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ख़यालों का आइना काग़ज़
चाँद
'शेरी'
सूर्ख़ उन्वां लिए
मिला काग़ज़
ख़ून से तर-ब-तर हुआ
काग़ज़
दूर परदेस में था वो लेकिन
बन गया उसका राबता
काग़ज़
जब न कह पाए कुछ लबे ख़ामोश
उसकी नज़रों ने फिर लिखा
काग़ज़
मेरे आँगन में आके पुरवाई
ले उड़ी मेरे गीत का
काग़ज़
अक्स हर सोच का पड़ा उस पर
है ख़यालों का आइना
काग़ज़
बर्फ के टीले आग की दरिया
नाव
काग़ज़ की नाख़ुदा
काग़ज़
ज़िंदगी भर रहा कोई प्यासा
'शेरी' कोरा ही रह गया
काग़ज़
चाँद
'शेरी'
के 30 आपीआईए
रोड
नं. 1,
कोटा (राज.) -
5

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