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यादों की किताबें
सुनील दीपक
दिल्ली
के प्रगति
मैदान
में
अंतर्राष्ट्रीय
पुस्तक
मेले
का
अंतिम
दिन
था,
बहुत
भीड़
थी।
इधर
से
उधर
घूम
रहा
था,
एक
हाल
से
निकलता
और
दूसरे
में
घुस
जाता।
पत्नि
के
साथ
जब
कुछ
खरीदारी
के
लिए
जाना
पड़ता
है
तो
थोड़ी
सी
देर
में
सिर
दर्द
करने
लगता
है,
जी
करता
है
कि
इन
दुकानों
से
भागो
पर
किताबों
की
दुकान
हो
तो
बात
बदल
जाती
है।
किताबों
के
बीच
चाहे
जितनी
देर
छोड़
दो,
मालूम
ही
नहीं
चलता
कि
मिनट
और
घंटे
कहाँ
गये।
पुस्तक
मेले
में
कुछ
उल्टा
ही
महसूस
कर
रहा
था,
इतनी
किताबें
कि
जी
घबरा
सा
जाये।
चिकित्सा,
गणित,
विज्ञान,
तकनीकी,
कृषि
और
जाने
कितने
विषयों
पर
अधिकांश
प्रकाशकों
के
स्टाल
थे
और
अधिकतर
किताबें
भी
अँग्रेजी
में
थीं।
हिंदी
साहित्य
के
लिए
एक
ही
हाल
था,
१२
नम्बर
वाला,
अंत
में
वहीं
जा
कर
रुक
गया।
इटली
में
दस
पंद्रह
यूरो
से
कम
तो
कोई
किताब
नहीं
मिलती
और
ज़रा
सी
भी
मोटी
किताब
हो
तो
क़ीमत
बीस
या
तीस
यूरो
तक
जा
पहुँचती
है।
उनके
मुकाबले
में
हिंदी
की
किताबें
इतनी
सस्ती
लगती
हैं
कि
जी
करता
है
खरीदते
ही
जाओ।
हालाँकि
हवाईजहाज़
से
इतना
सामान
कैसे
ले
कर
जाऊँगा
इसकी
कुछ
चिंता
थी
पर
फ़िर
भी
उस
दिन
करीब
बीस
किताबें
खरीदीं।
फ़िर
भारतीय
ज्ञानपीठ
के
स्टाल
में
किताबें
देख
रहा
था
जब
बीच
के
मेज़
पर
रखे
पैपरबैक
में
शिवानी
की
"कृष्णकली"
दिखी।
छठी
में
पढ़ता
था
जब
वह
धारावाहिक
रूप
में
धर्मयुग
में
प्रकाशित
हुई
थी।
हर
सप्ताह
धर्मयुग
के
आने
का
इंतज़ार
रहता
कि
अब
क्या
हुआ
होगा?
कौन
सा
नया
मोड़
आयेगा
अब
कृष्णकली
के
जीवन
में।
अगले
दिन
स्कूल
में
अपने
मित्रों
को
भी
कहानी
के
नये
मोड़
सुनाये
जाते।
जब
उपन्यास
के
अंत
में
कृष्णकली
मरी
तो
बहुत
दिल
उदास
हुआ
था।
उन
यादों
का
सोच
कर
ही
तुरंत
कृष्णकली
भी
खरीद
ली।
उसी
दिन
रात
की
उड़ान
थी,
रास्ते
में
पढ़ने
के
लिए
कोई
नयी
किताब
नहीं,
बल्कि
कृष्णकली
को
ही
हाथ
में
ले
जाने
वाले
थैले
में
रखा।
लेकिन
रात
भर
पढ़
नहीं
पाया,
नींद
आ
रहा
थी
तो
सो
गया।
यादों
में
बसी
किसी
बात
को
वर्षों
बाद
देखना
कभी
उतना
सुंदर
हो
ही
नहीं
सकता
जेसा
कि
यादों
में
था,
यह
बात
मालूम
थी
पर
यह
नहीं
सोचा
था
कि
इस
बार
कृष्णकली
से
बोर
हो
जाऊँगा।
घर
वापस
आ
कर
किताब
बिस्तर
के
पास
की
मेज़
पर
रख
दी
और
हर
रोज
रात
को
सोने
से
पहले
कुछ
पृष्ठ
पढ़
कर
उसे
समाप्त
किया।
१९६०
के
दशक
में
लिखी
गयी
कृष्णकली
की
किताब
अपने
समय
की
सामाजिक
सोचविचार
को
ही
झलकाती
है
और
शायद
शिवानी
जी
का
पाराम्परिक
निजी
जीवन
की
भी
इसमें
छाया
है।
हालाँकि
कृष्णकली
स्वयं
साँवली
है
और
इसके
बावजूद
उसे
सब
लोग
सुंदर
मानते
हैं,
उपन्यास
में
कोई
कभी
यह
नहीं
कहता
कि
"थोड़ा
सा
रंग
भी
साफ़
होता
तो...",
पर
पहाड़ी
समाज
का
गोरे
रंग
की
ओर
रुझान
पुस्तक
में
बार
बार
झलकता
है।
साथ
ही
काले
पिता
की
संतान
हीरा
या
अन्य
साँवले
पात्रों
को
हब्शी
कह
कर
बुलाना
भी
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