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नाम
श्रीकृष्ण
कुमार त्रिवेदी
4
नवम्बर
दोपहर में ठीक बारह बजे शहर के सारे स्कूलों के टेलिफ़ोनों
की घंटियाँ
एक साथ घनघना उठीं -
'हैलो,
डॉ.
शर्मा का
लड़का
अभी - अभी किडनैप हो गया है। प्लीज,
बच्चों का बहुत ख्याल रखें,
कोई बाहर न निकलने पाये,
कोई बाहर से आये तो उससे मिलने ना दें,
- - - - -
।'
कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने
फ़ोन
तो लगवा लिए थे पर उस पर बात करने की संस्कृति से परे थे,
'कान
खोल कर सुन लीजिये: बच्चे को कुछ हो गया तो आपकी
ख़ैर
नहीं। हम अच्छी तरह से निबटेंगें। - - - - ।'
एकाध
भले लगे तो उनसे पूछने पर पता चला कि
लड़का रोज़
की तरह ग्यारह-साढे ग्यारह बजे के बीच अपने विद्यालय से
परीक्षा देकर साइकिल पर लौट रहा था। साथ में अपनी साइकिल पर एक
बच्चा और था। उसने ही भागकर घर में खबर दी।
जिनके
पास
फ़ोन
नहीं थे,
वे भागे- भागे विद्यालयों में
पहुँचे।
कुछ लोगों को पता लगा था कि किसी स्कूल से किसी बच्चे का अपहरण
कर लिया गया है। ऐसे में निश्चित पता लग जाने तक सबको
'बच्चे'
का अर्थ अपना बच्चा और
'स्कूल'
का अर्थ अपने बच्चे का ही स्कूल होता है। उन्हे लगता था कि
वहाँ अफ़रा-तफ़री
मची होगी। पर,
सब कुछ शांत दिखा तो सकपकाए से कार्यालय
पहुँचे,
'साहब,
बच्चे से कुछ काम है,
बुलवा दीजिए।'
बच्चे
सकुशल दिखे तो दो-चार बातें इधर-उधर की करके वापस कक्षा में
भेजवा दिया। प्राचार्य
समझाते कि जो बच्चा गायब हुआ है,
वह उनके यहाँ का नहीं है,
दूसरे विद्यालय का है और विद्यालय से नहीं घर लौटते समय रास्ते
से गायब हुआ है।
छूटटी
की घंटी बजने तक हर स्कूल अभिभावकों से आक्रांत रहा। देर रात
तक पूरा शहर इसकी ही चर्चा में मशगूल रहा। लोग पत्रकार को
घेरते,
पुलिस थानों के आस-पास मँडराते पर कुछ भी हाथ न लगता।
5
नवम्बर
सुबह शहर में अखबार घट गए,
दुगने-तिगुने दामों पर बिके। हर कोई जानना चाहता था कि ताज़ा
स्थिति क्या है। म्यूजिक की दुकानों नें माइक पर पूरे के पूरे
अखबार पढे,
और लोगो ने साँस
रोककर सुना।
समाचारों
में दिया गया था कि दो लोग मोटर साइकिल पर थे। एक ने लडके को
रोका और इतनी
ज़ोर
से तमाचा उसके मुँह पर मारा कि वह चकरा गया। बस,
उठाकर दोनों ने अपने बीच उसे मोटरसाइकिल पर बैठाला और
तेज़ी
से भाग निकले। एक के हाथ में कटटा होने की बात भी कही गयी थी।
एक अखबार नें प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से लिखा था कि एक मोड
पर खडी एक बिना नम्बर की कार में उसे डाल दिया गया था,
शायद वह बेहोश था। कुछ ने किसी को कार के भीतर से यह कहते भी
सुना था कि
'अब
इसके बाप को पता लगेगा।'
यह भी बतलाया गया कि कार उत्तर की ओर गई थी।
'किस
पर शक है
?'
पूछे जाने पर डॉ.
शर्मा ने एक पत्रकार का नाम लिया था जो एक रात उनके घर पर आया
था एक मरीज़ का तुरंत प्राइवेट आपरेशन कर देने के लिये जिसे
गोली का धाव लगा था। डॉक्टर ने कहा था कि
'यह
मेडिको लीगल केस है,
अत: बिना थाने में प्राथमिकी दर्ज़ कराए मै ऐसा ना कर पाऊँगा।'
इस पर पत्रकार ने धमकी दी थी,
'आपके
भाव बहुत उॅचे हो गये हैं। यह इंकार आपको बहुत महँगा पडेगा।'
समाचारों
में यह भी बतलाया गया कि सारी रात लोग
फ़ोन
पर बैठे रहे कि अपहर्ता फ़िरौती
की माँग करेंगे,
पर एसा कोई
फ़ोन
नहीं आया।
सारा दिन उहापोह में बीत गया। अभिभावकों नें बच्चे नहीं भेजे,
इससे चल रही छमाही परीक्षा बीच में ही रोक देनी पडी।
शहर में सन्नाटा छाया रहा।
6
नवम्बर
समाचार पत्र फिर आपाधापी
के शिकार रहे। म्यूजिक की दुकानों ने फिर लाउड-स्पीकरों पर
समाचार अखबार पढे। कुछ लोगों नें सार्वजनिक स्थानों पर समाचार
पत्र चिपका दिए ताकि लोग ज्ञिज्ञासा शांत कर सकें।
उस पत्रकार को पुलिस नें हिरासत में ले लिया था और पूछताछ हो
रही थी।यह भी बतलाया गया था कि पुलिस एक धोबी की तलाश में थी
जिसने दो दिन पहले
डॉक्टर
की पत्नी से कहा था,
'माता
जी,बच्चे
का घ्यान रखें,
उसका अपहरण होने वाला है।'
तब किसी ने ध्यान नहीं दिया था। अब पता करने पर वह
धोबी
मय परिवार के गायब है।
किराए के मकान में था किसी को उसका अता पता नहीं मालुम
है।
यह भी बतलाया गया कि उसको मोटर साइकिल से ही शहर के बाहर-बाहर
पूर्व की ओर ले जाये जाते देखा गया था। पुलिस को विश्वास था कि
बच्चा शहर में ही रखा गया होगा। इससे शहर के ही संभावित
ठिकानों पर
ज़्यादा ज़ोर
था। अब घ्यान देहात की ओर मुडा है।
7
नवम्बर
सनसनीखेज़
समाचार आया कि शातिर बदमाश करीम को मय मोटरसाइकिल के पकडकर एक
थानेदार पुलिस कप्तान के पास ले गया,
'साहब,
इससे पूछिए। यही मोटरसाइकिल थी। इसे पता होगा।'
पुलिस कप्तान थानेदार पर बिगड ग़ए,
'इसे
यहाँ क्यों ले आए?
कोतवाली ले जाओ।'
वह कोतवाली में है और पूछताछ हो रही है।
कुछ लोगों ने बतलाया कि वे नहर की पटरी-पटरी उसे ले गये हैं।
उसके मुँह और सिर पर पीला कपडा लपेट रखा था। कुछ लोगों ने पूछा,
'इसका
सिर क्यों लपेटे हो?'
तो बोले,'यह
बीमार है। अभी इलाज कराकर लाए हैं। धूप से बचाना बहुत
ज़रुरी
है।'
शाम तक खबर फैली कि उपर से किसी का
फ़ोन
आ गया तो पुलिस ने करीम को छोड दिया है। मोटरसाइकिल कोतवाली मे
खडी है।'
फ़ोन
किसका हो सकता था?
इसके बारे मे लोग क़यास
लगाते रहे।
8
नवम्बर
आज कुछ दूसरे कोण से मामले को देखने की कोशिश की गयी थी। एक
सम्पन्न प्राइवेट नर्सिंग होम के ईष्यालु मालिक पर शक की सुई
घूम रही है जो कोशिश करके भी डॉ.
शर्मा को अपने नर्सिंग होम में काम करने पर राजी नहीं कर पाया
था। समाचारों में बतलाया गया था कि उसने साफ मना कर दिया है
मामले मे अपना हाथ होने से।
डाक्टरों को पुलिस की कर्मठता पर शक होने लगा है। उन्होनें और
शहर भर के दवा-विक्रेताओं ने अगले दिन हडताल करने की नोटिस दे
दी है। पुलिस ने उनसे अनुरोध किया है कि दो दिन का समय और दें।
9
नवम्बर
मामला कुछ ठण्डा पडने लगा है। आज अखबारों मे कोई भी समाचार
इसके बारे में नहीं है। स्कूल पहले की तरह फिर चलने लगे हैं।
खबर फैली कि डॉ.
शर्मा ने पुलिस से निराश होकर अपने तरीके
से पता लगाना शुरु कर दिया है। फ़िरौती
के लिए कोई
फ़ोन
या पत्र न आने से चिंता होने लगी थी कि
लड़का
अब तक ज़िंदा
भी है या नहीं।
उन्होंने
अपने प्रभावशाली परिचितों को लगाया है। कुछ उस तरह के लोगों को
भी टटोला गया है जो इस तरह का काम करते है।
10.
नवम्बर
नदी किनारे के एक थाने के थानेदार ने पुलिस कप्तान से कहा है
कि नदी किनारे के गॉवों की गहन छान-बीन की जाए।
लड़का
जिले के बाहर नहीं गया है। पुलिस कप्तान ने कोई खास रुचि नहीं
दिखलायी,
ऐसी खबरें फैलीं।
पुलिस कप्तान ने पत्रकारों को बतलाया,
'हमें
पता लग गया है। हमारी प्राथमिकता बच्चे को सुरक्षित वापस पा
लेने की है। अपनी रणनीति
का खुलासा करने से भय है कि बच्चे की सुरक्षा को कहीं खतरा ना
पैदा हो जाए।'
उसी शाम
डॉक्टर
की उनके लडके से
फ़ोन
पर बात कराए जाने की चर्चा फैली जिससे लगा कि बच्चा शहर में ही
कहीं पर है
क्योंकि
देहात मे
फ़ोन
बहुत कम थे और उनसे बात खुल जाने का डर था। लेकिन मोबाइल
फ़ोन
के प्रयोग की शंका भी बनी रही।
11
नवम्बर
डॉ.
शर्मा के दूत सारे जिले में हाथ-पाँव
मारकर बैरंग लौट आए हैं। वे कुछ भी पता नहीं लगा पाए।
खबर यह भी फैली कि
डॉक्टर
को फ़िरौती
का कोई समाचार मिला है और उन्होंने बैंकों से अपनी एफ.डी.आर.
आदि तोडवाकर तथा अन्य स्त्रोंतों से भी
रुपया इकटठा कर लिया है।
13
नवम्बर
दो दिन कुछ नहीं हुआ तो यह चर्चा
तेज़
हुई कि गिरोह के लोग तय नहीं कर पा रहे हैं कि फ़िरौती लें या
मार दें। नहीं तो अभी तक क्यों चुप है।
पुलिस इसका-उसको पकड़ती-छोड़ती
रही। कुछ पता नहीं लगा पायी। लावारिस मिली लाशें
डॉक्टर
साहब को लाकर दिखायीं जाती रहीं। एकाध तो उमर और कद-काठी के
हिसाब से लगीं कि उसी की है पर बाद में पता लगता कि उसकी न
होकर किसी और की हैं।
15
नवम्बर
आज के सभी अखबारों की मुख्य सुर्खी
थी -'अपहृत
लडके की लाश बरामद'।
पुलिस के हवाले से कहा गया कि जंगल में एक पुलिया के पास एक
आदमी घूम रहा था। उससे डॉट-डपटकर पूछा गया तो उसने बतलाया कि
फलां कुएं मे उसकी लाश पडी है। उसे गिरफ़्तार
कर लिया गया है और लाश पोस्ट-मार्टम के लिए चीरघर
पहुँचा
दी गयी है।
यह खबर फैलते ही सारे शहर मे हडताल हो गई। हजारों लोग चीरघर पर
इकटठा हो गए और पुलिस को
ज़ोर ज़ोर
से गालियाँ देने लगे,
'इन्हे
सब पता था। ये चाहते तो यह सब न होता। उस जंगल कें तो यह
रोज़
चक्कर लगाने का दावा करते थे। पकडा गया आदमी वहॉ क्या कर रहा
था?
- - - -
क्या लाश की रखवाली कर रहा था?
- - - -
वह पुलिस को देखकर भागा क्यों नहीं?
- - - -
अरे,
इनकी मिली भगत रही होगी। - - - -बेचारे
डॉक्टर
का
लड़का
मरवा दिया।- - - - ।'
पोस्ट-मार्टम की रिपोर्ट आयी कि लडके को मार तो कोई तीन दिन
पहले दिया गया था,
पर कुएं में लाश कल रात मे ही फेंकी गई है।
जब यह समाचार फैला कि पकडे गए आदमी ने बतलाया कि हत्या करीम ने
की है और वही मामले का मुख्य अभियुक्त है तो शहर में दंगे फैल
गए।
'उसे
पकड लिया गया तो बिना पूछ-ताछ किए छोड क्यों दिया गया?'
लोग इतने गुस्से में थे कि वह मिल जाता तो उसकी बोटी-बोटी नोच
लेते। सेना और अद्ध-सैनिक बलों की सहायता से किसी तरह स्थिति
रात तक नियंत्रण में आ पायी। एहतियात बरता गया कि कल दंगे न
भडकनें पायें।
डॉक्टर
की ओर से सबको शांत रहने की अपील पूरे शहर में लाउड-स्पीकर से
करायी गयी। शांति समितियाँ
भी सक्रिय की गईं। करीम को ज़िंदा
या मुर्दा पकडने के लिए दस हजार रुपये का इनाम भी
घोषित
किया गया है सरकार की ओर से।
16
नवम्बर
लडके की लाश को कल ही गंगाजी के हवाले करके
डॉक्टर
मय परिवार के रात में ही सारा सामान लेकर चले गए। कुछ लोगों का
कहना है कि उन्होंने कहा,
'मैने
यहाँ अपना सब कुछ खे दिया है। अब यहॉ कभी नहीं आऊँगा।'
और लोगों ने कहा,
'यह
सब झूठ है। किसी ने उनको जाते नहीं देखा। आज सबेरे खुला घर
पाकर लोगों को अंदाज़ा
हुआ है।
शहर का गुस्सा अब
ग़म
में बदलने लगा है।
25
नवम्बर
अखबारों ने करीम के पकडे जाने का समाचार उसके फोटो के साथ
सुर्खियों
में दिया है। उसे एक थानेदार ने पकडा अपने थाने के ही पास।
पुलिस कप्तान ने उस थानेदार को पॉच सौ रुपये का नकद इनाम दिया
और सरकार से उसे दस हजार रुपए का घोषित इनाम देने की सिफ़ारिश
की है।
लोग
फिर भडके,
'उसे
पकडते ही मार क्यों नहीं दिया गया?
ऐसे कलंक को जीने का क्या अघिकार है?
- - - -'
जिले के सभी वकीलों ने क़सम
खायी है कि वे पैरवी नहीं करेंगे और न बाहर के किसी वकील को
उसकी पैरवी करनें देंगें।
26
नवम्बर
आज करीम की अदालत में पेशी थी। पूरा शहर उमड पडा था। स्थिति को
भाँपकर
पुलिस वालों ने कोशिश की कि न्यायाघीश महोदय धर पर ही उसको हाज़िर
करा दें। वकीलों को भनक लगी तो उन्होने न्यायमूर्ति का घर घेर
लिया। न्यायमूर्ति ने अदालत में ही उसे पेश होने को कहा।
बडी सज-धज
से,
सिगरेट पीते और निर्लज्जता से मुस्कुराते हुए करीम को पुलिस
बडे सम्मान के साथ अदालत ले जाने लगी तो जन-सैलाब का
ख़ून
खौल उठा,
'मारो
साले को,
मारो साले को'
चीखते हुए लोग उस पर टूट पडे और जो भी हाथ में आया उसी से उसे
मारने लगे। पुलिस अवाक़ सी देखती रही।
'उसको
मारा क्यों?
क्यों मारा?'
- - - -
लोग गाली देते और मारते रहे।
'मैने
वही किया है जो मुझसे कहा गया था। मेरी जान बख्शो। मैने खुद
कुछ नहीं किया।'
वह रोने-गिडगिडाने और पॉवों पर गिरने लगा।
'किसने
कहा था?
नाम बता उसका। उससे भी निबट लेंगें।....?'
लोग और ज़ोर-ज़ोर से मारने लगे।
वह
बेदम होकर गिर गया तो पुलिस वालों नें सबके हाथ जोडे
'अब
मत मारिए। मर गया तो हमारी नौकरी पर आ बनेगी।'
बडी मुश्किल से उसे बचाकर जेल भेजवाया गया और जेल के
डॉक्टर
के हचाले कर दिया गया।
इघर लोग बातें करने लगे क |