निबंध ही
है, तो मेरे लिए इस बात का अर्थ नहीं है कि मैं उसे छोड़ कर
कुछ और लिखूँ।यों भी एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में
अल्प-संख्यकों को तो संघर्ष करना ही पड़ता है। बस, हम तो केवल
इतना ही चाह सकते हैं कि साहित्य की इस व्यवस्था में हम लोग
अल्प-संख्यकों की राजनीति में न पड़ जाएं।
02. आप अपने
ललित निबंधों को अन्य ललित निबंधकारों से कैसे भिन्न देखती हैं
? आपके
ललित निबंध लेखन का मूल प्रतिपाद्य क्या है ?
उत्तर-
इस पर मैंने
अभी सोचा नहीं है। पर हाँ, मैं खुद जिस तरह और जितनी औरों से
भिन्न हूँ, उतने ही मेरे निबंध भी होंगे, ऐसा माना जा सकता है।
हाँ, इतना अवश्य मैंने अनुभव किया है कि मेरी रुचि प्रायः
वर्णनों में नहीं रहती। मैं औरों की रचना-प्रक्रिया तो नहीं
जानती, पर जहाँ तक मेरा प्रश्न है, निबंधों में, मैं विचार को
अवश्यक तत्व मानती हूँ, पर वे मेरी रचना-प्रक्रिया में आते
हैं, एक कविता की तरह।
03. ललित
निबंध को आप किन शब्दों में परिभाषित करना चाहेंगी
? कोई इसे
व्यक्तिव्यंजक निबंध कहता है,
कोई रम्य रचना ।
आपका व्यक्तिगत अभिमत क्या है ?
हाँ उसका
चारित्रिक वैशिष्ट्य के बारे में भी बतायें कृपया ।
उत्तर-
परिभाषा देना
तो कठिन है। हाँ, उसे कुछ विस्तार से समझाया जा सकता है। जब
बिना किसी लाग-लपेट, सीधे-सीधे कुछ कहना है, जब सत्य को कथा
विन्यास में न छिपाना हो, जब अपनी या समाज की बात को कहने के
लिए अभिनिवेश की आवश्यकता न हो, न ही किसी मंच की, जब भाषा ही
आपका व्यक्तित्व हो, जब भाषा ही कथन हो, कथा हो, जब
भाषा ही सौन्दर्य विधान हो, तब जो लिखा जाएगा वह निबंध
होगा।
अंग्रेज़ी
के पर्सनल एसे शब्द के प्रयोग के कारण इसे व्यक्तिव्यंजक निबंध
कहा जाता है। आधुनिक निबंध का स्वरूप भी तो वहीं से आता है।
हजारीप्रसाद जी ने भाषा तथा शैली की रम्यता को निबंध लेखन में
शामिल किया और उसको ध्यान में रख कर रम्य या ललित शब्द का
प्रयोग किया। हमारे यहाँ जितने भी निबंध लिखे गए उनमें से अनेक
रम्य भी हैं, अनेक व्यक्तिव्यंजक भी हैं। और फिर हमारे यहाँ तो
विद्वान उसी को कहा जाता है जो सीधी बात को उलझा कर रख दे।
निबंध में एक सबसे बड़ी बात यह है कि उसमें सर्जनात्मक विचार
होना चाहिए। जो जीवित हो और विकासशील भी।
04.
हिन्दी ललित निबंधों की परंपरा को आप किस रूप में देखती
हैं ?
उत्तर-
इस प्रश्न का
उत्तर तो एक पूरे लेख की अपेक्षा रखता है। परंतु संक्षेप में
कहें तो भारतेन्दु तथा द्विवेदी युगीन निबंधों में
व्यक्तिव्यंजकता का भाव अधिक था। शुक्लजी ने उनकी प्रकृति को
अधिक विचारात्मक बना दिया। गुलेरी जी के निबंधों में जो
संस्कृति का तत्व था उसकी ललित अभिव्यक्ति का विकास
हजारीप्रसाद जी के यहाँ दिखाई पड़ता है। फिर वही एक तरह से
हिन्दी निबंधों की पहचान बन गया। उसमें लोक-तत्व को शामिल करने
का काम विद्यानिवास जी ने किया। जो बाद में चल कर कुबेरनाथ राय
में भी दिखाई पड़ता है। पर हजारीप्रसादजी तथा विद्यानिवासजी के
निबंधों में जो सहजता और सरलता थी, वह कुबेरनाथजी में नहीं
मिलती। उसके बाद के निबंधकारों में प्रायः इन्हीं परंपराओं को
हम देख सकते हैं। हाँ, नए निबंधकारों में उदयन वाजपेयी अवश्य
अलग हैं। उनमें स्मृति तथा वर्तमान भावबोध की छायाएं दिखाई
पड़ती हैं। वे अलग इस मायने में हैं कि वे पुनः एक नए कलेवर
में व्यक्तिव्यंजकता को बोध देते हैं। रामचंद्र शुक्ल, तथा
हजारीप्रसादजी इतिहासकार होने के नाते उनमें एक विद्वत्ता भी
दिखाई पड़ती है। फिर उद्धरण आदि के कारण भी बहुश्रुतता का बोध
होता है। इससे निबंधों के लिए एक अन्य रास्ता भी खुला।
05. निबंध और
ललित निबंध के मध्य आप विभाजन की कैसी रेखा खींचना चाहेगे
?
उत्तर-
जहाँ भाषा का
लालित्य है, वहाँ ललित निबंध बनते हैं। जहाँ ऐसा नहीं है वहाँ
मात्र निबंध बनते हैं। असल में शुक्ल-पूर्व तथा शुक्लजी के
निबंधों से अपनी अभिव्यक्ति को अलगाने के लिए निबंधों को
व्याख्यायित करने और पहचान देने के लिए ललित निबंध का नामकरण
ज़रूरी था, ऐसा मेरा मानना है। फिर कथेतर तथा
विचारात्मक(समीक्षात्मक) लेखन से अन्य लेखन को ललित लेखन कहने
की मराठी में परंपरा है ही। हाँ, पर वहाँ हल्के-फुल्के ढंग से,
परन्तु गंभीर बात के लिए वैसा कहते हैं।
06. ललित
निबंधकार होना नास्टेलजिक होना भी होता है । प्रगतिकामी (?)
आलोचकों के
प्रश्न पर आपका जबाब क्या होगा ?
उत्तर- देखिए
मेरा मानना तो यह है कि हर बार, हर प्रश्न का, हरेक को जवाब
देना ज़रूरी नहीं है। बहुत सारे उत्तर तो समय ही दे देता है।
असल में लेखक जब तक आलोचकों के लिए लिखेगा तब तक उसके सामने यह
प्रश्न रहेगा ही। मैं यह मानती हूँ कि जब लेखक अपनी बात कहेगा
तभी वह पढ़ा भी जाएगा। समझ और विचार तो पाठक के पास भी विपुल
मात्रा में होते ही हैं। पर लेखक उसे इस तरह लिखता है कि कई
बार उसके लिखने के ढंग से ही उसमें नए अर्थ पैदा हो जाते हैं।
यही बात पाठक को आकृष्ट करती है। फिर विचार की अपनी परंपरा है।
और निश्चित ही इस परंपरा का हमारे समाज और संस्कृति से गहरा
रिश्ता है। अतः ललित निबंधकार जब नॉस्टाल्जिक हो जाता है तब वह
अपनी इसी परंपरा से जुड़ता है। उसकी जैसी प्रकृति होगी, वैसा
ही वह अपनी परंपरा से ग्रहण करेगा। यह तो एक सामान्य बात है
जिसे मैं कह रही हूँ, कोई नई बात नहीं है और सभी इस बात को
जानते भी हैं।
07. संस्कृत के
कुछ श्लोक,
लोक के कुछ छंद,
ग्राम्य-स्मरण,
कुछ निजी या
आत्मीय प्रसंग,
कुछ सरल उद्धरण
और कुछ सरस उदाहरण के संग्रह-संयोजन को ललित निबंध का फार्मूला
बनाने के आरोप लगते रहें हैं,
क्या इनके अलावा
ललित निबंध रचा जा सकता है ?
उत्तर-
देखिए हर
विधा के कुछ न कुछ फार्मूले बन ही जाते हैं। मार्क्सवादी लेखन
के भी फार्मूले है। प्रयोगवाद के भी। और फार्मूलाबद्ध लेखन तो
हमेशा ही पराजित होता है। इसकी बहुत चिंता नहीं करनी चाहिए कि
ललित निबंधों पर ऐसा आरोप है। आप अगर शुक्ल-पूर्व निबंधों को
देखें तो पाएँगे कि ऐसा नहीं है। सवाल यह है कि आपका रुझान और
सोच कैसी है। आपकी दृष्टि और अध्ययन कैसा है।
08. ललित निबंध
एक स्वतंत्र विधा है पर इसमें काव्य की विभिन्न विधाओं की
उपस्थिति संभव है । यह ललित निबंध का सामर्थ्य है या भटकाव
?
उत्तर-
यह इस बात पर
अवलंबित है कि मात्रा कितनी है। संतुलन के अभाव में हर
सामर्थ्य भटकाव में बदल जाता है।
09. ललित
निबंधों में विभिन्न विधाओं के समन्वय की सहमति के बाद भी
गुलाबराय,
दिनकर,
विनोबा भावे,
वियोगी हरि आदि
के निबंध का जिक्र सामान्यतः क्यों नहीं होता ?
उत्तर-
हम लोग कम
पढ़ते हैं। कम पढ़ कर काम चल सकता है तो अधिक पढ़ने का कष्ट
नहीं करना चाहते। और फिर कई काम और भी तो हैं करने के लिए।
हमारी आलोचना( आलू-चना) ने भी भारतीय समाज-व्यवस्था की तरह
साहित्य को वर्गों में बाँटा है। निबंध आदि
इत्यादि में शामिल हैं। परिधि पर हैं। फिर किस्से कहानियाँ
अधिक रोचक हैं। कथा-साहित्य कितना भी यथार्थवादी क्यों न लगे,
पर है तो आखिर कथा ही। पर निबंध तो लाग-लपेट विहीन सीधी
अभिव्यक्ति है। आपकी बात कोई गोबर, होरी या शेखर नहीं कहेगा।
आपको ख़ुद कहना है। आप ख़ुद अपने शेखर-गोबर हैं। आप अगर ढंग से
कहें तो लोग सुनना चाहेंगे। पर अपने लिखे की ज़िम्मेदारी तो आप
ही को उठानी पड़ेगी। आपको बचाने कोई शेखर-गोबर नहीं आएगा।
10. ललित
निबंधों के मूल विषयों में लोक भी है । फिर ललित निबंधकारों के
यहाँ व्यंग्य को लेकर कोई परहेज भी नहीं ,
ऐसे में क्या
लोक-यथार्थ को व्यंग्य विधा में अभिव्यक्त करने वाले य़था-
परसाई,
शरद जोशी आदि की रचनाओं को ललित निबंधों की परिधि में नहीं
समेटा जा सकता है ?
उत्तर-
देखिए, इस
बात को इस तरह समझिए। अभी-अभी तक सामान्य बौद्धिक और आम जनता
के मन में भी सिख और जैन धर्म हिन्दू धर्म से कुछ अलग नहीं थे।
पर अब राजनीतिक रूप से अपनी अलग पहचान के नाते उनकी स्थिति बदल
गई है। सवाल अस्मिता तथा वर्चस्व का है। अपनी अलग पहचान का है।
अगर बल बढ़ता है, आवश्यकता है तो कबीर और तुलसी, निराला
प्रगतिशील हैं, सूर की गोपियां भी। अन्यथा तुलसी, निराला
हिन्दूवादी, कबीर दलित और गोपियाँ नारीवादी। शामिल करने और
अलगाने से किस को कितना फायदा हो रहा है, यही देखा जाता है।
इससे न सूर को, न तुलसी को और न कबीर-निराला को कोई फर्क पड़ता
है, न ही उन्हें पढ़ने वाले पाठकों को।
11. ललित
निबंधकार की सामान्य रचना प्रक्रिया पर आपकी टिप्पणी क्या होगी
? इसमें
हिन्दी समाज,
उसकी संस्कृति,
उसकी विकृति या
नित बदलती दुनिया की क्या भूमिका होती है ?
क्या इस रचना
प्रक्रिया को हम रंजना अरगड़े जी की रचना प्रक्रिया मान सकते
हैं , या
आपकी रचना प्रक्रिया कुछ भिन्न है ?
उत्तर-
इस प्रश्न का
उत्तर मैं पहले के उत्तरों में प्रकारांतर से दे चुकी हूँ। पर
यहाँ इतना जोड़ना चाहूंगी कि केवल हिन्दी समाज नहीं, व्यापक
भारतीय समाज को भी शामिल कर सकते हैं। अगर रचनाकार की चेतना
हिन्दी समाज तक सीमित है तो वैसी होगी। पर आज खुद हिन्दी समाज
भी व्यापक भारतीय समाज हो गया है। मैं यह मानती हूँ कि
विचारशील रचनाकार हमेशा ही अपने चारों ओर घटित होने वाले
परिवर्तनों से प्रभावित होता है। कथा कहने का रुझान हो तो वह
कहानी उपन्यास की ओर मुड़ता है, अन्यथा निबंध की ओर। जैसा
मैंने पहले कहा है कि भाषा जब तक आपके लिए सब कुछ नहीं हो जाती
तब तक निबंध रचना संभव नहीं है। फिर, आप भाषा में ही तो सोचते
भी हैं। निबंध के केन्द्र में सोच है. सोच, बिना भाषा के संभव
नहीं है। भाषा जितनी ठोस और सर्जनात्मक होगी, निबंध उतना संभव
हो सकेगा।
12. समकालीन
हिन्दी ललित निबंध का शिल्पगत एवं भावगत चरित्र कैसा है
? आप इन्हें किस
दृष्टि से देखती हैं । ललित निबंध का इतिहास लेखन अभी शेष है ।
आप चरित्रगत विशेषताओं के आधार पर इन्हें कैसे विभाजित करना
चाहेंगी ?
कुछ महत्वपूर्ण संभावनाशील रचनाकारों के विषय में कहना चाहेंगी
?
उत्तर-
यह प्रश्न
वहुत विस्तार की अपेक्षा रखता है। इसका उत्तर फिर कभी।
13. ललित निबंध
पर आरोप है कि उसकी प्रकृति हिन्दूवादी है । प्रगतिशील(?)
विविध
जुमलों से खिल्ली उड़ाते हैं?
आप उन्हें कैसे
निरुत्तर करना चाहेंगी ?
उत्तर-
प्रगतिशीलों की बहुत चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। क्योंकि
अगर सोच को सर्जनात्मक, खुली और निरि अभिव्यक्ति बनाने का
उनमें सामर्थ्य है तो वे प्रगतिशील ललित निबंध लिखें। अन्यथा
खिल्ली को वे एक पतंग बना कर साहित्य के आकाश में उड़ाते रहें।
आप और हम और वे स्वयं भी जानते हैं कि पतंगों की नियति है,
कटना। फिर महत्वपूर्ण बात तो यह है कि हर रचनाकार अपने पाठक के
प्रति ही जवाबदेह होता है। उनके अलावा किसी को जवाब देने की
टोपी पहन कर हम क्यों अपने सिर पर व्यर्थ का भार वहन करें।
14. क्या कारण
है कि '
अक्षत' के
अलावा हिन्दी में ललित निबंधों की श्रीवृद्धि के लिए कोई
सार्थक अभियान नहीं दिखाई देता
? बड़े
साहित्यिक प्रतिष्ठानों में इसे लेकर असहनीय चुप्पी है ।
शिक्षा के पाठ्यक्रमों में भी पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी,
विद्यानिवास
मिश्र,
कुबेरनाथ राय प्रभृति विशिष्ट ललित निबंधकारों के अलावा अन्य
निबंधकारों को समादृत नहीं किया जाता ।
उत्तर-
हमें यह बात
नहीं भूलनी चाहिए कि किस समाज में क्या लिखा जाए यह उस समाज पर
ही आधारित होता है । बाजा़रीकरण या भूमंडलीकरण तो अब आए हैं।
पर उसके पूर्व भी सबसे अधिक तो कथा-साहित्य ही बिकता था। लोगों
के बीच लोकप्रिय भी यही विधा है। किसी भी पत्रिका या प्रकाशन
संस्थान इस तथ्य को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता। पाठ्यक्रमों में
तीन ही निबंधकार इसलिए चलते हैं कि उन पर सामग्री प्राप्त हो
सकती है। अध्यापकों को नए सिरे से अपने बूते पर कुछ तैयार नहीं
करना पड़ता। फिर निबंधों में तो विचार है। हमारे कवि श्रीकांत
वर्मा कह चुके हैं कि मगध में अब विचार नहीं होता। हम सब उसी
मगध में रहते हैं। फिर हमारे पाठ्यक्रमों को हमने तय प्रश्नों
के ढांचे में बाँट दिया है। क्या हम विद्यार्थी से यह कभी
पूछते हैं कि हजारी प्रसाद की जाति व्यवस्था विषयक विचारों को
ध्यान में रखते हुए वर्तमान भारत की स्थितियों की समीक्षा
कीजिए। क्या हमारा अध्यापक यह पढा़ना चाहता है ?
15. इन तीनों
निबंधकारों को आप किस रूप में देखती हैं,
इन तीन ललित
निबंधकारों को पाठक अलग-अलग देखना चाहे तो वे कैसे दिखाई देंगे
?
उत्तर-
इसका भी उत्तर मैं पहले दे चुकी हूँ। हजारीप्रसादजी स्वतंत्र
भारत की पीढ़ी की वैचारिकता को बनाने का प्रयत्न कर रहे थे। वे
उन मुद्दों को साफ कर के इतिहास के परिप्रेक्ष्य में रख कर
हमारे वर्तमान को गढ़ रहे थे, जिनका सामना स्वतंत्र-भारत के
नागरिकों का करना था। विद्यानिवास जी ने उस में छूट गए
लोक-तत्व को शामिल किया। इसके माध्यम से उन्होंने हमारी जडों
तथा परिधि के भारतीय जीवन को विस्मृत हो रही परंपरा के साथ रख
कर देखने की दृष्टि प्रदान की। आधुनिक मकानिकी जीवन को उत्सवों
और लोक गीतों की धुनों में बाँध कर उसे कुछ क्षण विश्राम देने
का प्रयत्न किया। कुबेरनाथ राय ने ललित निबंध लिखने की एक
अच्छी एवं आदर्श प्रविधि ढूँढ निकाली।
16. ऐसे समय
में जब उत्तरआधुनिकता के संजालों से सारे समाज के साथ
पढ़ा-लिखा तबका भी निरंतर फँसता चला जा रहा है,
उधर साहित्यिक
कर्म के लिए चुनौतियाँ भी जटिलतम होती चली जा रही हैं,
अल्पसंख्यक
रचनाकारों की इस पवित्र विधा के भविष्य को लेकर क्या किया जा
सकता है ?
उत्तर-
वही जो आप कर
रहे हैं। विचारहीनता की जड़ता को तोड़ कर विचार को खून के साथ
हमारी नसों में बहाने के लिए इस विधा के प्रति लोगों को सजग
करना। इसके लिए यह बात साफ़ करना ज़रूरी है कि श्लोक या उद्धरण
नहीं भी पता हों तो भी विचार को लिखा जा सकता है।
सोच की जड़ें हमारे इतिहास में हैं इसलिए उसे अच्छी तरह जानना
ज़रूरी है। उसका फैलाव हमारे भूगोल में है। इस बात को भी हम
संप्रेषित कर सकें और अपने भूगोल की सीमाएं माप सकें तो हमारे
विचार की जड़ता हमारी नदियों में आर्द्र नहीं होंगे, वे
पर्वतों को देखेंगे तो ऊंचाइयों पर क्या नहीं चढेंगे, वे
रेगिस्तानों में तपेंगे तब खजूर की मिठास के साथ जीवित रहना
सीखेंगे।
17. अन्य बातें
जो मैं नहीं पूछ सका हूँ और एक पाठक के लिए जिसे ललित निबंध के
क्षेत्र में जानना ज़रूरी हो सकता है,
कृपया सविस्तार
बतायें
उत्तर-
इसका उत्तर भी फिर कभी।

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