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सृजनगाथा

 

 ई-पताः srijangatha@gmail.com

वागर्थ प्रतिपत्तये

वर्ष-2, अंक-22, मार्च, 2008

अपनी बात कविता छंद ललित निबंध कहानी लघुकथा व्यंग्य संस्मरण थोपकथन भाषांतर संस्कार

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।। ग़ज़ल ।।

 

 

अपना घर आया


कुमार नवीन

 

दूर से दरिया समन्‍दर सा लगा

जब करीब आया तो क़तरा सा लगा

 

ढूँढता फिरता था जो औरों के दाग़,

उसका ख़ुद किरदार मैला सा लगा

 

इस कदर मसरूफ़ राहों में रहे

अपना घर आया तो मंज़िल सा लगा

 

खुश्‍बुओं की क्‍या किसी से दुश्‍मनी

छू गईं जिसको वो महका सा लगा

 

कितनी पाक़ीज़ा ज़ुबां उसको मिली

झूठ भी बोला तो सच्‍चा सा लगा

 

वो हमारे शहर का सुकरात था

विष का प्‍याला जिसको अमृत सा लगा

 

तुम न थे तो पत्‍थरों का ढेर था

आ गए तुम तो ये घर, घर सा लगा

 

किसको हाले दिल सुनाते हम 'नवीन',

जो मिला, ग़म उसका अपना सा लगा

                      कुमार नवीन

वरिष्‍ठ प्रबन्‍धक

                     इलाहाबाद बैंक, स्‍टाफ कॉलेज, पटना

                     पटना, बिहार

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